आप सभी का मंथन पत्रिका के इन्टरनेट संस्करण पर स्वागत है । आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का स्वागत है ।

Free Website Templates

Saturday 3 March 2012

प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी लूसान विष्वविद्यालय में भी हिन्दी के उत्थान एवं उन्नय के लिए कार्य करेंगे






pkS/kjh pj.k flag fo’ofo|ky;] esjB ds fgUnh foHkkxk/;{k izks0 uohu pUnz yksguh dk fLoV~tjySaM esa ywtku fo’ofo|ky; esa crkSj fgUnh izksQslj ds :i esa p;u gqvk gSA ywtku fo’ofo|ky; esa vDVwcj 2011 esa jk"Vªifr ekuuh; izfrHkk nsoh flag ikfVy }kjk xq: johUnzukFk VSxksj ps;j LFkkfir dh FkhA MkW0 yksguh bl ps;j ds izFke vkpk;Z ds :i esa p;fur gq, gSaA Qjojh 2012 ls yxHkx pkj ekg rd ds dk;Zdky esa Hkkjrh; laLd`fr ds v/;;kiu dk dk;Z fd;k tk,xkA MkW0 yksguh Qjojh ds izFke lIrkg esa ywtku fo’ofo|ky; esa inHkkj lHkkysxsaA mudh vuqifLFkfr esa foHkkxk/;{k ds :i esa izks0 vkj0 ,l0 vxzoky dk;ZHkkj laHkkysxsaA MkW0 lhek ’kekZ] vUtw] vywih jk.kk] vkyksd iz[kj] MkW0 johUnz dqekj] yfyr dqekj] vkjrh jk.kk }kjk f’k{k.k dk;Z fd;k tk,xk rFkk d{kk,a fof/kor xfr ls 'kq: dh tk,xhA izR;sd ’kfuokj dks vfrfFk O;k[;ku fd, tk,xsa rFkk le;≤ ij foHkkxh; laxksf"B;ksa ,oa dk;Z’kkykvksa dk vk;kstu fd;k tk,xkA izks0 vkj0 ,l0 vxzoky] izks0 yksguh] fgUnh foHkkx ds f’k{kdksa ,oa fo|kfFk;ksZa ds chp gqbZ HksaVokrkZ eas ;g fu.kZ; fy, x,A bl volj ij izks0 yksguh us foHkkx ds f’k{kdksa ,oa fo|kfFkZ;ksa dk ifjp; izks0 vxzoky ls djok;k rkfd vfxze xfrfof/k;k¡ lqpk: :i ls gks ldsA izks0 vxzoky us foHkkx ds fo|kfFkZ;ksa ,oa f’k{kdksa ls eq[kkfrc gksrs gq, mUgsa bl vof/k esa dfBu ifjJe] yxu ,oa vuq’kklu ls dk;Z djus ds funsZ’k fn,A mUgksaus dgk fd fgUnh foHkkx dks fo’ofo|ky; esa ,d ldkjkRed Nfo gS tks izks0 yksguh dh ;k=k ds nkSjku Hkh ;g Nfo cuh jgsxhA dyk ladk;k/;{k gksus ds ukrs eSa foHkkx dks izR;sd izdkj dk leFkZu nsus dk vko’oklu nsrk gw¡A foHkkx ds f’k{kdksa ,oa fo|kfFkZ;ksa us mudk gkfnZd vfHkuUnu O;Dr fd;k gS] izks0 yksguh us izks0 vkj0 ,l0 vxzoky dks fgUnh foHkkxk/;{k ds nkf;Ro dk fuokgZu djus gsrq /kU;okn Kkfir fd;kA
izks0 uohu pUnz yksguh ds ywtku fo’ofo|ky; esa izFke vkpk;Z ds :i esa fu;qDr gksus ij muds lEeku esa foHkkx esa f’k{kdksa ,oa fo|kfFkZ;ksa }kjk ,d lekjksg vk;skftr fd;k x;kA ftlesa foHkkx ds f’k{kd lkfFk;ksa] 'kks/kkfFkZ;ksa ,oa Nk=&Nk=kvksa us mUgsa 'kS{kf.kd fons’k ;k=k dh c/kkbZ nhA bl volj ij  MkW0 lhek ’kekZ us dgk fd blesa lansg ugha fd lj viuh dk;Z{kerk ,oa yxu’khyrk ds lkFk ywlku fo’ofo|ky; esa Hkh fgUnh ds mRFkku ,oa mUu; ds fy, dk;Z djsaxsA bl volj mifLFkr MkW0 johUnz us dgk fd gesa lj dk cgqr Lusg feyrk jgk gS vkSj mUgksaus muls cgqr dqN lh[kk gS] ftlls og rkmez ugha Hkwy ldrsA blh dM+h dks vkxs c<+krs gq, vatw us dgk fd ;g cM+s lkSHkkX; dh ckr gS fd lj esjB fo’ofo|ky; esa Hkh izFke vkpk;Z ds :i esa fu;qDr gq, ,oa ogk¡ Hkh izFke vkpk;Z cudj tk jgs gSaA vr% gekjh ’kqHksPNk gS fd lj thou esa ges’kk izFke gh jgsaA
vkjrh jk.kk us dgk fd lj] ogk¡ tkdj fgUnh o Hkkjrh laLd`fr ds izpkj izlkj esa viuh egRoiw.kZ Hkwfedk fuHkk,axsA vywih jk.kk us izks0 yksguh ds cgqvk;keh O;fDrRo dh iz’kalk dh ,oa mUgsa c/kkbZ;k¡ nhA yfyr dqekj lkjLor us dgk bl ;k=k dks fons’k ;k=k u dgdj ’kS{kf.kd ;k=k dgkA ftlls Li"V gS fd lkxj ikj Hkh lj vius Kku dk Lof.kZe izdk’k fodh.kZ djus tk jgs gSaA
vkyksd iz[kj us dgk ftl izdkj HkkjrsUnq us ^HkkjrsUnq e.Myh* dk l`tu dj fgUnh dks ,d ubZ xfr nh mlh izdkj MkW0 yksguh dh ,d uohu ea.Myh gS ftlus vkt ds bl izkS|ksfxdh ds ;qx esa fgUnh dks uohu pky esa
bl volj ij MkW0 xtsUnz flag us dgk fd vkt muds ldkjkRed lksp ,oa tq>k: O;fDrRo ds dkj.k gh mUgsa fons’kksa esa Hkh fgUnh lsok djus dk volj feyk gSA MkW0 fofiu ’kekZ us muds cgqeq[kh O;fDrRo ij izdk’k Mkyk rFkk mUgsa fons’k ;k=k dh c/kkbZ nhA 'kks/kkFkhZ eksuw flag us dgk gesa lj dh 'kS{kf.kd ;k=k ij xkSjokuqHkwfr gks jgh gS fd gesa mudh Lusfgy Nk;k esa Kku izkIr djus dk ije lkSHkkX; izkIr gqvk rFkk ftudh ;’kdhfrZ dk yksgk fgUnh tx Hkh Lohdkjus yxk gSA bl volj ij vfer dqekj] izxfr fuosfnrk] cchrk] jkgqy] pj.k flag] eksguh] dfiy] fefyn xkSre] lfgr foHkkx ds lHkh Nk=&Nk=kvksa us mUgsa c/kkbZ;k¡ nhA  

Thursday 1 March 2012

स्विट्जरलैंड में हिंदी की पाठशाला

fgUnh foHkkx] pkS/kjh pj.k flag fo”ofo|ky;] esjB ds foHkkxk/;{k] izks0 uohu pUnz yksguh Qjojh 2012 ls twu 2012 rd ywlku fo”ofo|ky; University of Lausanne ¼UNIL½ Lausanne, Switzerland esa fgUnh f”k{k.k rFkk Hkkjrh; laLd`fr lacaf/kr v/;;u ds fy, LFkkfir dfo dqyxq: johUnz ukFk VSxkSj ps;j ij izFke izksQslj ds :i esa v/;kiu gsrq Hkkjrh; lkaLd`frd laca/k ifj’kn~ esa fnukad 27 tuojh 2012 dks dk;ZHkkj xzg.k dj pqds gSaA
Hkkjr dh ekuuh;k jk’Vªifr Jherh izfrHkk nsoh flag ikfVy }kjk vDVwcj 2011 esa fLoV~tjySaM dh ;k=k esa ywlku fo”ofo|ky; University of Lausanne ¼UNIL½ Lausanne, Switzerland esa dfo dqyxq: johUnz ukFk VSxkSj ds uke ij Hkkjr laca/kh v/;;u ds fodkl gsrq ,d ps;j LFkkfir dh gS vkSj bl fo”ofo|ky; esa bl ps;j ds izFke izksQslj ds :i esa mUgsa Qjojh 2012 ls ,d lsesLVj ds fy, bl fo”ofo|ky; esa izokl gsrq vkeaf=r fd;k x;k gSA mudh fu;qfDr dh vof/k Qjojh 2012 ls izkjEHk gksus okys ,d l= ds fy, gksxhA
Hkkjrh; lkaLd`frd laca/k ifj’kn~ Hkkjr ljdkj }kjk bl gsrq p;u Hkkjrh; mPpk;ksx rFkk lacaf/kr fo”ofo|ky; ds ladk; }kjk lgefr ds mijkUr fd;k tkrk gSA bl vof/k dk mudk vkokxeu lfgr lEiw.kZ izokl dk O;; Hkkjrh; lkaLd`frd laca/k ifj’kn rFkk fLoV~tjySaM ds izfl) ywlku fLFkr fo”ofo|ky; }kjk ogu fd;k tk,xkA izks0 uohu pUnz yksguh ds mDr in ij dk;Z Hkkj xzg.k djus ls fLoVtjyS.M esa vUrjjk’Vªh; Lrj ij fgUnh ds fodkl gsrq u, vk;ke LFkkfir gksaxsAizks0 uohu pUnz yksguh ds vodk”kdky esa ladk;k/;{k dyk ds }kjk foHkkxk/;{k ds nkf;Ro dk fuoZgu fd;k tk,xkA  bl p;u gsrq vuqefr nsus ds fy, izks0 uohu pUnz yksguh us fo”ofo|ky; iz”kklu dk vkHkkj O;Dr fd;kA

Tuesday 3 January 2012

शमशेर को पूरा नहीं बल्कि चयन करके पढ़ना चाहिए, उनके पोजेटिव को ही ग्रहण करना चाहिए- प्रो0 निर्मला जैन


   
शमशेर की कविता फिलहालियत की कविता नहीं। शमशेर की कविता को जरा गौर से पढ़ना होगा। उनकी कविता अन्तःकरण में सीधे नहीं उतरेगी उससे सम्वाद करने के लिए विशेष तरह की तैयारी की जरूरत है। यह विचार आज हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ’शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता’ में  उदघाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जानी-मानी आलोचक प्रो0 निर्मला जैन ने कहा कि यह गौरव की बात है कि इतना बड़ा कवि स्थानीय स्तर पर हुआ। शमशेर की स्थिति दो मेडों पर खड़े हुए कवि की स्थिति है। उन्होंने वामपन्थी और प्रेम दोनों ही तरह की कविताएं लिखी। उन्हें रूप का कवि, एन्द्रियता का कवि तथा बिम्बों का कवि कहा गया। शमशेर उनमें से एक हैं जिन्होंने ऊँचाई ग्रहण की। उन्होंने कहा कि हम सभाओं, संगोष्ठियों में वहीं कह रहें है जो अब से पहले शमशेर के संदर्भ में कहा गया है। आज जरूरत इस बात की है कि शमशेर की कुछ ऐसी कविताएं खोजी जाए जो सीधे-सीधे पर्यावरण नष्ट होने की समस्या से, बाजारवाद से, भूमण्डलीकरण से संबंध रखती हों। जिन्होंने उसे आज का कवि बना दिया है। कुछ शोधार्थी उनके अनदेखे पक्षो पर शोध करें।
प्रो0 निर्मला ने कहा कि मैं आज तक यह समझ नहीं पाई कि शमशेर को ’कवियों का कवि’ क्यों कहा गया है। शमशेर जनता के कवि है, पाठक मात्र के कवि हैं। ’’हम न बोलेंगे-बात बोलेगी।’’ जैसी उनकी पंक्ति से पता चलता है कि यहां व्यक्ति का महत्व नहीं बल्कि रचना का महत्व है। शमशेर की कविता हिन्दी कविता में स्वाभिमान व  निर्भयता की आवाज है - इसलिए वे कवियों के कवि हैं। शमशेर की कविता में बड़े धीमे-धीमे गाड़ी चलती है जो हिंदी कविता की निर्भयता की अदम्य आवाज है। शमशेर के यहाँ कविता मनुष्य की सबसे अदम्य आवाज है, वह समयबद्ध होते हुए भी समयातीत है। शमशेर ने कहा भी है कि ऐतिहासिक राजनीति को परास्त करती हुई कविता भाषा की कालातीत राजनीति है। कुछ कवि शमशेर को अपना माॅडल बनाकर उनके जैसी कविता करना चाहेंगे। यदि यह कवि किसी का आदर्श है तो उसका आदर्श कौन है ? वह हैं निराला। निरला और शमशेर में समानता यह है कि दोनों समतल नहीं है। हर बड़ा कवि अनुकरणीय नहीं होता। निराला और शमशेर का कोई अनुकरण नहीं। उनको कवियों का कवि कहने वाले कवि भी उनका अनुकरण नहीं कर सके। प्रो0 निर्मला ने कहा कि शमशेर वो नदी है जिस पर पुल नहीं बनता। शमशेर ऐसे कवि है जो सोहबत से समझ में आते है, धीरे-धीरे आपको गिरत में लेंगे, धीरे-धीरे प्रभाव डालेंगे। पचास साल तक शमशेर ने निरन्तर कविता लिखी। ’एक पीली शाम’, ’बेठौस’, ’एक आदमी’, ’उषा’, ’कत्थई गुलाब’, ’एक निला दरिया बरस रहा’ तथा ’बैल’ उनकी प्रसिद्ध कविताएं हैं। ’बैल’ कविता कवि की आत्मस्वीकृती है। शमशेर गहन संवेदनशीलता के कवि हैं, उनके अनुभवों पर विचार हावी नहीं होता। शमशेर की कविता गढी हुई नहीं- विचार उनपर हावी नहीं होता। प्रेम की पीडा, अकेलेपन का अवसाद ये जीवन निरपेक्ष नहीं है। शमशेर बाहर तक पीडा का विस्तार करते हैं। जितने शोकगीत शमशेर ने लिखें शायद ही बाद के किसी कवि ने लिखे हों। एक मित्र के दिवंगत शिशु की याद में भी उन्होंने शोकगीत लिखा। उनकी एक भी ऐसी कविता नहीं जहां किसी के प्रति कोई काँटा हो, किसी का अपमान हो। प्रो0 निर्मला ने कहा कि उनकी भाषा सीमित काव्य भाषा नहीं बल्कि स्थापत्य, चित्र और संगीत उनकी भाषा में हैं। उन्होंने ग्रीक भाषा पर कविता लिखी, मणिपुरी भाषा की ध्वनियों पर कविता लिखी। उनकी लय शब्दों की नहीं, अर्थ की लय हुआ करती थी। उन्होंने खड़ीबोली को बोली की तरह इस्तेमाल किया - ’निंदिया सतावै मौहे।’ अंत में प्रो0 निर्मला ने कहा कि शमशेर को पूरा नहीं बल्कि चयन करके पढ़ना चाहिए, उनके पोजेटिव को ही ग्रहण करना चाहिए।
माननीय कुलपति डाॅ0 विपिन गर्ग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विभाग में लगातार आयोजित हो ऐसी मेरी अपेक्षा है। आज हम जिस व्यक्तित्व के विशलेषण के लिए इकट्ठा हुए है जहां तक मेरी सोच है तो - ’’जब कोई रचना करता है तो बस वो करता है, उसके बारे मे विष्लेषण करना, हमारी समझ है तथा परिवेष है, ऐसी मेरी समझ है।’’ कहकर उनके व्यक्तित्व एवं रचनाधर्मिता की सराहना की। 
दिल्ली से आए डाॅ0 रामेश्वर राय ने व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता विशेष तैयारी की मांग करती है। शमशेर की कविता के कथ्य ज्यादा परिचित नहीं। कथ्य का अपरिचयपन ही जटिलता है। विजय देव नारायण साही ने कहा है कि शमशेर बुनियादी रूप से दुरूहता के कवि हैं। प्रो0 राय ने मलयज की पंक्तियां व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता की कुछ निजी मांगे हैं। शमशेर की कविता का संसार आपा-धापी वाले संसार से बिलकुल अलग है। सामान्यतः शमशेर की चर्चा प्रगतिवादी कवि के रूप में होती है। वे अज्ञेय मुक्तिबोध शमशेर-नागार्जन मुक्तिबोध शमशेर- दोनों तरफ की त्रयी में आते हैं। शमशेर सौंदर्य के कवि है तथा साथ ही माक्र्सवादी रचनाकार भी। उन्होंने कहा कि हमें यह देखना है कि शमशेर माक्र्स के बारे मे क्या कहते है ? माक्र्स के साथ उनकी कविता का क्या संबंध है ? इन प्रश्नों के संकेत देते हुए शमशेर ने कहा है - ’’मैं उस अर्थ में कभी माक्र्सवादी नहीं रहा जिस अर्थ में मेरे प्रगतिशील कवि रहे हैं। माक्र्सवाद मेरी जरूरत थी, माक्र्स ने मुझे उबारा।’’ माक्र्सवाद उनकी पूरी अन्तश्चेतना पर छाया हुआ था और वह कहते थे कि मुझे हर वह चीज आकर्षित करती है जो मेरी प्रकृति से भिन्न है। माक्र्स के प्रति उनका रूझान प्रकृति की भिन्नता के कारण है। उन्होंने दर्जनों कविता माक्र्सवाद पर लिखी इसलिए माक्र्सवादी सिद्ध हो सकते हैं उनकी ऐसी ही कविताओं को नामवर सिंह ने प्रमाणवाद की कविता कहा है। कविताओं के आधार पर यह कहना कठिन नहीं कि उन्होंने मजदूरों पर, आन्दोलनों पर, प्रभातफेरियो पर कविताएं लिखी। शमशेर की कविता वैयक्तिकता की कविता है या निजता की कविता है। यह देख कर ही 1956 ई0 मंे नामवर सिंह ने उनकी कविताओं को एकालाप की कविता कहा है। प्रो0 राय ने कहा कि शमशेर ने जिन विषयों पर कविता लिखी व कविता प्रतिरोध का निर्माण करती है। यह देखकर ही उदय प्रकाश ने कहा था कि शमशेर प्रेम के अद्वितीय रचनाकार है। उनकी सामाजिक राजनैतिक कविता में अपने साथियों पर लिखा, राजनीति पर लिखा। यह सोचने का विषय है कि प्रेम का इतना बड़ा कवि प्रेम या प्रकृति पर लिखते हुए कोई प्रतिरोध पैदा करता है या नहीं। प्रेम के वो बहुत वाचाल कवि है। उनकी पंक्तियां है - ’’तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मछलियाँ पानी से करती हैं। तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मैं तुमसे करता हँू।’’ यह साफगोई शमशेर में बच्चन से भी कई अधिक दिखाई देती है। एक खास तरह की सघन एन्द्रियता उनके काव्य में दिखाई देती है। शमशेर ने कई जगह अपने अकेलेपन की चर्चा की है - ’’कोई पास नहीं, वजूज एक सुराही के, वजूज एक चटाई के, वजूज एक आकाश के।’’  प्रो0 राय ने कहा कि शमशेर सिर्फ एक सुराही, सिर्फ एक चटाई, सिर्फ खुले आकाश के साथ अकेले रह सकते हैं। खुश रहने की जो यह स्वीकृति है, साहस है, वह बाजार की पूरी संग्रहकारी बाजारवादी संस्कृति के विरोध में है। शमशेर की कविता अकादमिक विचारधारा की कविता नहीं बल्कि ऐसी कविता है जो मनुष्य की विडम्बनाओं को देखती है।                                                                 
डीन कलासंकाय प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने कहा कि शमशेर हमारे विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के अंग रहे है, ऐलम और देहरादून दूर नहीं। हमारे विश्वविद्यालय क्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के विविध आयामों की चर्चा हिंदी विभाग ने की, ये गौरव का विषय है। शमशेर ने अनुभव व विचार को आख्यान में बदल दिया, इस तथ्यात्मक प्रस्तुति को हम आख्यान कहते हैं, यह कहानी नहीं। शमशेर अपने आप में एक संस्था थे, संस्था वहीं होता है जिसके इर्द-गिर्द बहुत सी प्रतिभाएं घुमती है। हम उन्हें संस्था के रूप में देखकर विचार करें। उनके व्यक्तित्व, रचनाशीलता का मूल्यांकन यदि निष्पक्ष रूप से किया जाएं तो शमशेर एक संस्था के रूप में दिखाई देंगे। आज की संगोष्ठी निश्चित रूप से फलदायी होगी, विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव का विषय है। उद्घाटन सत्र का संचालन ललित कुमार सारस्वत, परियोजना अध्येता, उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग ने किया। 
संगोष्ठी के दूसरे सत्र ’’शमशेर की कविता के विविध आयाम’’ में इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि पद्मश्री लीलाधर जगूडी ने कहा कि शमशेर को समझने के लिए खास तैयारी की जरूरत है। शमशेर से टक्कर लेनी चाहिए वे शब्दों को गायब कर देते है, जैसे - ’एक नीला आइना बेठोस।’ - इससे वह केवल आकाश कहना चाहते है और आकाश जिस दिन ठोस हो जाएगा तो मैं हाथ पैर भी नहीं हिला पाऊगां। ऐसा बिम्ब पूरे साहित्य में नहीं मिलता। उन्हें समझने के लिए उनकी भाषा को, बिम्बों को जानना होगा। शमशेर ने निराला के बाद एक नई काव्य भाषा का निर्माण किया। निराला की भाषा को ढकेलते हुए शमशेर ने उस भाषा में सुन्दर और शानदार कविता रची। वे प्रतिरोध के कवि हैं उन्होंने माक्र्सवाद को भी कविता से अलग किया। शमशेर ने कहीं न कहीं प्रगतिशीलता को माक्र्सवादी दृष्टिकोण से अलग किया। ’’अब गिरा, अब गिरा वह अटका हुआ, सान्ध्यतारक सा।’’ इन पंक्तियों में जीवन की, प्रेम की, बहुत बड़ी व्यंजना मिलती है। 

इस सत्र में डाॅ0 जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि एक नये कवि के रूप में जब मैं उन्हें देखता हूँ, कविता की कला सीखने के लिए मैं जिन लोगों के पास जाता हूँ उनमें पहला नाम शमशेर का है। उनकी कविता अपने आप को पहचाने का सलीका सीखाती है, आप सीखते जायेंगे कि एक अच्छी कविता के क्या-क्या गुण हों ? आप सौन्दर्यवादी हो या माक्र्सवादी हो, आप को बस कविता की बेसिक समझ होनी चाहिए। कविता की फाॅर्म में लिखी हुई हर कविता कविता ही हो यह जरूरी नहीं, कविता की पहचान है कि यह सिखाती है। क्या कविता है और क्या कविता नहीं यह शमशेर की कविता के साथ जुड़ने पर साफ हो जाता है। डाॅ0 जितेन्द्र ने कहा कि शमशेर विशिष्ट है, पर विशिष्टबोध के कवि है, यह ठीक नहीं, व आम आदमी के कवि है। शमशेर की कविता ऊँचाईयों के लिए दम भरती है, ये क्रान्तिकारी कविताएं है या सौन्दर्यवादी कविताएं, इस पर विचार किया जाना चाहिए। 
प्रो0 दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि शमशेर की पूरी कविता पर पश्चिमी आंदोलनों का प्रभाव है। उस पर प्रतीकवाद, प्रभाववाद, रूपवाद, दादावाद, व्यंजनावाद का प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी आंदोलनों के संदर्भ में शमशेर की कविताओं को देखा जाए। औपनिवेशिक दौर में दौ सौ वर्षों में हिंदी में जो मध्य वर्ग तैयार हुआ था, उससे भी शमशेर की कविता जुड़ती है। प्रो0 गुप्त ने कहा कि शमशेर को मैं इस रूप में देखता हूँ कि वो बोलियों के मर्मज्ञ विद्वान थे साथ ही उनका उर्दू व अंग्रेजी पर पूरा अधिकार था। उर्दू शायरी की परम्परा का प्रभाव शमशेर पर है तथा अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव भी उनकी कविता पर देखा जाना चाहिए। इनकी कविताओं पर यथार्थवाद व बिम्बवाद का प्रभाव भी है जो खुद शमशेर ने स्वीकार किया है। वे अतियथार्थवाद के निकट है। पश्चिम के आंदोलन आधुनिकतावादी आंदोलन है, उनकी कुछ कविताओं पर, उनके शिल्प पर, भाषा पर पश्चिम का प्रभाव है। उनकी कविता पूरा रंगों का महोत्सव है। उनकी कविता में संगीत है, संगीत का साथ है जो इससे पहले हिन्दी कविता में नहीं मिलेगा। शमशेर की कविताओं में रूमानी तत्व उर्दू से आते है और वे उसे एक नया रूप देते हैं। शमशेर इस नाते भी बड़े है कि जो कविता में है, वहीं उनके जीवन में है। साहित्य की पूरी नैतिकता, पवित्रता को शमशेर जैसा कवि बहुत सहेज कर आगे बढ़ाता है। आज शमशेर की कविता आदर्श हो सकती है। उनके साहित्य के नैतिक स्वरों को अगर देखे तो उनके जैसा उनका समकालीन कोई नहीं। पूरी पाश्चात्य परम्परा को सजोते हुए शमशेर कहाँ स्थापित होते हैं, यह सोचने का विषय है। 
द्वितीय सत्र का संचालन एस0 डी0 काॅलिज, मुजफरनगर के प्रवक्त डाॅ0 विश्वम्भर पाण्डेय ने किया।
तृतीय सत्र ‘शमशेर का गद्य और अन्य पक्ष’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र में मुख्य अतिथि प्रो0 प्रेमचन्द पातंजलि, दिल्ली ने कहा कि जब व्यक्ति जीवित रहता है तो उसे कोई याद नहीं करता, यही विडम्बना शमशेर के साथ भी रही। ईष्र्या जन्य पीढ़ी ने शमशेर को पनपने नहीं दिया। साहित्य के मठाधीशों ने उन्हें दूर रखा। वे किसी मठ से बंधने वाले कवि नहीं थे शमशेर निराला का कौरवी एडीसन है। मेरी इच्छा है कि उनके नाम पर पुस्तकालय अथवा स्मारक बनना चाहिए। 
डाॅ0 गजेन्द्र सिंह ने कहा कि शमशेर आधुनिक सन्र्दभों में ऐसे साहित्यकार है जिन्हें पढ़ा जाना जरूरी है। शमशेर को साहित्यिक गुटबदियों के कारण उस तरह से नहीं पढ़ा गया जैसे पढ़ा जाना चाहिए। परिवेश से व्यक्ति अपने गद्य का निर्माण करता है। हर व्यक्ति संघर्ष से आगे बढ़ता है। जिस तरह निराला संघर्ष कर आगे बढ़े उसी प्रकार शमशेर भी। चाहे अज्ञेय हो, मुक्तिबोध हो या कीर्ती चैधरी, उनके बीच शमशेर ने अपना स्थान बनाया। शमशेर ने अपने गद्य में गाँव की समस्या, बेरोजगारी की समस्या को उठाया। अन्तरराष्ट्रीय संबंधों पर जैसा शमशेर ने लिखा, वैसा कोई नहीं लिख सका। प्रो0 मीरा गौतम ने शमशेर के गद्य से जुड़े कुछ ज्वलन्त मुद्दों की ओर संकेत किया। तृतीय सत्र का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया। 
संगोष्ठी में हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर शहर के प्रतिष्ठित कवि, लेखक और शिक्षक डाॅ0 वेदप्रकाश ‘वटुक’, ईश्वर चन्द गंभीर, ज्वाला प्रसाद कौशिक, ज्ञानेश दत्त हरित,     डाॅ0 कृष्णा शर्मा,  डाॅ0  वन्दना शर्मा, 




 डाॅ0 पूनम शर्मा,  डाॅ0 रीना ठाकुर,  डाॅ0  दीपा त्यागी,  डाॅ0  विजय बहादुर त्रिपाठी,  डाॅ0  शशि बाला अग्रवाल,  डाॅ0  अनिल शर्मा,  डाॅ0  वीना वत्स,  डाॅ0  नेहा शर्मा,  डाॅ0  निशा जैन,  डाॅ0  ज्वाला प्रसाद कौशिक,  डाॅ0  सरिता वर्मा,  डाॅ0  प्रियंका,  डाॅ0  ऊषा माहेश्वरी,  डाॅ0  गीता शर्मा,  डाॅ० स्नेह लता,  डाॅ0  राम यज्ञ मौर्य,  डाॅ0  मिन्तु,  डाॅ0  अर्चना सिंह,  डाॅ0 सुनीता,  डाॅ0  
 विक्रम सिंह,  डाॅ0  शीला शर्मा,  डाॅ0  ललिता यादव,  डाॅ0  कुसुम नन्दा,  डाॅ0   वीणाशंकर शर्मा,  डाॅ0  कन्चन पुरी,  डाॅ0  निशा गोयल,  डाॅ0  कविता त्यागी,  डाॅ0  निर्मला देवी,  डाॅ0  साधना तोमर,  डाॅ0  गीता रानी,  डाॅ0 नीलम राणा,  डाॅ0  प्रतिभा चौहान, डाॅ0 निकिता,  डाॅ0  वीना शर्मा,  डाॅ0  विश्वम्भर पाण्डेय आदि तथा विश्वविद्यालय के प्रो0 आर0 के0 सोनी, प्रो0 एम0 के0 गुप्ता, हिन्दी विभाग के शिक्षक आलोक प्रखर, डाॅ0 सीमा शर्मा डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, अंजू, आरती, विवेक सिंह तथा छात्र-छात्राओं में मतेंद्र कुमार, निर्देश चौधरी, रीना देवी, कमला, पारस धामा, निशान्त जैन, यसमीन अहमद, सोनू, रीता, पारुल  कुमारी, नरेन्द्र कुमार, प्रदीप कुमार , बबीता चौधरी, प्रेम सिंह, पवन कुमार, राजीव कुमार, मनीष वर्मा, मीनू,  शिवानी, कौशल संध्या, मोहनी, पूजा, मिलिन्द गौतम, आयूषी आदि उपस्थित रहे। 

Thursday 22 December 2011

शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता

हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा साल २०१२ का प्रथम संगोष्ठी कार्यक्रम ०३ जनवरी २०१२ को आयोजित किया जा रहा है, विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सभी महाविद्यालयो के शिक्षक साथियों  को उक्त आयोजन में आमंत्रित किया जाता है ! कृपया इस संगोष्ठी की सूचना अपने शिक्षक साथियों तथा छात्र -छात्राओं को भी अवगत कराएँ और अपने आने संबन्धी सूचना ई -मैल, फोन अथवा मोबाइल से हमे अवगत कर दें जिसके अनुसार व्यवस्था सम्पन्न कराई जा सके ! संगोष्ठी में प्रपत्र प्रस्तुत करने हेतु कृपया दिनांक ३१ दिसम्बर २०११ तक क्रुतिदेव १० अथवा युनिकोड से मेल nclhindiduniya@gmail.com अथवा डाक से हिन्दी विभाग विभाग में उपलब्ध कराने का कष्ट करें ! अधिक जानकारी के लिए पढ़ते रहें http://www.manthanvicharpatrika.blogspot.com और फोन करें 0121-2772455 ! 




Thursday 8 December 2011

साहित्य को ’एन्ज्वाय’ करना होगा तब जाकर कहीं लगेगा कि हम साहित्य को जी रहे हैं- तेजेन्द्र शर्मा



दिनांक 8 दिसम्बर 2011। ’लेखक प्रवासी हो सकता है, साहित्य प्रवासी नहीं हो सकता।’ साहित्य किसी विचारधारा के दबाव में नहीं लिखा जाए। साहित्य के लिए विचार जरुरी है विचारधारा जरुरी नहीं क्यांेकि आम आदमी का दर्द किसी विचारधारा का मोहताज नहीं। आपको लेखक होने के लिए संवेदनशील होना जरूरी है। जहाँ आप रहते हैं वहाँ के विचार आपकी कहानियों में परिलक्षित होते हैं। ये विचार आज चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के हिन्दी विभाग में आयोजित संगोष्ठी ’’प्रवासी हिन्दी साहित्य एवं कहानी पाठ’’ में ब्रिटेन में रह रहे हिन्दी के कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब हिन्दी में प्रवासी साहित्य नाम की संज्ञा बनाई गई तो मैंने जिज्ञासावश पूरी दुनियां की भाषाओं को खंगाला तो पाया कि दुनियां की किसी भाषा में प्रवासी साहित्य जैसी कोई बात है ही नहीं। हिन्दी वालों को कंपार्टमेंट बनाने का शौक है हम साहित्य को साहित्य नहीं रहने देना चाहते। उसे दलित साहित्य, महिला लेखन आदि खानों में बांटते हैं। साहित्य अमरीका, कनाडा, खाड़ी देशों में भी लिखा जा रहा है यह सारा प्रवासी साहित्य है। क्या प्रवासी साहित्य जो इन देशों में लिखा जा रहा है यदि एक है तो पूरा है क्योंकि जिस देश-परिवेश में हम रहते हैं तो यदि वह हमारे साहित्य में लक्षित नहीं होता तो वह साहित्य नहीं। श्री तेजेन्द्र ने कहा कि अगर मैंने लन्दन, ब्रिटेन को जाना तो मेरी कोशिश होगी कि ब्रिटेन व लन्दन मेरे पन्नों पर बिखर जाए। मेरी कहानी का औचित्य तभी है जब पाठक को लगे कि मैंने कोई नई चीज सीखी। उन्होंने बम्बई का जिक्र करते हुए कहा कि बम्बई के साहित्य में बंबई जिन्दा क्यों नहीं है वह इसलिए कि बम्बई मंे एक भी हिन्दी लेखक नहीं जो बम्बई में जन्मा हो। जो कवि हैं उन्हें आजमगढ़-नैनीताल याद आता है, जो कहानीकार हैं वे उसे ही अभिव्यक्त करते हैं जहाँ से उठकर आए। अपने शब्दों को वाणी देते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने पंक्तियाँ पढी -
’’बहुत दिन से मुझे अपने से ये शिकायत है
वो बिछडा गांव मेरे सपनों में नहीं आता
वो बैलों की घंटी, नदी का किनारा याद नहीं आता।’’
उन्होंने टिप्पणी करते हुए भारत से जाने के बारे में कहा कि रात को सोया तो सपनों में गांधी जी आए कि बेटा भारत छोडों, मैंने छोडा और वहाँ जाकर देखा कि हिन्दी की क्या स्थिति है और एक इच्छा जागी कि हिन्दी के लिए कुछ कँरु। प्रवासी शब्द पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में रहते हुए मेरे तीन कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे, वे मुझसे पूँछते है कि हमारा क्या कसूर, हम क्यों प्रवासी हो गए, जो लेखन भारत के लिए हुआ था वह भी प्रवासी हो गया।  मैं जब रात को सोता हूँ तो इंग्लैण्ड मुझसे सवाल करता है-
’’जो तुम ना मानों मुझे अपना हक तुम्हारा है
यहाँ जो आ गया एक बार बस तुम्हारा है
तरह-तरह के परिंदे बसे है आकर यहाँ
सभी का दर्द यहाँ आकर संवारा है।
नदी की धार बहे आगे मुड़कर ना देखे
न समझो इसको भंवर यही किनारा है।’’
उन्हांेने कहा कि कोई भी लेखक कितना ही गंभीर क्यों न हों वह बिना सोचे नहीं लिख सकता। भारत में हिन्दी के छोटी कथाओं में पढाने पर तंज करते हुए कहा कि जब भारत में युवा पीढी को हिन्दी पढ़ाने में दिक्कत है तो इग्लैण्ड में कैसा होगा ? ’हिन्दी साहित्य इज ए पार्टटाइम एक्टीविटी’ टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हर हिन्दी लेखक खाकर लिखता है, लिखकर कोई नहीं खाता। हिन्दी के लेखक को बताना पड़ता है कि मेरी किताब छपी है। ऐसे में हम यह लड़ाई इग्लैण्ड में लड़ रहे हैं। वहाँ कोई राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, संजीव को नहीं जानता। हमे अभी बहुत कुछ करना है और युवा पीढी से बहुत सी आशा है।
श्री शर्मा ने कहा कि साहित्य हमारा ’इनबिल्ट’ हिस्सा बनना चाहिए। साहित्य को ’एन्ज्वाय’ करना होगा तब जाकर कहीं लगेगा कि आप साहित्य को जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस लेखक की पाठ्यक्रम में रचना लगी है उसकी कम से कम दो किताब पढ़नी चाहिए तब उस लेखक को समझा जा सकता है। मेरी पंजाबियत की चासनी मेरी कहानियों को जीवंत बनाती है। हमें उधार की भाषा की जरुरत नहीं। हर लेखक को अपनी एक अलग भाषा बनानी चाहिए। आज का पाठक कहानी को ’लॉजिकली’ समझना चाहता है। कहानी बहुत कठिन विधा हो गई है क्योंकि बहुत सारे आन्दोलनों ने कहानी को कठिन कर दिया। कहीं रोचकता गायब है कही कुछ कहानी में से कहानीपन कहीं खो गया है। आज हमें नामवर सिंह की तरफ नहीं देखना। हमें अपने आलोचक खुद बनाने होंगे। पुराने आलोचकों के पास नया सीखने की इच्छा नहीं, वे आदरणीय हैं। आदरणीय की वजह से काम न रूके। हमें नई पीढी के आलोचक चाहिए। अजय नावरिया, सुशील सिद्धार्थ जैसे नवयुवा हमारी आलोचना का हिस्सा बनेंगे। ये खुले दिमाग के है। आज तक नामवर सिंह कविता के मानदण्डों से कहानी को नापते रहे। नई पीढ़ी आगे आकर नये सिद्धान्त बनाए। उन्होंने कहा कि कुछ करोड़ लोग तो हिन्दी पढ़ते होंगे। हजार-पन्द्रह सौ ’हंस’, ’कथादेश’ भी पढ़ते होंगे, हिन्दी की सबसे बड़ी पत्रिका कितने हिन्दीभाषियों तक पहुँचती होगी। हमें मुख्यधारा के द्वार खोलने होंगे। जो युवा लेखक आए हैं वे ’वाद’ के दबाव में लेखन नहीं करते, वे कहते हैं कि हम दलित लेखक नहीं है। लेखन को लेखन माना जाए। अगर मन्नू भण्डारी का लेखन अच्छा है तो इसलिए अच्छा है या खराब, इस कारण नहीं है कि वह महिला है। 
श्री तेजेन्द्र ने बताया की महुवामाजी के मैं ’बोरीसाइल्ला’ व प्रमोद तिवारी के ’डर हमारी जेबों में’ उपन्यासों को इग्लैंण्ड में इसलिए सम्मानित किया गया कि इन उपन्यासों में बंग्लादेश बनने, उस समय का बिहार कैसा था , आदि मुद्दों पर व्यापक शोध किया गया है। हिन्दी साहित्य को शोध करने की प्रवृŸिा विकसित करनी होगी। नई पीढ़ी को नए मुहावरे गढ़ने हैं जब आप ये काम करेंगे तो हिन्दी साहित्य की ’सीरियस’ सेवा करेंगे। 
इस अवरसर पर श्री तेजेन्द्र ने अपनी कहानी ’कब्र का मुनाफा’ का कहानी पाठ भी किया। अंग्रेजी विभाग के प्रो0 अरुण कुमार ने इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लग रहा था जैसे हम मंच पर कोई नाटक देख रहे हो। प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि कहानी का प्लाट प्रशंसनीय है और तेजेन्द्र जी स्वंय ही पात्रों की बखूबी भूमिका निभा रहे थे। कहानी में कही भी क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ। 
कहानीकार अजय नावरिया ने तेजेन्द्र शर्मा के विचारांे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मैं इनकी कुछ बातों से असहमत हूँ, मैं अप्रिय सत्य बोलने के लिए बदनाम हूँ। उनकी कहानियों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कहा कि प्रश्नाकूलता की जगह हो दूसरे इस पर विचार करें। उन्होंने मुख्य धारा वाली बात पर सवाल उठाते हुए कहा कि कहा कि इस मुख्यधारा से बहुत से लोग त्रस्त है। मुख्यधारा मिथ ज्यादा है यथार्थ कम। स्त्रियों के सच हम कैसे बता सकते हैं ? प्रवासी लेखन की बात देखे तो निर्मल वर्मा की दो कहानियाँ ’परिदे तथा ’लन्दन की एक रात’ से प्रवासी लेखन की शुरूआत मानी जाए। ’परिंदे कहानी में एक शब्द ’होमसिकनेस’ आता है। यह भारत के पहाडी प्रदेश की कहानी है। डॉ मुकर्जी जो बर्मा से प्रवास करके भारत आए उनकी ख्बाहिश है कि मै एक बार बर्मा फिर जाऊँ। ’होमसिकनेस’ एक बीमारी है। ’नास्ट्रेजिया’ बीमारी नहीं। बल्कि एक राग है, घर से दूर जाने का राग है। इसमें दुख भी है सुख भी है रोना सुख की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। उन्होंने ’लन्दन की एक रात’ का हवाला देते हुए कहा कि अगर निर्मल वर्मा लन्दन न रहते तो वहाँ का दुख नहीं जान पाते। नावरिया ने कहा कि निर्मल वर्मा से लेकर अब तक उस खाई को तेजेन्द्र शर्मा भरते हैं। शर्मा जी की कहानियों के तीन हिस्से हैं एक भारत की समस्याओं पर, दूसरा आवागमन के बीच की यादों पर जैसे ’काला सागर’, ’देह की कीमत’ आदि मार्बल्स कहानियाँ है। तेजेन्द्र शर्मा वहाँ की मनोूभूमि-परेशानियों पर लिखते हैं। हिन्दी साहित्य में तेजेन्द्र अपनी कहानी ’कल फिर आना’ के लिए काफी लांक्षित हुए। कहानी में तेजेन्द्र ने एक स्त्री को सामान्य स्त्री के रूप में देखा। अगर उसकी नैसर्गिक जरूरते पूरी न हो तो कैसे विकार पैदा होते हैं।  
प्रो0 लोहनी ने श्री तेजेन्द्र की पत्रिका ’रचना संसार’ से कुछ उदाहरण देते हुए बताया कि ’इनकी समकालीन कहानी भारत का आधा गांव है।’ अब इनकी कहानियों को लेकर मूल्यांकन हो रहा है। आज हिन्दी बड़ी हो रही है। शर्मा जी जिस परिवेश को जगा रहे हैं उससे हम वहाँ की समस्याओं, विडम्बनाओं को समझेंगे। वे मनुष्य में बची हुई संवेदनशीलता पर कहानियाँ लिखते है। सहमति-असहमति हमारी निजी भी हो सकती है। 
मेरठ के साहित्यकार एवं फोकलोर वर्कले में प्रोफेसर रहे प्रो0 वेद प्रकाश ’वटुक’ ने कहा कि सन् 90 तक मुझे किसी ने नहीं कहा कि तुम्हारा प्रवासी लेखन है। हिन्दी का हर लेखक प्रवासी है जो गाँव से उठकर शहर आता है वो प्रवासी है। आज तक किसी भी अंग्रेजी के भारतीय लेखक ने अपने को प्रवासी लेखक नहीं कहा। सन् 60 में मैंने जो भी लिखा अमेरिकन आन्दोलनों के बारे में लिखा। जो भारतीय विदेशों में जाते है वे भारतीयों की ही बात करते हैं। वे किसी आन्दोलन में शामिल नहीं हुए। अगर हम मॉरीशस के साहित्य को प्रवासी साहित्य कहे तो अमरीका का पूरा साहित्य प्रवासी साहित्य है क्योंकि 200 वर्ष पुराना यह भी है और वह भी है। 
कला संकाय के डीन प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने कहा कि साहित्यकारों ने ’कल्चरल बोंडस’ को मजबूत बनाने के लिए अच्छा प्रयास किया। हिन्दी के ’कैनवास’ को बड़ा करने के लिए उनके प्रयास प्रशंसनीय हैं। समाज के ’कानफ्लिक्ट’ को रोचक वे में प्रस्तुत किया। हम उससे सीख ले सकते हैं कि उस कानफ्लिक्ट’ से हम कैसे स्वंय को अलग करें। हमारा हिंदी साहित्य कम नहीं है बस कैनवास को बढाया जाए। इस अवसर पर तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी गजले भी सुनाई। 
हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। संचालन मोनू सिंह ने किया इस अवसर पर मेरठ के साहित्यकारों में किशन स्वरूप, ज्वाला प्रसाद ’साधक’, ईश्वर चन्द्र गंभीर तथा डॉ0 सीमा शर्मा, आलोक ’प्रखर’, रवीन्द्र कुमार, अंजू, आरती राणा, ललित कुमार सारस्वत, विवेक आदि तथा हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं में प्रगति, अनुराधा, प्रियंका, पिण्टू, दलीप, चरन सिंह, राहुल, कौशल, मनीषा, ज्योति सिंह, शिवानी आयुषी, पूजा, लता, विनय आदि उपस्थित रहे।
                                                                 
                                          
                                                                           


Wednesday 14 September 2011

’हमें मानसिक दासता मिटानी ही पड़ेगी, यदि हम हिन्दी का विकास चाहते हैं-प्रो0 वेद प्रकाश ’वटुक’

मेरठ  दिनांक 14 सितम्बर 2011.......
’हमें मानसिक दासता मिटानी ही पड़ेगी, यदि हम हिन्दी का विकास चाहते हैं। हमें अपने आत्मविश्वास व आत्मगौरव को ऊँचा करना है।’ये उद्गार चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ’हिन्दी विभाग’ में ’हिन्दी दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम  के अन्तर्गत मुख्य अतिथि, मेरठ के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं फोकलोर इन्स्टीट्यूट बर्कले, कैलीफोर्निया में प्राध्यापक प्रो0 वेद प्रकाश ’वटुक’ ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिन्दी की सेवा करने जैसा वाक्य मुझे अच्छा नहीं लगता जब लोग मुझसे मेरे लिए यह कहते हैं बल्कि ठीक बात तो यह है कि वहीं हिन्दी हमें आशीर्वाद देती है, जिससे हम जीवित हैं। हिन्दी जीवित रहेगी भले ही आप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाए। वह जनता की भाषा है और जब तक जनता है, भाषा भी जीवित रहेगी। उन्होंने कहा कि हम कब तक हिन्दी दिवस मनाते रहेंगे, अब तो राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी को बन ही जाना चाहिए। हमें आज से ही हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करना होगा। उन्होंने व्यंग्य किया कि जो लोग हिन्दी का झण्डा उठाएं हुए हंै उनके बच्चे भी अंग्रेजी स्कूलों में पढे़ हैं। प्रो0 ’वटुक’ ने ’हिन्दी दिवस’ पर हिन्दी के प्रति असीम प्रेम व्यक्त करते हुए कविता पाठ भी किया - 
उन्होंने कहा कि हिन्दी सबकी है और सब हिन्दी के हैं। एन0ए0एस0 महाविद्यालय, मेरठ के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा पूर्व में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करने वाले डाॅ0 सूरजपाल शर्मा ने विभाग की अपनी यादों को ताजा किया। राष्ट्रभाषा-मातृभाषा-जनभाषा-सम्र्पक भाषा और भविष्य की विश्व भाषा हिन्दी का स्तवन्न करते हुए उन्होंने सभी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि -
इस अवसर पर क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी डाॅ0 बी0एन0 शुक्ल ने कहा कि हिन्दी के भीतर इतनी शक्ति है कि वह तमाम चुनौतियों का सामना करती आई है। उन्होंने कहा कि जो लोग गिरमिटिया मजदूरों के रूप में माॅरीशस या दूसरे देशों में गए तो अपने साथ रामचरितमानस के गुटके, हनुमान चालीसा, लेकर गए। गन्ने की खेती करने के बाद इनके पठन-पाठन से वे अपनी संस्कृति-सभ्यता से जुड़े रहे किंतु इसके विपरीत शासनकर्ता नहीं चाहते थे कि वे अपनी संस्कृति से जुड़े। उनके शरीर पर गन्ने का रस लगा दिया जाता था, जिससे चीटे चिपकते थे किन्तु उन्होंने अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि हिन्दी के लिए हमें लोक की ओर मुड़ना होगा। केवल बाजार के लिए हिन्दी साहित्यकारों ने लेखन नहीं किया। निराला, धूमिल ने कैसी जिन्दगी बिताई। देश के साहित्यकार, जनता सारे कष्ट सहकर भी भाषा के लिए जीवित रह सकते हैं। 

चै0 चरण सिंह वि0वि0 मेरठ के डीन कलासंकाय प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने कहा कि हिन्दी निश्चित रूप से भारत को एक सूत्र में बांधने में सफल होगी। हिन्दी के दो पक्ष मुझे दिखाई देते हैं एक सैद्धान्तिक पक्ष और दूसरा व्यावहारिक पक्ष। गांधी जी ने हिन्दी को हिन्दुस्तानी नाम दिया था और हिन्दुस्तानी को उस भाषा का दर्जा दिया था जो देश को एक सूत्र में बांध सके, जो सारे भारतवासियों की जबान बन सके। प्रो0 अग्रवाल ने कहा कि हमें न किसी भाषा से घृणा करनी है, हिन्दी को विश्वव्यापी बनाने के लिए हम किसी भाषा को छोड़ने लगे, यह ठीक नहीं। आप जितनी भी भाषा सीखेंगे उतनी ही ज्ञान की वृद्धि होगी और भाषा का विकास होगा। यह भाषा का व्यावहारिक पक्ष है। हम हिन्दी भाषा को इसी रूप में स्थापित करें। हिन्दुस्तानी आज पुरानी नहीं हुई बल्कि उसकी वही महत्ता आज भी है। हमें हिन्दी में ऐसे शब्दों का चयन करना होगा कि वह हर स्तर पर अपनाए जाए। तभी हिन्दी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी। हम शुद्ध-अतिशुद्ध-परिमार्जित-अतिपरिमार्जित, के चक्कर में न पडे बल्कि जनसाधारण को जोड़ने के लिए हमें हिन्दुस्तानी का ही प्रयोग करना पडेगा।
इस अवसर पर शहर के कवियों ने भी अपना काव्य पाठ किया। डाॅ0 अशोक मिश्र ने शहर की फिजा पर व्यंग्य यूं कसा -
प्रसिद्ध ग़ज़लकार कुमार अनिल ने कहा कि हिन्दी के प्रति असीम प्रेम इन पंक्तियों में व्यक्त किया-
’’पालने से निकलके देखों तो, अब जमीं पर भी चलके देखो तो ।
कुछ तो दूरी फलक से कम होगी, तुम जरा-सा उछलके देखो तो।
इस जहां को बदलने निकले हो, पहले खुद को बदलके देखो तो।
ढलता सूरज बहुत दुआ देगा, तुम चरागों-सा जलके देखो तो।
कि चान्द छत पर बुला रहा है, साथ उसके टहलके देखो तो।
गा रही है हवा अनिल की ग़ज़ल, घर के बाहर निकलके देखो तो।’’

इस अवसर पर आषु भाषण प्रतियोगिता में विभाग के छात्र-छात्राओं मंे विवेक सिंह ने प्रथम, प्रगति ने द्वितीय, मिलिन्द ने तृतीय, ज्योति ने चतुर्थ और सन्ध्या ने पंचम स्थान प्राप्त किया। कविता प्रतियोगिता में ज्योति ने प्रथम, विवेक सिंह ने द्वितीय, प्रियंका ने तृतीय, प्रगति ने चतुर्थ, तथा मोहनी ने पंचम स्थान प्राप्त किया। प्रतियोगिताओं में निर्णायक मण्डल में डाॅ0 अषोक मिश्र, डाॅ0 प्रियंका तथा डाॅ0 गजेन्द्र सिंह शामिल थे। प्रतिभागियों को अतिथियों द्वारा स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र तथा पुरूस्कार राषि प्रदान की गई।
हिन्दी दिवस के इस कार्यक्रम में पधारे समस्त अतिथियों का विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने आधार व्यक्त किया तथा कहा कि लोक भाषाओं से शब्दों को ग्रहण करें, हिन्दी का विकास होगा। आज हिन्दी रोजगार के साधन देने में भी समर्थ हो रही है। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया।
इस अवसर पर डाॅ0 आर0के0सोनी, डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 सीमा शर्मा, डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, डाॅ0 गजेन्द्र सिंह, अंजू, आरती, डाॅ0 प्रियंका, आंचल, अलूपी, निवेदिता, बबीता आदि तथा हिन्दी विभाग के विद्यार्थी उपस्थित रहें।




































आप सभी का मंथन विचार पत्रिका के इन्टरनेट संस्करण में स्वागत है..

"कैमरे के फ़ोकस में - मंथन पत्रिका और विभागीय गतिविधियाँ " को ब्लॉग के बायीं ओर लिंक सूची में देखें .......