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Wednesday, May 25, 2011

हिंदी विभाग के स्थापना दिवस कार्यक्रम पर आप सब को हार्दिक बधाई






















‘वैष्वीकरण से हिन्दी को कोई खतरा नहीं है: कुलपति’

‘हिन्दी विभाग के स्थापना दिवस समारोह में मंथन पत्रिका का विमोचन’

चौधरी चरण सिंह विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एन0 के0 तनेजा ने कहा कि वैष्वीकरण से हिन्दी को कोई खतरा नहीं है। उन्होंने कहा कि बाजारवाद ने आधुनिक काल में हाषिये पर गए लोगों का जितना चिन्तन किया उतना चिन्तन इनका अन्य किसी काल में नहीं हुआ है।  वह विष्वविद्यालय के नौवें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने विभाग की पत्रिका ‘मंथन’ के विषेषांक का भी विमोचन किया। ‘21 वीं सदी की चुनौतियाँ और हिन्दी साहित्य विषय पर आयोजित संगोष्ठी को अध्यक्ष पद से संबोधित करते हुए प्रो0 तनेजा ने कहा कि विचारधारा और वैज्ञानिकता परस्पर दो किनारे हैं, यह कभी आपस में नहीं मिलते। आधुनिक काल में स्वहित विकास का एक बड़ा आधार बनकर उभरा है। स्वहित अनुषासित होना चाहिए जिसका साहित्य में भी वर्णन है। भाषा और साहित्य की विषयवस्तु सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई है। कुलपति ने हिन्दी विभाग की प्रषंसा करते हुए कहा कि अल्प साधानों से विभाग ने जो प्रगति की है, वह सराहनीय है। उन्होंने इसके लिए विभागाध्यक्ष, षिक्षकों और छात्र-छात्राओं की प्रषंसा की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गुरूकुल कांगड़ी विष्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो0 धर्मपाल आर्य ने कहा कि आधुनिक काल में भौतिकतावादी प्रवृतियों ने जीवन में अन्तर्विरोध पैदा कर मनुष्य को अवसाद की ओर धकेल दिया है। पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता की कोई परिभाषा नहीं रही है। मनुष्य के जीवन का कोई मूल्य नहीं रहा है। इन सामाजिक स्थितियों ने साहित्यकारों को गहराई से झकझोरा है। इसके चलते साहित्य में व्यापक रूप से इन प्रवृत्तियों का शब्दांकन हुआ है। साहित्य में महिला आन्दोलन, दलित आन्दोलन और विविध काव्य आन्दोलन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जिनमें मनुष्य जीवन की विडम्बनाओं को रेखांकित किया गया है। उन्होंने कहा आज का साहित्य समाज को गहराई से अभिव्यक्त कर रहा है। 
विषिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल फोकलोर इंस्टीट्यूट, कनाडा के निदेषक प्रो0 वेदप्रकाष ‘वटुक’ ने कहा कि आज साम्राज्यवाद और आतंकवाद से कैसे बचा जा सकता है, इस विषय पर साहित्यकार को सोचना होगा। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा को सम्मान दिलाने के लिए हमें दूसरों की भाषा का सम्मान करना पड़ेगा। हिन्दी में बहुत से सिद्ध लोग हैं, जो प्रसिद्ध नहीं हैं। हमें हाषिये के उन लोगों को साहित्य में स्थान देना होगा। हिन्दी साहित्यकारों को यथार्थ का सामना करने के लिए भी तैयार करना होगा। विष्व में हिन्दी की जो स्थिति है, उस पर भी विचार करना होगा। तभी हिन्दी के सम्मान में और वृद्धि होगी। 
पत्रकार प्रदीप माण्डव ने कहा कि आज चारों स्तम्भ अपनी महत्ता और विष्वसनीयता खो चुके हैं इसलिए पाँचवे स्तम्भ के विषय मंे विचार करने की आवष्यकता है, उन्होंने कहा कि साहित्य और समाज दोनों के सरोकार समान हैं। उन्होंने कहा जिस तरह से पाठ्यक्रमों में साहित्य की महत्ता है उसी तरह सेल्यूलाइड साहित्य अर्थात फिल्मों को भी पाठ्यक्रमों में षामिल किया जाना चाहिए। 
कला संकायाध्यक्ष प्रो0 आर0 एस0 अग्रवाल ने कहा कि वैष्वीकरण की चुनौतियों से निपटने के लिए साहित्यकार आदर्ष प्रारूप जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करें। वैष्वीकरण के प्रति साहित्यकार जनचेतना जागृत करें। 
कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवि डॉ0 हरिओम पवांर ने ‘‘मैं भारत का संविधान हूँ, लाल किले से बोल रहा हूँ’ कविता सुनाकर कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। 
विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने विभाग की प्रगति पर प्रकाष डालते हुए कहा कि विभाग के विद्यार्थियों ने जे0आर0एफ0 और नेट में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की हैं। अनेक विद्यार्थी व्यावसायिक क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान पर हैं। विभाग निरंतर विद्यार्थियों के चहुँमूखी विकास के लिए कार्यषाला, संगोष्ठी और अतिथि विद्वानों के व्याख्यान आयोजित करता रहता है। इस अवसर पर विभाग के प्रतिभाषाली विद्यार्थियों को कुलपति ने सम्मानित किया। सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम में अतिथियों को कुलपति ने समृति चिह्न भेंट किए। कार्यक्रम में प्रो0 वाई0 विमला, प्रो0 सुरक्षापाल, प्रो0 वी0के0 रस्तौगी, प्रो0 एम0यू0 चराया, डॉ0 जे0पी0यादव, कवि ईष्वर चन्द्र गंभीर, सत्यपाल सत्यम, डॉ0 अषोक कुमार मिश्र, डॉ0 सीमा शर्मा, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, अंजू, आरती, अमित, मोनू, ललित, कौषल, राहुल, निवेदिता, रेखा राणा, कुसुम, आदि उपस्थिति रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ0 रवीन्द्र कुमार एवं डॉ0 विपिन शर्मा ने किया।



साल भर के लिए लक्ष्य निर्धारित करें कि हमें क्या कैसे करना है
आइए शुरूआत करें .........( प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी )

Monday, March 28, 2011

अखवारों और वेब पर प्रतिक्रियाएं





पूंजी के केन्द्र में आ जाने के कारण आज सारे रिश्तें बेमानी हो गये हैं- प्रो0 अरूण होता


चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, नई दिल्ली की ओर से वर्ष 2010-2011 की   प्राध्यापक व्याख्यान यात्रा कार्यक्रम के अन्तर्गत पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय, कलकत्ता के प्रो0 अरूण होता ने अपने व्याख्यान माला पहले दिन अपने विचार रखते हे कहा कि  ‘पंूजी के केन्द्र में आ जाने के कारण आज सारे रिश्तें बेमानी हो गये हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो ‘सवहि नचावति पूंजी गुसाई’ की स्थिति पैदा हो गयी है। अब न आस्था है, न विश्वास है, न मूल्य है यहाँ तक कि भगवान भी एक प्रोडक्ट बन गया है। उनका मानना है कि प्रकृति के उपयोग और दोहन में अन्तर है, प्रकृति तो बनी ही मनुष्य के उपयोग के लिए है लेकिन आज उसका जिस प्रकार हम निरन्तर दोहन कर रहे हैं यह चिन्तनीय प्रश्न है।’
उक्त विचार पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय, कलकत्ता के प्रो0 अरूण होता ने ‘समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण चेतना एवं बोध’ विषय पर हिन्दी विभाग में छात्र-छात्राओं को व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। प्रो0 अरूण होता, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2010-2011 की प्राध्यापक व्याख्यान यात्रा कार्यक्रम के अन्तर्गत हिन्दी विभाग,   चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में व्याख्यान देने आए हैं।
समकालीन हिन्दी कविता में पर्यावरण चेतना एवं बोध पर व्याख्यान देते हुए उन्होने कहा कि हमारे समकालीन हिन्दी कवि पर्यावरण संकट को किस रूप में देखते हैं, यह आज का विचारणीय प्रश्न है। उनका कहना था कि प्रकृति को छोड़कर संस्कृति और साहित्य विकसित नहीं हो सकता। औद्योगिक क्रान्ति प्रकृति और मानवीय संवेदना के मध्य सम्बन्ध विच्छेदित करने का कार्य करती है। यह आज की गम्भीर समस्या है। विकास के नाम पर यह कैसा विकास है जो हमें विनाश की ओर ले जा रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग के लिए अगर कोई सर्वाधिक जिम्मेदार है तो वह अमेरिका है। जिसकी दादागिरी सम्पूर्ण विश्व पर चल रही हैं भूमण्डलीकरण के नारे के द्वारा पंूजीवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। पूंजी के दो चमचे हैं बाजार और उपभोक्ता। कई बार ग्लोबलाइजेशन को हम ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ का  आधुनिक रूप मान लेते हैं लेकिन दोनों में अन्तर है क्योंकि यह भी ‘कर लो दुनियाँ मुट्ठी में’ की बात करता है। लेकिन यदि हम उसकी तह तक जाते हैं तो वहाँ भी बाजार और पूंजी की बात छुपी हुई है। वह पूरे विश्व को यूनविर्सल फोम में ढालकर एक जैसी संस्कृति विकसित करना चाहते हैं, जिससे सम्पूर्ण विश्व का एक जैसा खान-पान, पहनावा होगा जिसके परिणामस्वरूप विकसित देशों को मुनाफा प्राप्त होगा। उन्होंने समकालीन कविता से कई कविताओं के उदाहरण देकर यह समझाने का प्रयास किया कि समकालीन कविता अंधेरे एवं निराशा की बात नही करती अपितु अन्धेरों में भी उम्मीद की किरण जगाती हैं। अन्त में प्रो0 होता ने छात्र-छात्राओं के प्रश्नों के उत्तर देकर कई सूचनाओं एवं जानकारियों का आदन-प्रदान किया।

इसी क्रम में दूसरे दिन  प्रो0 अरूण होता ने कहा कि वैदिक काल से लेकर अब तक भारतीय भाषाओं में लिखे गए साहित्य को प्रायः भारतीय साहित्य माना जाता है। उन्होेेंने कहा कि वह सम्पूर्ण साहित्य भारतीय साहित्य में शामिल किया जाना चाहिए जिसकी संवेदना भारतीय है। उन्होंने कहा कि साहित्य पढ़ने की प्रवृति का विकास किया जाना चाहिए ताकि मनुष्य की मनुष्यता में वृद्धि हो सके।




 उन्होंने कहा जिन रचनाओं ने भारतीय जीवन मूल्य समाज संस्कृति का चित्रण हो वह भारतीय साहित्य है, भले ही वह किसी भी भाषा में लिखा गया हो। भारतीय साहित्य में मानवीय पक्ष के चित्रण को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकारों ने ईश्वर से भी बड़ा मनुष्य को माना है और मानव जाति के हित के लिए मनुष्यता की महत्ता को स्थापित किया है।
रचनाकार चाहे किसी भी भाषा का हो वह समकालीन समाज और उसकी प्रवृतियों का सूक्ष्म चित्रण करता है। यही कारण है कि उडिया भाषा में लिखे फकीर मोहन के सन् 1897 के उपन्यास ‘छः बीघा जमीन’ और प्रेमचन्द के ‘गोदान’ में काफी कुछ समानताएं थी क्योंकि दोनों रचनाकारों ने अपने समय के समाज की संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया।
प्रो0 होता ने भाषा ने नाम पर साम्प्रदायिकता फैलाने की भर्त्सना करते हुए विश्व दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि साहित्य सौहाद्र एकता और सद्भाव की वृद्धि मंे सहायक है इसलिए साहित्य पढ़ने की प्रवृति को और विकसित किया जाना चाहिए।
हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने प्रो0 अरूण होता तथा केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, नई दिल्ली को भी इस व्याख्यान माला में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्यान आयोजित कराने पर धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस अवसर पर डॉ0 अशोक कुमार मिश्र ने कहा कि साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है जिससे आधुनिक काल की समस्त समस्याओं का निवारण सम्भव है। कार्यक्रम में अंजू, अमित, ललित, निवेदिता, आदि छात्र-छात्राएं भी उपस्थित थे।



Thursday, January 13, 2011

हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर वेद प्रकाश वटुक

 


आज अमेरिका में भारत की तरह जातियाँ, धार्मिकताएँ पहचान बना रही है। प्रवासी भारतीयों में यह पहचान प्रतीक हाल के दिनों की उपज हैं क्योंकि अमेरिका में नई पुरानी तीन पीढ़ियों के अलग प्रतीक थे। आज की अधिकांश पीढ़ी का प्रतीक केवल पैसा रह गया है इसलिए भारत से दक्ष होकर अमेरिका की सेवा कर रहे हर व्यक्ति को अपनी आय का एक हिस्सा भारत पर खर्च करना चाहिए क्यांेकि यहां की जनता की आय उनकी शिक्षा एवमं व्यक्तित्व निर्माण में व्यय हुई है। यह विचार आज चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाभ में विश्व प्रसिद्व साहित्यकार एवमं समाजशास्त्री प्रो0 वेद प्रकाश बटुक ने व्यक्त किये            प्रो0 बटुक ने कहा कि प्रवास और अप्रवास दो शब्द है प्रवासी कोई शब्द नहीं है। हिन्दुस्तान की कभी ऐसी स्थिति नहीं रही कि एक, दो करोड़ लोग कही चले जायें तो देश पर कोई फर्क पडें। भारत में दुनियाँ भर के डाक्टर और इंजीनियर पैदा होते है और विदेश चले जाते हैं उन्हें अपनी आय का आधा हिस्सा देश को देना चाहिए। हमें आज भी विदेशों में कही गयी बात को सर्वोच्च समझने की आदत हैं अगर कोई भारतीय कहता है तो उसे तवज्जों नहीं देते हैं।
       दुनियाँ में सबसे ज्यादा प्रवासी इंग्लेंड के लोग है, उन्होंने ही एग्रीमेंट शब्द से गिरमिटिया शब्द बनाया। यह गिरमिटिया लोग कोनट्रैक्ट पर जाते थे किंतु वापस नहीं आ पाते थे। यह नये युग की नयी-दास प्रथा थी। 1916 में यह प्रथा खत्म की गयी, लेकिन वहाँ के निवासियों और उनके बीच तना-तनी हमेशा रही। आज विदेशों में गये लोग लोग वहाँ अपनी हिंदी को तो किसी तरह बचाये हुए हैं लेकिन स्थानीय भाषा को सीखना नहीं जाते हैं।
     काफी लम्बे समय से अमेरिका का वर्चस्व रहा है, वहाँ मुखोटे बदलते है पॉलिसी वही रहती है। चाहे वह ओबामा हो या कैनेडी हो या रूजवेल्ट हो अगर आप हीरो हो सही में माडल हो तो काम भी वैसे कीजिए। मेरा मानना है एक आदमी के बदलने से दुनियाँ नहीं बदलती है। दूसरा मलेशिया, श्रीलंका, अफ्रीका में भी लोग है अफ्रीका में परेशानी ब्लैक और ब्राउन की है, हमारे यहाँ से गये गुजराती भाई मेहनत और व्यापार करना जानते थे इसलिए काले लोग उनसे चिढते है, जैसे ही उनकी सरकार आती है वह उन्हें परेशान करते है। आज भी यह सोच है कि भारतीय अपनी लड़की की विदेशी लड़के से शादी करने से बचते हैं।
       वर्मा में भी यही हुआ सन् 1835 तक हम उसे अपना हिस्सा मानते थे। भारतीय जहाँ भी गए उन्होंने वहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया लेकिन वहाँ की संस्कृति को वह आत्मसात नहीं कर पाये। आज भी वहाँ भारतीयता के नाम पर भाषा, विवाह एवं संस्कृति की बाते होती है। अमेरिका की स्थिति हमसे अधिक शोचनीय  है। आजादी से पहले पंजाब के युवकों के पास दो ही रास्ते थे या तो वह विदेश चले जाये या सेना में शामिल हो जायें। कनाड़ा में जमीन ज्यादा आबादी कम है इसलिए पंजाब के सबसे ज्यादा निवासी कनाड़ा में थे। बाद में वहाँ के स्थानीय लोगों को एतराज होना शुरू हुआ, उन्ही दिनों अमेरिका के कई राज्यों में भी भारतीय बढ़े लेकिन उन्हें वहाँ का नागरिक बनने की सुविधा नहीं मिली इसलिए उन्हें कोई अधिकार भी नहीं मिला। यहाँ के लोग सस्ते दामों पर मजदूरी करते थे इसलिए वहाँ के मजदूरों और यहाँ के मजदूरों के बीच झगड़े शुरू हुए। बाद में धीरे-धीरे इन्ही भारतीय लोगों मंे से कुछ लोगों ने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। पढ़ने-लिखने गये लोगों में क्रांतिकारी भी थे, जिन्होंने भारतीय मजदूरो के साथ मिलकर आवाज उठाई इनमंे लाला हरदयाल, सावरकर आदि थे। उन्हें धीरे-धीरे अनुमान हुआ कि हमें बस उतनी ही छूट है कि हम काम करो लेकिन अधिकार न माँगे। उन्हे आभास हुआ कि अधिकार हमें तभी मिल सकते है जब हम अपने देश को स्वतन्त्र कराये।
      अमेरिका में गदर पार्टी बनी और उन्होने कहा कि गदर का ऐलान हम हिंदी भाषा में करेगे। गदर करेगे भारत में। आवश्यकता है आपकी गदन की इसलिए युगान्तर आश्रम बाद में गदर आश्रम और पार्टी गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुई। प्रथम विश्व युद्ध के समय साठ प्रतिशत भारतीय विदेशो से लौट कर आये। उन्होंने कहा की हमने विदेशो के लिए बहुत जानें दी है अब हम अपने देश के लिए जान देगें। विदेशो मे गयी पहली पीढ़ी पूरी की पूरी देश की स्वतन्त्रता के लिए समर्पित हो गयी।
       इसके बाद इनके जो वंशज वहाँ रह गये उन पर भी मुकदमे चले, बाद में इस पीढ़ी ने अपना तन-मन-धन वहाँ अधिकार पाने में लगाया। वहाँ स्त्रियों को एवं अन्य देशों के निवासियों को डेढ़ सौ साल अधिकार पाने में लगे। सन् 1946 में भारतीयांे को नागरिकता के अधिकार मिले अमेरिका मंे दूसरी पीढ़ी इसी संघर्ष में खप गयी।  1950 के आस-पास कोटा सिस्टम शुरू हुआ। जिसमें हर साल 100 भारतीय माइग्रेट होकर आ सकते थे। सन 1966 में जानसन ने उदारवादी नीति अपनाई उसने कोटा सिस्टम समाप्त किया।
       तीसरी पीढ़ी में जो लोग अमेरिका आये वह पढ़े लिखे थे। इस पीढ़ी मे आज भी ग्लानि है कि जो सोच कर आये थे वह भारत के लिए नहीं कर पाये। 1974 के बाद जो चौथी पीढ़ी आई उसका उद्देश्य केवल पैसा कमाना और वहाँ बसना है। वर्तमान पीढ़ी अपने बच्चों को पूरा अंग्रेज बना कर रखना चाहती है। कहा जाता है बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता अगर अमेरिका स्वर्ग है तो मेरा मानना है अपनी आत्मा को मारकर ही वह स्वर्ग मिल सकता है। वहाँ आपको बढ़िया बिहारी, गुजराती, पंजाबी, मिलेगें लेकिन हिन्दुस्तानी नहीं मिलेंगे हमे अपने शहीदो को भी बाटने की कोशिश की है यहा तक कि भगतसिंह को खाली स्थान से जोडकर उग्रवादि बताया गया। अमेरिका में ब्राहमण सभा, जाट सभा, पंजाबी सभा है लेकिन हिन्दुस्तानी सभा केवल भारतीय स्टारों की नाइट्स में देखने को मिलती है अगर बाहर से पैसा नहीं आता तो निश्चित ही भारत मंे धार्मिक उग्रवाद नहीं पनपता जब सम्पन्ता आती है तो अलगाव भी आता है। उन्होंने कहा की भारत विरोधी आन्दोलन इसलिए भी यहाँ पनप जाते हैं कि उन्हें विदेशो से धन मिलता है।
कला संकायध्यक्ष प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने इस अवसर पर कहा की भारतीय संस्कृति में निरन्तरता, उदारता है इसलिए हमने कभी भी किसी पर शासन करने की बात नहीं सोची, हम कभी कूपमण्ड्क, नही रहे सिन्धुघाटी के समय में भी विदेशों से हमारा सम्पर्क था और निरन्तर हमने अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता को बनाये रखा।
प्रो0 अर्चना शर्मा ने कहा हमने बटुक जी के माध्यम से एक हजार साल की विदेशों में भारत की विकास यात्रा का समझा। बटुक जी की पीडा आज के हर भारतीय की पीढ़ा है। इस अवसर पर प्रो0 एस के दत्ता,, अंजू, सीमा शर्मा, आरती, विवेक, राजेश कुमार, मोनू सिंह आदि भी उपस्थित थे।  
    

Tuesday, September 14, 2010

"जब हिन्दी बोले, गर्व से बोले........., हीन भावना से न बोलें "

‘‘देश को आजाद हुए वर्षो बीत गये, हिन्दी के भविष्य लेकर आज हम बहस करेें यह बेतुका लगता है। मुझे नहीं लगता कि हिन्दी का भविष्य खतरे मेें है’’ यह विचार हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी विभाग में आयोजित संगोष्ठी ‘‘हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी’’ में दिल्ली से आयी हिन्दी दुनियाँ की जानी मानी समीक्षक प्रो0 निर्मला जैन ने व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में 550 से भी अधिक केन्द्रों पर वर्तमान में हिन्दी पढाई जा रही है। इसका श्रेय बाजारवाद को है। विज्ञापन की भाषा, मीडिया की भाषा, फिल्मों की भाषा आज हिन्दी है। यह पंडितों की भाषा नहीं है, बल्कि गली-बाजार की भाषा है, समाचार पत्रों की भाषा है। आज हिन्दी के पत्रों में वृद्धि हुई है। वे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं। उन्होनंे कहा जब हिन्दी बोले, गर्व से बोले हीन भावना से न बोलें।


संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एन0 के0 तनेजा ने कहा कि भारत की प्राचीनतम भाषा हिन्दी की अभिवृद्धि में उसकी वैश्विक पहचान बनाने में योगदान करें। यह सौभाग्य का विषय होगा। वास्तव में पराधीनता के वर्षों में हिन्दी की जो वृद्धि होनी चाहिए थी वह अवरूद्ध हुई। परन्तु वैश्वीकण के युग में यह मानव पूंजी है और विश्व में मानव पूंजी का स्थान बढ़ रहा है। इससे हिन्दी के मान सम्मान और पहचान में वृद्धि होगी।


कला संकायाध्यक्ष प्रो0 अर्चना शर्मा ने हिन्दी विभाग के प्राध्यापकों एवं छात्र-छात्राओं का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि सतत् संघर्षशील रहें और हिन्दी को एक नई पहचान दिलाने का प्रयास करें। उन्होंने राष्ट्रमंण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग की पहल हिन्दी विभाग से होने के कारण विभाग कोे बधाई दी।


विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि राजभाषा अधिनियमों के तहत हम क्या-क्या उन्नति कर पाये इस बात पर आज विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग की बात की गई तो बुद्धिजीवी वर्ग ने इसका समर्थन किया है। हमारी इस शुरूआत से आज राष्ट्रमण्डल खेलों के सारे बैनर, होर्डिग आदि हिन्दी में लगाये गए हैं। ये हमारी उपलब्धि है। पाठ्यक्रम में भी इस वर्ष बदलाव किए गए और कौरवी साहित्य तथा प्रवासी साहित्य को पाठ्यक्रम में जोड़ा गया है। हिन्दी दुनियाँ में जो कुछ अच्छा होगा तो हमें खुशी होगी।


इससे पूर्व दिनांक 13 सितम्बर 2010 को हिन्दी विभाग में कविता प्रतियोगिता तथा आशु भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया तथा प्रतियोगिताओं में विजेता छात्र-छात्राओं को आज पुरूस्कार प्रदान किए गए। पुरूस्कार प्राप्त छात्र-छात्राओं की सूची संलग्न हैं।


संगोष्ठी का संचालन आरती राणा ने किया। इस अवसर पर डॉ0 अशोक मिश्र, कु0 नेहा पालनी, कु0 सीमा शर्मा, ईश्वर चन्द गंभीर, डॉ0 रवीन्द्र कुमार, विवेक सिंह, अंजू, ममता, अंचल, अमित, मोनू, कौशल, शिवानी, रजनी, ललित सारस्वत, आदि प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


हिन्दी दिवस 2010 के अवसर पर हिन्दी विभाग में आयोजित आषु भाशण एवं कविता प्रतियोगिता में पुरूस्कार प्राप्त छात्र-छात्राएं:-






कु0 कौशल  प्रथम स्थान कविता प्रतियोगिता


कु0 रजनी द्वितीय स्थान कविता प्रतियोगिता


कु0 ज्योति तृतीय स्थान कविता प्रतियोगिता


श्री नवीन सांत्वना पुरस्कार कविता प्रतियोगिता


कु0 शिवानी  सांत्वना पुरस्कार कविता प्रतियोगिता

 
श्री विवेक ंिसह प्रथम स्थान आशुभाषण प्रतियोगिता


श्री ललित सारस्वत द्वितीय स्थान आशुभाषणप्रतियोगिता


कु0 अंजू तृतीय स्थान आशुभाषण  प्रतियोगिता


श्री मोनू सिंह सांत्वना पुरस्कार आशुभाषण प्रतियोगिता


कु0 निवेदिता सांत्वना पुरस्कार आशुभाषण प्रतियोगिता






Monday, September 13, 2010

हिंदी दिवस पर हिंदी विभाग में आयोजित स्वरचित कविता और आशु भाषण प्रतियोगिता : कैमरे की नज़र से


 प्रतिभागी- कपिल
 प्रतिभागी- रजनी
 छात्र एवं  छात्राओं को संबोधित करते प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी
 प्रतिभागी- मोनू सिंह
 प्रतिभागी- अंजू

( निर्णायक मंडल)

Thursday, August 19, 2010

‘हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता’ के विजेता ‘रूस’, ‘ब्रिटेन’, ‘बुलगारिया’, ‘हंगरी’ आदि देशों के छात्र-छात्राएं : हिन्दी विभाग में

हिन्दी विभाग
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में
दिनांक 20 अगस्त 2010 को
‘अक्षरम्’
द्वारा प्रत्येक वर्ष यूरोप में आयोजित होने वाली ‘हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता’ के विजेता ‘रूस’, ‘ब्रिटेन’, ‘बुलगारिया’, ‘हंगरी’ आदि देशों के छात्र-छात्राएं ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्’ द्वारा आयोजित भारत भ्रमण सांस्कृतिक यात्रा में हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में आ रहे है।


कार्यक्रम

अध्यक्षता - माननीय प्रो0 एस0के0 काक, कुलपति जी
सान्निध्य - प्रो0 अर्चना शर्मा, संकायाध्यक्ष कला
   - श्री अनिल जोशी, अध्यक्ष, अक्षरम्
          - श्री नारायण कुमार, सलाहकार विश्व हिन्दी सम्मेलन
                - प्रो0 विमलेश कांति, पूर्व प्रोफेसर हिन्दी, बुल्गारिया, फिजी
     - प्रो0 हरजेन्द्र चौधरी, प्रोफेसर हिन्दी, जापान, पोलेंड


समय - १२:00 बजे ( दिनांक 20 अगस्त 2010)
स्थान - संगोष्ठी कक्ष, हिन्दी विभाग



आपकी गरिमामयी उपस्थिति प्रार्थनीय है।



निवेदक:
प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी,
अध्यक्ष हिन्दी विभाग,
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ फोन नं: 0121-2772455, 9412207200

Thursday, July 8, 2010

हिन्दी का इस देश में प्रभुत्व होगा

आज दिनांक 07 जुलाई, 2010 को चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ का बृहस्पति भवन राजभाषा समर्थन समिति के आयोजन की गर्मी से सराबोर रहा। वक्ताओं में पक्ष-विपक्ष में राष्ट्र मण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग को लेकर विचार रहे और अन्ततः प्रस्ताव पारित हुआ कि राष्ट्र मण्डल खेलों में अनिवार्यतः हिन्दी प्रयोग कराने के लिए सरकार और आयोजन संस्थाओं को कहा जाएगा। इसके लिए प्रधानमंत्री सहित राजभाषा विभाग तथा राष्ट्रपति से भी मिला जाएगा, संसद में सवाल उठेगे और दिल्ली में यहाँ के आन्दोलन की दमक पूरी शिद्दत के साथ पहुँचाई जाएगी।

मेरठ के सांसद तथा संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य राजेन्द्र अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि वे पहले से ही राजभाषा समिति के समक्ष इस प्रश्न को ला चुके हैं और सरकार को इस पर कार्यवाही के लिए निर्देश भी जारी हुए हैं किन्तु प्रश्न केवल राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी तक नहीं है अपितु इससे आगे है। हमें विश्वास है कि आगामी दशक में हिन्दी का इस देश में प्रभुत्व होगा और अंग्रेजी जो कि अपने आप में अनुशासित भाषा नहीं है स्वयं ही हमारे आम व्यवहार से बाहर हो जाएगी। उन्होंने कहा कि देश को दूसरे देश से जो भाषा जोड़ सकती है वह केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है। मेरठ हिन्दी का मायका है। हिन्दी की इस मुहिम को हम मेरठ के अभिमान के रूप में लें ना कि राजनीतिक अभिमान के रूप में। देश को यदि एक भाषा चाहिए तो वह केवल हिन्दी हो सकती है। देश को जोड़ने के लिए अन्य प्रान्तों की भाषा का भी सम्मान करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए कितने भी प्रयास करने पड़ें, मैं करूँगा एवं जहाँ तक जाना पड़े मैं जाऊँगा।

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो0 एस0 के0 काक, माननीय कुलपति ने कहा कि अगर आप अपनी भाषा का सम्मान करेंगे, गर्व करेंगे तो दूसरे भी करेंगे। हिन्दी को हमें इस प्रकार विकसित करना होगा कि हम इसे अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करें। हमें इसे अर्न्तराष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए, विस्तृत दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा। हिन्दी भाषा बोलने के लिए पहले अपनी भाषा में यकीन, अनुशासन, स्वयं का दृढ़निश्चय होना चाहिये। उन्होंने कहा कि मैं इस पूरे प्रस्ताव के साथ हूँ और इसके लिए जहाँ तक जाना होगा साथ दूँगा।

श्री एस0 पी0 त्यागी जी, सेवानिवृŸा न्यायाधीश ने कहा कि मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि हम अपने कार्यों के लिए दूसरी भाषा का सहारा क्यों लेते हैं? जो लोग हिन्दी के विरोधी हैं, वह जानबूझकर हिन्दी के क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग हिन्दी को बदनाम करने के लिए करते हैं। उन्होंने कहा कि मैं इस समिति के साथ जुड़कर इसलिए गर्व का अनुभव कर रहा हूँ क्योंकि यह अपने देश की भाषा को स्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पित है और मैं इसके लिए पूरी तरह साथ हूँ।

रासना कॉलेज के प्राचार्य डॉ0 नन्द कुमार ने कहा कि पूर्व में सरकारों ने हिन्दी को आगे बढ़ाने में अपनी सही भूमिका नहीं निभाई है। हम हिन्दी की बात तो बहुत करते हैं लेकिन हिन्दी में कार्य नहीं करते हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और राजभाषा समर्थन समिति ने जो संकल्प लिया है उससे हमारी भाषा का विकास होगा और हम विश्व के समक्ष गर्व करने की स्थिति में होंगे।

डॉ0 आर0सी0 लाल ने कहा कि हम ऐसे लोगों को तैयार करें, जो अच्छी हिन्दी बोलना जानते हों। यह हिन्दी के ही हित होगा।

शिक्षाविद् डॉ0 शिवेन्द्र सोती ने कहा कि हिन्दी प्रयोग भारत को उसकी अस्मिता से जोड़ता है और हमें याद रखना होगा कि हिन्दी का प्रयोग अहिन्दी भाषी लोगों ने अधिक किया और हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है, हिन्दी में शिक्षा अनिवार्य हो। खड़ी बोली हिन्दी खड़ी है एवं खड़ी ही रहेगी। उन्होंने मेरठ को क्रान्ति का शहर बताया और कहा कि हिन्दी की क्रान्ति भी यहाँ से लागू होगी।

पत्रकार हरि शंकर जोशी ने हिन्दी प्रयोग को लेकर कई प्रश्न उठाये और कहा कि हिन्दी वालों को अपने भीतर झांकना चाहिए क्योंकि घर में जब हिन्दी प्रयोग होगी तभी वह आगे बढ़ेगी। उन्होंने प्रश्न किया कि हिन्दी में लिखने से परहेज किसे है? हिन्दी के साथ अन्य भाषाओं का भी प्रयोग हो, इस पर किसी को कोई आपŸिा नहीं है। उन्होंने राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को अनिवार्य ठहराया।

एडवोकेट मुनीष त्यागी ने कहा कि राजनीतिज्ञ नहीं चाहते कि हिन्दी लागू हो, क्योंकि हमारी मानसिकता गुलाम है। जब तक भाषाओं के लेन-देन की बात नहीं होगी तब तक हिन्दी आगे नहीं बढ़गी। हिन्दी के हिन्दीकरण-हिन्दुस्तानीकरण के लिए उसे सांस्कृतनिष्ठ नहीं बनाना चाहिए।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो0 आई0 आर0 एस0 सिंधु ने कहा कि हिन्दी को लाने से हम अपने विकास की प्रक्रिया को कई गुना आगे बढ़ा सकते हैं। भाषा के विषय में कभी भी कट्टरता नहीं अपनानी चाहिए। हिन्दी को दौड़ाने के प्रयास करें लेकिन अंग्रेजी को टंगड़ मारकर गिरायें नहीं। प्रभात राय ने कहा कि भाषा की कट्टरता से काम चलने वाला नहीं है। बात बनेगी सही भाषा नीति से। डॉ0 असलम जमशेदपुरी ने कहा कि हिन्दी भारत की राजभाषा है यह उतना ही सत्य है, जितना कि सूरज का निकलना और उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें दिल्ली में प्रदर्शन करना चाहिए।

कार्यक्रम की सहयोगी संस्थाओं के रूप में दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक अमर उजाला, फैज-ए-आम डिग्री कॉलेज, मेरठ, मानस सेवा संस्थान, सांस्कृतिक परिषद्, वरिष्ठ नागरिक मंच सहित कई संस्थाओं ने राजभाषा समर्थन समिति की इस पहल का समर्थन किया।

कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग के शोध छात्र रविन्द्र राणा एवं डॉ0 विपिन कुमार शर्मा ने किया। अतिथियों का आभार कार्यक्रम के संयोजक डॉ0 नवीन चन्द्र लोहनी ने किया। इस अवसर पर सुमनेश सुमन ने हिन्दी के समर्थन में कविता भी सुनाई। कार्यक्रम में डॉ0 रवीन्द्र कुमार, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, सीमा शर्मा, नेहा पालनी, डॉ0 आशुतोष मिश्र, अंजू, अमित कुमार, ललित सारस्वत, विवेक, सहित हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं तथा शहर के वरिष्ठ नागरिकों पत्रकारों, वकीलों, शिक्षकों तथा विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने भाग लिया।



डॉ0 गजेन्द्र सिंह/विवेक सिंह/अमित कुमार

राजभाषा समर्थन समिति



Saturday, July 3, 2010

राजभाषा समर्थन समिति

राजभाषा समर्थन समिति
(भारत में हिन्दी प्रयोग लागू कराने हेतु एकजुट लोगों की संस्था)

महोदय/महोदया,

हिन्दी विभाग द्वारा दिनांक 12-14 फरवरी 2010 को आयोजित अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था कि ‘‘राष्ट्र मण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग को विज्ञापनों/होर्डिंग्स/सरकारी प्रपत्रों तथा आयोजक संस्थाओं द्वारा बढ़ावा दिया जाए।’’ यह प्रस्ताव संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य तथा सांसद श्री राजेन्द्र अग्रवाल के द्वारा प्रस्तुत किया गया था। प्रस्ताव मंचस्थ तथा सम्मुख उपस्थित सभी प्रतिभागियों द्वारा समर्थन कर पारित किया था।

हिन्दी भारत की राजभाषा है और राष्ट्र मण्डल खेल के आयोजन स्थल के आस-पास प्रमुखता से बोली जाने वाली भाषा है। ऐसे में उक्त प्रस्ताव के आलोक में आयोजकों एवं सरकारी विभागों तथा अन्य संस्थाओं के संज्ञान में यह प्रस्ताव लाया जाना है। इस हेतु दिनांक 07 जुलाई 2010 को एक बैठक सायं 05 बजे चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर स्थित बृहस्पति भवन में आहूत की जा रही है। इसमें राजभाषा को अन्तरराष्ट्रीय आयोजनों में प्रमुखता से महत्व देने संबंधी विचार-विमर्श कर संगोष्ठी के मन्तव्य को आमजन एवं सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया जाएगा। कोई भी देश हमारी भाषा का तब तक सम्मान नहीं कर सकता जब तक हम स्वयं नहीं करेंगे। आवश्यकता है कि ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के समय में हम देश के बहुसंख्यक वर्ग की भाषा हिन्दी के महत्व को आमजन तक पहुचाएँ  ।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी इसलिए देश की भाषा का प्रश्न प्रमुखता से उठाते थे, स्पष्ट है कि राष्ट्रभाषा का प्रश्न जनभावना से जुड़ा है, अतः राजभाषा के इस प्रश्न को प्रस्ताव को क्रियान्वित करने के लिए ‘राजभाषा समर्थन समिति’ का गठन किया गया है। हमारा विचार है कि:-

1. जब चीन में ओलंपिक खेलों के दौरान चीनी भाषा का प्रयोग हो सकता है तो भारत में आयोजित खेलों की नियमावली और होर्डिंग्स हिन्दी में क्यों नहीं हो सकते।

2. आयोजन में आने वाले गैर हिन्दी भाषी खिलाड़ियों और प्रतिनिधियों को अनुवादक उपलब्ध कराये जा सकते हैं। जैसा कि प्रायः हर अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में अन्य भाषा-भाषी लोग करते हैं।

3. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम भारत की छवि को पूरी दुनिया के सामने मजबूती के साथ स्थापित कर सकते हैं।

4. यदि हम राष्ट्रमण्डल खेलों में हिंदी प्रयोग करते हैं तो अनुवादकों की आवश्यकता पड़ेगी। इससे अनुवादकों को रोजगार प्राप्ति हो सकेगी।

5. राष्ट्रमण्डल खेल हिन्दी भाषा के लिए बड़ी संभावनाओं को खोल सकते हैं, अगर हम हिंदी का इन खेलों के दौरान अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे। विदेशी लोगों  का भी हिन्दी के प्रति आकर्षण बढेगा। इससे हिंदी के शिक्षण, पठन-पाठन की विदेशों में भी संभावनाएं बढेंगी।

6. अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति हिंदी भाषा की बेहतरी के लिए आयोग (भाषा आयोग) का गठन करेगें। जब राष्ट्रमंडल खेल भारत में हो रहे हैं, हिन्दी भाषा को संवर्धित करने के लिए संविधान में दी गई भाषा संबंधी व्यवस्था का पालन नहीं हो रहा है, ऐसे में जरुरी है जनजागृति द्वारा प्रबुद्ध नागरिक राष्ट्रमंडल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करें।

7. राष्ट्रमंडल खेल में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम उस रुढ़ मानसिकता पर भी चोट कर सकते हैं जो अंग्रेजी के प्रयोग द्वारा निज विशिष्टता सिद्ध करती रही है, यह हिंदी के भूगोल और मानसिकता को परिवर्तित करने का अवसर भी है।

आशा है आप हमारी बातों से सहमत होंगे। कृपया अपनी सहमति को अपने अधिकतम संसाधनों के माध्यम से सरकार तक पहुँचाने के लिए प्रयास करें और हमारे प्रयास में सहयोग कर राजभाषा प्रयोग के इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सुलझाने में सहयोग करें। कृपया इस अभियान हेतु हमें अपना समर्थन पत्र भी प्रदान करें।

आपसे अनुरोध है कि इस विषय को और अधिक स्पष्ट करने तथा विचार विमर्श करने तथा देश की भाषा हिन्दी के प्रति अपना सम्मान एवं देश के प्रति अपनी सांस्कृतिक एक जुटता प्रकट करने हेतु दिनांक  07/07/2010 को सायं 05:00 बजे, बृहस्पति भवन में पधारने का कष्ट करें। आशा है इस आयोजन में आपकी सक्रिय भागीदारी एवं सहयोग प्राप्त होगा।

शुभकामनाओं सहित।



                                         (प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी)

                                              एवं समस्त साथी
                                        ‘राजभाषा समर्थन समिति’


द्वारा:- हिन्दी विभाग, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ सम्पर्क हेतु मो0 न0 : 9412207200 /9412885983 /9758917725 /9258040773 /9675899855
ई- मेल - rajbhashass.mrt@gmail.com

नोट: कृपया इस अवसर पर अपनी संस्था का बैनर भी लाएं जिसको आयोजन स्थल पर सहयोगी संस्थाओं के रूप में प्रदर्शित किया जा सके।

Friday, June 25, 2010

हिंदी विभाग में नया डिप्लोमा पाठयक्रम

आवश्यक सूचना

सभी छात्र-छात्राओं को सूचित किया जाता है कि इस वर्ष चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हिन्दी पत्रकारिता एवं जनसंचार में दो नए पाठ्यक्रम पी0 जी0 डिप्लोमा इन इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और पी0 जी0 डिप्लोमा इन प्रिन्ट मीडिया इसी वर्ष से शुरु हो रहे हैं। उपर्युक्त पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु शैक्षिक योग्यता स्नातक में 45 प्रतिशत है। प्रवेश हेतु 30 जून तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अपना पंजीकरण अवश्य करा दें।





मुख्य सूचनाएं-
प्रवेश अंतिम तिथि - 30 जून
शैक्षिक योग्यता - स्नातक 45 प्रतिशत


प्रवेश सम्बन्धी अन्य जानकारी के लिए सम्पर्क करें-
कार्यालय हिन्दी विभाग, फोन नं0-0121-2772455।
डॉ0  गजेन्द्र सिंह - 9258040773
विवेक सिंह - 9027561713

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