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Wednesday, September 14, 2011

’हमें मानसिक दासता मिटानी ही पड़ेगी, यदि हम हिन्दी का विकास चाहते हैं-प्रो0 वेद प्रकाश ’वटुक’

मेरठ  दिनांक 14 सितम्बर 2011.......
’हमें मानसिक दासता मिटानी ही पड़ेगी, यदि हम हिन्दी का विकास चाहते हैं। हमें अपने आत्मविश्वास व आत्मगौरव को ऊँचा करना है।’ये उद्गार चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ’हिन्दी विभाग’ में ’हिन्दी दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम  के अन्तर्गत मुख्य अतिथि, मेरठ के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं फोकलोर इन्स्टीट्यूट बर्कले, कैलीफोर्निया में प्राध्यापक प्रो0 वेद प्रकाश ’वटुक’ ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिन्दी की सेवा करने जैसा वाक्य मुझे अच्छा नहीं लगता जब लोग मुझसे मेरे लिए यह कहते हैं बल्कि ठीक बात तो यह है कि वहीं हिन्दी हमें आशीर्वाद देती है, जिससे हम जीवित हैं। हिन्दी जीवित रहेगी भले ही आप अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाए। वह जनता की भाषा है और जब तक जनता है, भाषा भी जीवित रहेगी। उन्होंने कहा कि हम कब तक हिन्दी दिवस मनाते रहेंगे, अब तो राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिन्दी को बन ही जाना चाहिए। हमें आज से ही हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करना होगा। उन्होंने व्यंग्य किया कि जो लोग हिन्दी का झण्डा उठाएं हुए हंै उनके बच्चे भी अंग्रेजी स्कूलों में पढे़ हैं। प्रो0 ’वटुक’ ने ’हिन्दी दिवस’ पर हिन्दी के प्रति असीम प्रेम व्यक्त करते हुए कविता पाठ भी किया - 
उन्होंने कहा कि हिन्दी सबकी है और सब हिन्दी के हैं। एन0ए0एस0 महाविद्यालय, मेरठ के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा पूर्व में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करने वाले डाॅ0 सूरजपाल शर्मा ने विभाग की अपनी यादों को ताजा किया। राष्ट्रभाषा-मातृभाषा-जनभाषा-सम्र्पक भाषा और भविष्य की विश्व भाषा हिन्दी का स्तवन्न करते हुए उन्होंने सभी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि -
इस अवसर पर क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी डाॅ0 बी0एन0 शुक्ल ने कहा कि हिन्दी के भीतर इतनी शक्ति है कि वह तमाम चुनौतियों का सामना करती आई है। उन्होंने कहा कि जो लोग गिरमिटिया मजदूरों के रूप में माॅरीशस या दूसरे देशों में गए तो अपने साथ रामचरितमानस के गुटके, हनुमान चालीसा, लेकर गए। गन्ने की खेती करने के बाद इनके पठन-पाठन से वे अपनी संस्कृति-सभ्यता से जुड़े रहे किंतु इसके विपरीत शासनकर्ता नहीं चाहते थे कि वे अपनी संस्कृति से जुड़े। उनके शरीर पर गन्ने का रस लगा दिया जाता था, जिससे चीटे चिपकते थे किन्तु उन्होंने अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि हिन्दी के लिए हमें लोक की ओर मुड़ना होगा। केवल बाजार के लिए हिन्दी साहित्यकारों ने लेखन नहीं किया। निराला, धूमिल ने कैसी जिन्दगी बिताई। देश के साहित्यकार, जनता सारे कष्ट सहकर भी भाषा के लिए जीवित रह सकते हैं। 

चै0 चरण सिंह वि0वि0 मेरठ के डीन कलासंकाय प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने कहा कि हिन्दी निश्चित रूप से भारत को एक सूत्र में बांधने में सफल होगी। हिन्दी के दो पक्ष मुझे दिखाई देते हैं एक सैद्धान्तिक पक्ष और दूसरा व्यावहारिक पक्ष। गांधी जी ने हिन्दी को हिन्दुस्तानी नाम दिया था और हिन्दुस्तानी को उस भाषा का दर्जा दिया था जो देश को एक सूत्र में बांध सके, जो सारे भारतवासियों की जबान बन सके। प्रो0 अग्रवाल ने कहा कि हमें न किसी भाषा से घृणा करनी है, हिन्दी को विश्वव्यापी बनाने के लिए हम किसी भाषा को छोड़ने लगे, यह ठीक नहीं। आप जितनी भी भाषा सीखेंगे उतनी ही ज्ञान की वृद्धि होगी और भाषा का विकास होगा। यह भाषा का व्यावहारिक पक्ष है। हम हिन्दी भाषा को इसी रूप में स्थापित करें। हिन्दुस्तानी आज पुरानी नहीं हुई बल्कि उसकी वही महत्ता आज भी है। हमें हिन्दी में ऐसे शब्दों का चयन करना होगा कि वह हर स्तर पर अपनाए जाए। तभी हिन्दी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी। हम शुद्ध-अतिशुद्ध-परिमार्जित-अतिपरिमार्जित, के चक्कर में न पडे बल्कि जनसाधारण को जोड़ने के लिए हमें हिन्दुस्तानी का ही प्रयोग करना पडेगा।
इस अवसर पर शहर के कवियों ने भी अपना काव्य पाठ किया। डाॅ0 अशोक मिश्र ने शहर की फिजा पर व्यंग्य यूं कसा -
प्रसिद्ध ग़ज़लकार कुमार अनिल ने कहा कि हिन्दी के प्रति असीम प्रेम इन पंक्तियों में व्यक्त किया-
’’पालने से निकलके देखों तो, अब जमीं पर भी चलके देखो तो ।
कुछ तो दूरी फलक से कम होगी, तुम जरा-सा उछलके देखो तो।
इस जहां को बदलने निकले हो, पहले खुद को बदलके देखो तो।
ढलता सूरज बहुत दुआ देगा, तुम चरागों-सा जलके देखो तो।
कि चान्द छत पर बुला रहा है, साथ उसके टहलके देखो तो।
गा रही है हवा अनिल की ग़ज़ल, घर के बाहर निकलके देखो तो।’’

इस अवसर पर आषु भाषण प्रतियोगिता में विभाग के छात्र-छात्राओं मंे विवेक सिंह ने प्रथम, प्रगति ने द्वितीय, मिलिन्द ने तृतीय, ज्योति ने चतुर्थ और सन्ध्या ने पंचम स्थान प्राप्त किया। कविता प्रतियोगिता में ज्योति ने प्रथम, विवेक सिंह ने द्वितीय, प्रियंका ने तृतीय, प्रगति ने चतुर्थ, तथा मोहनी ने पंचम स्थान प्राप्त किया। प्रतियोगिताओं में निर्णायक मण्डल में डाॅ0 अषोक मिश्र, डाॅ0 प्रियंका तथा डाॅ0 गजेन्द्र सिंह शामिल थे। प्रतिभागियों को अतिथियों द्वारा स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र तथा पुरूस्कार राषि प्रदान की गई।
हिन्दी दिवस के इस कार्यक्रम में पधारे समस्त अतिथियों का विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने आधार व्यक्त किया तथा कहा कि लोक भाषाओं से शब्दों को ग्रहण करें, हिन्दी का विकास होगा। आज हिन्दी रोजगार के साधन देने में भी समर्थ हो रही है। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया।
इस अवसर पर डाॅ0 आर0के0सोनी, डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 सीमा शर्मा, डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, डाॅ0 गजेन्द्र सिंह, अंजू, आरती, डाॅ0 प्रियंका, आंचल, अलूपी, निवेदिता, बबीता आदि तथा हिन्दी विभाग के विद्यार्थी उपस्थित रहें।




































Tuesday, September 13, 2011

हिन्दी दिवस को ’भारतीय भाषा दिवस’ के रूप में विस्तार दिया जाना जरूरी है : प्रो0 केदारनाथ सिंह

दिनांक 13/09/2011........... जो क्षेत्र हिन्दी का संवर्धन करेगा, विकास करेगा-उनमें मेरठ की बड़ी भूमिका होगी। हिन्दी के प्रति निराष होने की जरूरत नहीं खास कर मेरठ में, क्योंकि हिन्दी खड़ीबोली का गढ़ मेरठ ही रहा है। खड़ीबोली को हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट स्तर पर प्राध्यापक जब कक्षा में पढ़ाते है तो इसे कहते हैं -मेरठी बोली। पहले यह मेरठी बोली हैं बाद में इसने साहित्यिक रूप लिया। मेरठ की साहित्यकार होमवती देवी ने मेरठ में हिन्दी में बहुत काम किया, जिसका जिक्र अज्ञेय ने ’स्मृतिलेखा’ पुस्तक में किया है। ये उद्गार आज हिन्दी विभाग, चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में ’हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में ’समकालीन भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ कवि एवं जवाहरलाल नेहरू वि0वि0, दिल्ली में पूर्व प्राध्यापक रहे प्रो0 केदारनाथ सिंह ने व्यक्त किए। प्रो0 सिंह ने कहा कि हिन्दी दिवस को ’भारतीय भाषा दिवस’ के रूप में विस्तार दिया जाना जरूरी है, वर्तमान में हम यह जो ’हिन्दी दिवस’ मनाते हैं इसे सरकार ने ’राजभाषा हिन्दी दिवस’ के रूप में स्वीकृत किया है। आज समय आ गया है कि हिन्दी के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं तथा उसके साहित्य की बात हो। इस हेतु सस्थाएं ही ’हिन्दी दिवस’ को विस्तार दे सकती हैं बशर्ते भारतीय मानस में हिन्दी के प्रति पूरी स्वीकृति हो। राजभाषा विभाग से यह उम्मीद छोड़नी ही होगी कि वह हिन्दी का उत्थान करेगा। राजभाषा विभाग में तो केवल कुछ लोगों को हिन्दी के माध्यम से नौकरियां मिल गई हैं। आज इस बात की बेहद जरूरत है कि औपचारिक क्षेत्रों से हिन्दी का विकास हो तथा यह अनौपचारिक क्षेत्रों में भी आए। प्रो0 केदारनाथ सिंह ने कहा कि तमिलनाडु चेन्नई, में हिन्दी विश्वविद्यालयों, काॅलेजों में नहीं पढ़ाई जा रही बल्कि पूरे चेन्नई, तमिलनाडु में छोटे-छोटे स्तर पर हिन्दी की कक्षाएं चल रही हैं।
उन्होंने कहा कि हिन्दी औपचारिक क्षेत्रों में कुछ नहीं कर पा रही, बल्कि अनौपचारिक क्षेत्रों में बढ़ी है- अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर। आज गूगल पर हिन्दी की बहत सारी सामग्री उपलब्ध है। आज की हिन्दी एक बड़ा काम कर रही है कि इससे भारतीय साहित्य के इतिहास का निर्माण हो रहा है, अन्य किसी भी भाषा का भारतीय साहित्य के इतिहास निर्माण में योगदान नहीं है। आज हिन्दी भारत की सेतुभाषा बन चुकी है क्योंकि अगर आप एक भाषा से दूसरी भाषा में जाना चाहे तो अनुवाद इसका माध्यम है। आज हिन्दी से अन्य भाषाओं व अन्य भाषाओं से हिन्दी में पर्याप्त अनुवाद हो रहा है। तमिल से कन्नड, कन्नड से हिन्दी अनुवाद करने में हिन्दी भाषी नाम मात्र के हंै। इसके लिए कन्नड वाला हिन्दी सीखता है -फिर अनुवाद करता है, यानि दक्षिण की भाषाओं के अनुवाद हिन्दी में दक्षिण के लोग करते हैं। हिन्दीभाषियों को भी दूसरी भाषाएं -दक्षिण की भाषाएं सीखनी चाहिए ताकि अनुवाद कर सकें। अनुवाद के क्षेत्र में हिन्दी में रोजगार है। इसलिए हिन्दी वालों को दूसरी भाषाओं के साथ प्रत्यक्ष संबंध जोड़ना ही होगा।
इस अवसर पर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ कथाकार प्रो0 गंगा प्रसाद ’विमल’ ने कहा कि भारत में उत्सवधर्मी लोग हैं। हिन्दी उत्सव को यदि परखा जाए तो यही कहा जाएगा कि हमने अद्यतन क्या काम किया ? कैसा काम किया ? कितना बाकी रहा ? आदि। राजभाषा के प्रतिवेदनों में भी यही बात होती है। लोकतन्त्र में लोक की भाषा का प्रयोग होना चाहिए और हिन्दी दिवस को ’भारतीय भाषा दिवस’ के रूप में मनाना चाहिए। हिन्दी के सामने आज चुनौती है। राजभाषा वाले भी पूरी तरह से हिन्दी में दक्ष नहीं हो पाए। उन्हें प्रशिक्षित होना चाहिए था, वह नहीं हुए। सरकार ने हिन्दी को लेकर कुछ काम नहीं किया। ’विमल’ जी ने कहा कि बोल-चाल की भाषा का हिन्दी में भरपूर प्रयोग होता है। सरकारी काम-काज में हिन्दी का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। समाचार पत्रों की संख्या में भास्कर, उमर उजाला, दैनिक जागरण आदि पत्रों की संख्या दूसरी भाषा इकाइयों से ज्यादा है। हिन्दी की गति फिल्मों व संचार माध्यमों में भी बढ़ रही है। देश में जो प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में मातृ-भाषाओं का प्रयोग किया जाता है इसका अनुपात आज बढ़ा है। यह हिन्दी की बढ़ी हुई स्थिति को देखने का वैज्ञानिक तरीका है। आज अगर हिन्दी रोजगार के साधन नहीं जुटा पा रही तो इसके पीछे कारण व्यावसायिक शिक्षा का हिन्दी में न मिलना रहा है। ’विमल’ जी ने कहा कि बडे़-बड़े देशों अमेरिका, इग्लैण्ड़ आदि में ज्यादातर डाक्टर भारत के हैं। आज हिन्दी को समकालीन सन्दर्भों में जानना जरूरी है। सरकारी वैश्विक आंकड़े बताते है कि धनार्जन करने में आज हिन्दुस्तान का बड़ा नाम है। उन्होंने कहाँ कि आयात-निर्यात के लिए भी भाषा महत्वपूर्ण है, संचार क्रांति के रूप में भाषा का अप्रतिम योगदान है। आज ब्लाॅग, फेसबुक, ट्विटर का प्रयोग करने वाले लोग अपना वर्चस्व कायम कर रहे हैं। हमें आज बहुभाषा नीति अपनानी पड़ेगी क्योंकि भारत बहुभाषी देश है, इसमें बहुलता है। अब भारत को उठकर अपनी बड़ी भाषा में अभिव्यक्ति देनी पड़ेगी। इस हेतु नीति-नियामकों को बड़ी भाषा की ओर विवेक पूर्वक ध्यान देना होगा। आज अखबार वाले, विद्यार्थी आदि राजदूत हैं। हिन्दी पट्टी में कोई आन्दोलन हिन्दी के लिए इसलिए नहीं हुआ क्योंकि भारत का लोक अपने को काटकर अलग करना नहीं चाहेगा। आज विश्व स्तर पर हिन्दी के प्रति जो रुझान कम था, वह बढ़ रहा है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो0 एच0सी0 गुप्ता ने कहा कि हिन्दी बोलने में हमें गर्व करना चाहिए। आज हिन्दी बोलने मंे लोग झुकते हैं और अंग्रेजी बोलने में अपने को ऊँचा समझते है। इस धारणा को तोड़ना ही होगा। अनुवाद के क्षेत्र में हमें जो शब्द बनाने चाहिए वे सरल हों, क्लिष्ट उच्चारण या संबोधन न हो। इससे हिन्दी भाषा के उत्थान में मदद मिलेगी। विश्वविद्यालय में जितने व्यावसायिक कोर्स चल रहे हैं, उनकी पढ़ाई अंग्रेजी में होती है। हिन्दी में पढ़ाई न होने के कारण उसका हिन्दी में अनुवाद न होना भी रहा है। हिन्दी अनुवाद करते समय हिन्दी भाषा के जानकारों तथा विषय से संबंधित लोगों को मिलकर सरल शब्दों का शब्दकोश बनाना चाहिए। जिससे देश में प्रौद्योगिकी, चिकित्सा आदि की पढ़ाई आसानी से कराई जा सके। कुलपति जी ने कहा कि दुनियाँ में अति विकसित, विकसित और कम विकसित-तीन तरह के देश हैं। हम कम विकसित हैं क्योंकि इन पाठ्यक्रमों की पढ़ाई हिन्दी में नहीं करा पा रहे हैं। फ्रांस, जर्मनी आदि अपनी-अपनी भाषाओं में इन पाठ्यक्रमों को पढ़ा रहे हैं इसलिए वे विकास कर रहे हैं। हमें भी पाठ्यक्रम निर्माण हिन्दी में करना होगा, तभी हम अति विकसित देशों की श्रेणी में आ सकेंगे। हिन्दीभाषी लोग दुनियाँ में 30 से 40 वर्षो के भीतर बढ़े हैं अगर यह ठीक बात है तो हिन्दी का प्रसार भी तेजी से बढ़ना चाहिए। माननीय कुलपति ने कहा कि ’हिन्दी दिवस’ हमारे लिए औपचारिकता है। हर दिन हमारे लिए ’हिन्दी दिवस’ है। हर दिन हमें हिन्दी की बात करनी चाहिए। भाषा को क्लिष्ट होने से बचाएं, भाषा को भ्रष्ट होने से बचाएं। आज की फिल्मों के गीत बहुत ही भ्रष्ट भाषा में हैं इससे हम भाषा का उत्थान न कर उसे नीचे गिरा रहे हैं।
अन्त में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि हम हिन्दी के क्षेत्रीय रूप पर भी काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रवासी साहित्य पर पाठ्यक्रम निर्धारित किया है। कार्यक्रम का संचालन मोनू सिंह एवं प्रगति ने किया।
हिन्दी दिवस के इस मौके पर प्रो0 वाई विमला, प्रो0एस0के0 दत्ता, डाॅ0 महेश गर्ग, मेरठ के साहित्यकार पं0 ईश्वर चन्द्र गंभीर, ज्वाला प्रसाद कौशिक ’साधक’, सुमनेश ’सुमन’, तुषा शर्मा, आदि तथा डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 सीमा शर्मा, डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, डाॅ0 गजेन्द्र सिंह, विवेक, अंजू, आरती राणा, अमित कुमार, ललित सारस्वत, नेत्र पाल, तथा छात्र-छात्राओं में कौशल, दलीप, पिण्टू, शिवानी, चंचल, संध्या, मिलिन्द, ब्रह्मसिंह, ज्योति, मनीषा, मोहनी, कपिल, आयुषी, पूजा, चरण सिंह, अनुराधा, राहुल आदि उपस्थित रहे।


   


















Monday, September 5, 2011

मुझे भारत बहुत अच्छा लगता है -अर्चि शर्मा



यूरोप में आयोजित हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता में चयनित छः देशांे के 12 विद्यार्थी तथा उज्वेकिस्तान के 8 विद्यार्थियों का एक दल ‘अक्षरम्‘ नई दिल्ली भारतीय सांस्कृतिक परिषद के पदाधिकारियों के साथ भारत भ्रमण कार्यक्रम के अन्तर्गत चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्द विभाग में प्रातः 11 बजे पहुँचा। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय तथा विदेशी विद्यार्थियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान भी हुआ। 
कार्यक्रम में विदेश से आये सभी विद्यार्थियों ने अपना परिचय तथा हिन्दी भाषा को सीखने के दौरान हुए अनुभवों को भी साझाा किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में लंदन से आई अर्चि शर्मा ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मुझे भारत बहुत अच्छा लगता है। इसके साथ ही यहाँ के लोग और संस्कृति तथा तीज-त्यौहारों से मुझे बेहद लगाव है। इस अवसर पर उन्होंने एक कविता भी सुनाई - ‘‘चाहे पथ पर शूल बिछा दो। इसके बाद रूस से आई पोलीना रीजोवा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि- ‘‘मुझे भारत अच्छा लगता है। इन्होंने मंगलेश डबराल की कविता सुनाई। उज्वेकिस्तान के जावेद दनजिदेव ने इस मौके पर कबीर का एक दोहा पढ़कर सुनाया। हंगरी से आई ऐगनेर आगोस्तोन ने भारत देश को बहुत अच्छा बताया साथ ही उन्होंने ‘कस्तूरी कुण्डल बसे‘ नामक दोहा भी सुनाया। रूस से आई लीडिया आहीपोवा ने कहा कि मैं मास्को राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी सीख रही हूँ तथा उन्हें हिन्दी के विद्याथियों से मिलकर बेहद प्रसन्नता हुई। इसके साथ उन्होंने सभी विद्यार्थियों को रूस आने का निमंत्रण भी दिया। 
लंदन से आई ऋतु बरोलिया ने कहा कि मैं भारत की संस्कृति को समझना चाहती हूँ इसलिए हिन्दी पढ़ रही हूँ। इस अवसर पर उन्होंने सुभद्रा कुमारी चैहान की कविता झाँसी की रानी की कुछ पंक्तियाँ सुनाई ‘‘सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने मृकुटी तानी थी उज्बेकिस्तान के नजारो व एलवेक ने अपना परिचय देते हुए ‘‘कुछ-कुछ होता है‘‘ फिल्म का गाना सुनाकर सभी का मुग्ध कर दिया। विदेशी छात्रों के दल संचालक नरेश शांडिल्य ने बताया कि हम आई0सी0सी0आर0 तथा ‘अक्षरम्‘ संस्था की ओर से प्रतिवर्ष विदेशी बच्चों को ताजमहल, बनारस, प्रयाग, हरिद्वार, संसद भवन आदि ऐतिहासिक तथा धार्मिक स्थलों का भ्रमण कराते हैं। जिससे कि इन देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो सके। उन्होंने हिंदी के प्रति विदेशी बच्चों के उत्साह जोश और प्रतिबद्धता की प्रशंसा की। इस अवसर पर शशि वालियाँ ने भी विदेशी बच्चों के गरम-जोशी से स्वागत के लिए हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी का आभार व्यक्त किया। बुल्गारिया से आई मोना कौशिक ने कहा कि रूस तथा अन्य देशों के विद्यार्थी भारत घूमने के लिए आये इसके लिए मैं अक्षरम् व हिन्दी विभाग को धन्यवाद देती हूँ पूर्व शिक्षा संकाय अध्यक्ष प्रो0 के0जी0 शर्मा ने कहा कि हिंदी विश्व भाषा बनने की योग्यता रखती है तथा इस भाषा में भारत की हजारों वर्ष की परम्पराएँ, शिक्षा, संस्कार, ज्ञान, सुरक्षित है। इब समय आ गया कि लोग हिंदी की ताकत को पहचाने। विज्ञान संकाय अध्यक्ष प्रो0 एच0एस0 सिंह ने अपने निजी अनुभव साझाा किए तथा साथ ही अपनी हंगरी यात्रा के अनुभवों को प्रस्तुत किया। वनस्पति विज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो0 वाई0 विमला ने कहा कि मैंने हंगरी जाकर वहाँ की भाषा सीखी तथा उन्होंने यह भी कहा कि भाषा के सम्मुख कोई जाति, वर्ग आड़े नहीं आता है। भाषा के माध्यम से हमारी अभिव्यक्त तथा भावनाएँ एकाकार हो जाती है। इस अवसर पर हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने विदेशी छात्रों का स्वागत करते हुए कहा कि भाषा पर कोई बैरियर नहीं होता। ये देश भले ही भौगोलिक सीमाओं में बँटे हुए हों ये सीमाएँ हमने बनाई है। भाषा इन सभी सीमाओं तथा बन्धनों को तोड़कर विश्व को एकाकार होने का सन्देश देती है। हिन्दी विभाग के छात्र मोनू सिंह ने कहा कि मैं विदेशी विद्याथियों के हिन्दी भाषा के प्रति अनुराग एवं सीखने की मुक्त कण्ठ से सराहना की साथ ही कहा कि आज वैश्विक रूप में हिन्दी एक नई ताकत एवं उर्जा के रूप में उभर रही है। जिसे सारी दुनियाँ ने स्वीकार किया है। एम0फिल् की छात्रा प्रगति ने विदेशी छात्रों का स्वागत किया। एम0ए0 की छात्रा कौशल कुमारी ने भी स्वागत किया। 
इस अवसर पर राजनीति विभाग की प्रो0 अर्चना शर्मा तथा समाजशास्त्र विभाग के प्रो0 कुलानुशासक योगेन्द्र सिंह ने विदेशी विद्यार्थियों को विभागीय पत्रिका मंथन की एक-एक प्रति भेट की। इसके बाद विदेशी छात्रों के दल चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एच0सी0 गुप्ता के निवास स्थान पर भेंट की तथा इस अवसर पर कुलपति महोदय ने वि0वि0 परिवार की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया। 
कार्यक्रम का समापन हिन्दी साहित्य कुटीर में साहित्यकारों की प्रतिमाओं के दर्शन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन डाॅ0 सीमा शर्मा ने किया। इस अवसर पर डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 रविन्द्र कुमार, मोनू सिंह, अंजू, आरती राणा, ललित सारस्वत, चरनसिंह, राहुल कुमार, प्रगति, सुजाता, दिलीप शर्मा, कौशल कुमार, शिवानी, मिलिन्द, आयुषी, पूजा आदि उपस्थित रहे।  
























हिन्दी विभाग में आयोजित विशेष व्याख्यान ‘‘विदेशों में हिन्दी अध्यापन(बल्गारिया के विशेष सन्दर्भ में)‘‘ : डाॅ0 मौना कौशिक


हिन्दी भाषा और साहित्य को लेकर हिन्दी वालों में एक खास भावना घर कर गई है, ये भावना हमें मिटानी होगी। अगर हिन्दी माध्यम से पढ़े-लिखे बच्चे न्यूयार्क तक पहुँच सकते हैं तो आप भी इस बुलन्दी को छू सकते हैं। ये विचार आज चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आयोजित विशेष व्याख्यान ‘‘विदेशों में हिन्दी अध्यापन(बल्गारिया के विशेष सन्दर्भ में)‘‘ में सेंटर फार ईस्टर्न लेग्वेंजस एण्ड कल्चर डिपार्टमेंट आॅफ क्लासिक ईस्ट क्लीमेंर्स आख्रीद्स्की, सोफिया, बुल्गारियां में हिन्दी अध्यापन कर रही डाॅ0 मौना कौशिक ने व्यक्त किए। डाॅ0 मौना को पिछले 19 वर्षों से हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाने का अनुभव है। सन् 2008 में न्यूयार्क में हुए ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी इन्होंने शिरकत की। इनके द्वारा बनाए गए भारतीय संस्कृति पर आधारित विभिन्न पाठ्यक्रम सोफिया विश्वविद्यालय से स्वीकृत हुए हैं। साथ ही हनुमान चालीसा का अनुवाद/प्रकाशन, ‘भाषा बादल की छाया‘ हिन्दी कहावतों एवं मुहावरों का तथा ‘दादा-दादी की कहानियों का बल्गारियाई भाषा में हिन्दी से आप अनुवाद करा चुकी है। साथ ही बल्गारियाई टेलीविजन द्वारा 28 मिनट का वृत्ताचित्र भी इन्होंने तैयार किया। डाॅ0 मौना कौशिक की पहचान आज एक प्राध्यापक, अनुवादक, कवयित्री, लेखक, आयुर्वेद व योग अध्ययन-अध्यापन को लेकर है।
डाॅ0 मौना कौशिक ने कहा कि हमारी हिन्दी वर्णमाला के अक्षर दैविक है। हमारी लिपि की महानता है कि उसके प्रत्येक वर्ण में दिव्यता छिपी हुई है। इस कारण हिन्दी हमारे जीवन से जुड़ी है। हर स्वर-व्यंजन में शक्ति है कि वह आपकी नाडि़यों में ऊर्जा प्रवाहित कर सकता है। जो संस्कृत मन्त्रों का काम है, वही हिन्दी का काम है। उन्होंने बताया कि बल्गारिया में हिन्दी पढ़ाते हुए हम वर्णमाला से ही अक्षर ज्ञान शुरू कराते हैं। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे ‘आ‘ स्वर से ‘आम‘ बनता है और ‘आम‘ का भारतीय संस्कृति में महत्व है क्योंकि धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में यह शुभ माना जाता है और यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि विदेशों में वही लोग हिन्दी पढ़ रहे हैं जो भारतीय संस्कृति से जुड़ना चाहते हैं, जो भारतीय परंपराओं का सम्मान करते हैं। हिन्दी को लेकर न गर्व करने की बात है, नहीं अपमानित होने की। हम हिन्दी का सम्मान करंे। हिन्दी के साथ ही दूसरी भाषाओं को भी जानने-सीखने और प्रेम करने का आह्वान उन्होंने किया। डाॅ0 मौना कौशिक ने कहा कि हिन्दी आज आगे बढ़ रही है, वह केवल भाषा ही नहीं रह गई है, बल्कि व्यावसायिक बन रही है। हिन्दी साहित्य की विद्याओं के अनुवाद बल्गारियाई भाषा में हो रहे है। इस सन्दर्भ में उन्होंने अज्ञेय के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी‘ का नाम लिया।
प्रवासी साहित्य को उन्होंने भारत के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति बताते हुए कहा कि बल्गारियाई भाषा में प्रवासी साहित्य न के बराबर है, बल्कि अमेरिका, कैनेडा में ज्यादा है। प्रवासी लेखन की खासियत बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्यकार दुनियां के किसी भी कोने में हिन्दी के माध्यम से पहुंच सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश-विदेश को संकुचित रूप में देखना छोड़ना होगा। प्रवासी साहित्य पर काम करने से वहाँ बैठे लोग लेखक से जुड़ रहे है।
उन्होंने बताया कि बल्गारिया में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में हिन्दी फिल्मों का महत्वपूर्ण योगदान है, विशेषकर हिन्दी फिल्मों के गीतों का प्रस्तुतीकरण बहुत अहम् है। हिन्दी फिल्म ‘लगान‘ को देखकर ही बल्गारिया में महिलाओं ने क्रिकेट खेलना शुरू किया। डाॅ0 कौशिक ने बताया कि हिन्दी भाषा के शब्द हिन्दी फिल्मों के माध्यम से दूसरे देशों में जा रहे हैं। इसके साथ ही हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आयुर्वेद और योग का भी खासा योगदान है, इन्हीं के माध्यम से लोग ‘वात-पित्त -कफ को जानते हैं और वहाँ ‘प्रणाम, नमस्ते, धन्यवाद आदि शब्दों का प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही आध्यात्मिकता भी भाषा के प्रचार-प्रसार का माध्यम है।
इस अवसर पर हिन्दी विभागध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि दो तरह के प्रवासी आज दिखाई दे रहे हैं, पहले वे जिन्हें भारत से जबरिया ले जाया गया और वे फिजी, सूरीनाम आदि देशों में बस गए। वे भारतीय मूल के थे, अब वह उनका मूल देश है, क्योंकि उनके पूर्वज भारत के थे। दूसरे वे है जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी, भाषा के व्यवसाय के सन्दर्भ में अपनी रूचि से गए। आर्थिक समृद्धि के लिए गए, फिर वहाँ जाकर साहित्य रचना भी करने लगे। अभी यह जानना अहम मुद्दा है कि प्रवासी लेखक कौन है ? क्योंकि यह संक्रमण काल है। इस अवसर पर प्रो0 लोहनी ने डाॅ0 मौना कौशिक का आभार व्यक्त किया।
हिन्दी विभाग के शिक्षक डाॅ0 सीमा शर्मा, डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, अंजू, आरती राणा तथा छात्र-छात्राओं में शिवानी, कौशल, मोहनी, कपिल, पूजा, मिलिन्द ब्रह्ममसिंह, चंचल, सोनू नागर, विनय, अंकित आदि मौजूद रहे।

हिन्दी विभाग में आकाशवाणी द्वारा आयोजित गोष्ठी- मेरठ का विकास : चुनौतियां और संभावनाएं

20 अगस्त 2011, मेरठ मण्डल का विकास: चुनौतियाँ और संभावनाएं

कार्यक्रम आधिकारी मनोहर सिंह रावत ने बताया कि  कार्यक्रम दिनाक २७ अगस्त २०११ दिन शनिवार को सांय 4 बजकर 5 मिनट से 5 बजकर 5 मिनट तक आकाशवाणी  के राजधानी चैनल 450.5 पर  666 KH पर प्रसारित किया जायेगा........

मेरठ, दिनांक 20 अगस्त 2011। चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के हिन्दी विभाग तथा आकाशवाणी, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आज हिन्दी विभाग में ‘मेरठ मण्डल का विकास: चुनौतियाँ और संभावनाएं‘ विषय पर  संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आकाशवाणी के निदेशक श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेई ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी, उन्होंने बताया कि आकाशवाणी ने कई शहरों, राज्यों में अपने कार्यक्रमों के माध्यम से विकास की पहल की और इसी सन्दर्भ में वे आज मेरठ आए हैं। उन्होंने बताया कि पूरे भारत वर्ष में संचार माध्यमों खास कर इलैक्ट्रोनिक माध्यमों में रेडियो जितने लोगों से जुड़ा है उस अनुपात में ओर कोई माध्यम नहीं है, साथ ही आकाशवाणी की विकास कार्यक्रमों से सन्दर्भ में प्रासंगिकता के विषय में भी अपने विचार रखते हुए विषय प्रवर्तन किया। हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों एवं गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत सम्बोधन किया तथा बुके भेंट कर उनका स्वागत किया।
चै0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एच0 सी0 गुप्ता ने कहा कि प्रसन्नता का विषय है कि आकाशवाणी दिल्ली ने मेरठ मण्डल के विकास की चुनौतियों और संभावनाओं पर आज यहाँ गोष्ठी आयोजित की है। जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विकास के साथ मेरठ के विकास को गति मिलेगी। कृषि, उद्योग, शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में मेरठ ने जो प्रगति की है वह अभूतपूर्व है, किंतु संसाधनों का नियोजन और उसके उपयोग को निश्चित करने के लिए समय-समय पर जो कार्य होने चाहिए उसके लिए निरंतर कार्यक्रम आधारित विकास की योजना बननी चाहिए। जिसकी अभी मेरठ को जरूरत है। इस क्षेत्र में पर्याप्त पानी, कृषि योग्य भूमि के चलते हरित क्रांति तो हुई किन्तु अब धीरे-धीरे कृषि योग्य भूमि का उपयोग अन्य कार्यों के लिए होने के कारण उसकी कमी हो रही है। जिससे पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है। मैं चाहता हूँ कि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी हम पर्याप्त ध्यान दें। कभी कैची उद्योग के कारण प्रसिद्ध मेरठ आज चीनी मिलों, खेल, उद्योग, आभूषण प्रकाशन, हस्तकरघा, गुड, तेल, कागज, गत्ता, सूती वस्त्र, सहित कई नए क्षेत्रों में मुकाम स्थापित कर रहा है। 
मेरठ के सांसद राजेन्द्र अग्रवाल ने अपनी बात व्यवस्था में भ्रष्टाचार से मुक्ति से शुरू की तथा उन्होंने मण्डल के विकास और संभावनाओं के मद्देनजर प्रशासकीय संरक्षण और प्रोत्साहन पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मेरठ प्रदेश में देश में तथा दुिनयां में अपनी एक विशेष छवि के लिए जाना जाता है तथा मेरठ मण्डल के विकास को नए सोपानों की ओर ले जाने के लिए बुनियादी ढांचा और परिवहन व्यवस्था (रेल, बस, सड़के) आदि पर भी संज्ञान लिया। माननीय सांसद ने मेरठ में औद्योगिक विकास के लिए मेरठ की छवि को सुधारने की ओर भी संकेत किया तथा उन्होंने मेरठ के फोक कल्चर (लोक संस्कृति तथा भाषाई प्रश्न को भी उठाया। उन्होंने मेरठ मण्डल के हस्तिनापुर क्षेत्र को रेल परिवहन से भी जोड़ने की बात कही तथा कृषि आधारित उद्योगों एवं चै0 चरण सिंह के ग्राम नूरपुर में खाद्य प्रसंस्करण निर्मित कराने की बात कही। अंत में उन्होंने कहा कि मेरठ असीम संभावनाओं से भरा क्षेत्र है जिस में कृषि, उद्योग, शिक्षा एवं बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सभी क्षेत्रों में विकास किया जा सकता है।
मेरठ मण्डलायुक्त श्री भुवनेश कुमार ने अपनी बात आरम्भ करते हुए कहा कि हमारे देश में विगत 25 वर्षें में प्रत्येक क्षेत्र में बहुत उन्नति की है। इस उन्नति को हम तुलनात्मक ढंग से बेहतर समझ सकते हैं। उन्होंने मेरठ मण्डल को अन्य शहरों और प्रान्तों की तुलना में बहुत समृद्ध बताया। उन्होंने कहा कि फिर भी मेरठ में विकास की अनन्त संभावनाएं हैं। बिजली, सड़के, रेलयातायात, शिक्षा, उद्योग धन्धे आदि में और निवेश की ओर ज्यादा आवश्यकता है। उन्होंने अपनी बातों को पुष्ट करते हुए आंकड़ों के आलोव में कई परियोजनाओं का भी जिक्र किया। मण्डलायुक्त ने मुख्य बिन्दु यातायात पर केन्द्रित किया। उन्होंने दिल्ली एक्सप्रेस वे डेली पैसिन्जर ट्रेन तथा अन्य कुछ विचाराधीन परियोजना पर भी विस्तार में प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने मेरठ क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों को भी विकसित करने पर बल दिया। उन्होंने बताया कि गाजियाबाद में हिण्डन नदी पर 29 करोड़ रूपये की लागत से एक पुल निर्माणाधीन है तथा मुरादनगर-मोदीनगर में लाई ओवर बनाने की योजना पर भी अमल किया जा रहा है। अन्त में उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि हम हीन भावना से ग्रस्त है। हमारा नजरिया नकारात्मक पूर्ण  है तथा मीडिया इसे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है। उन्होंने मेरठ के विकास के लिए सकारात्मकता एवं मिल-जुलकर एक इकाई के रूप में कार्य करने का सुझाव दिया तथा यह भी बताया कि मेरठ देश के प्रगतिशील शहरों की सूची में चैथे स्थान पर है। इस अवसर पर मेरठ के प्रसिद्ध टाउन प्लानर जागेश कुमार ने मेरठ के विकास के लिए परिवहन व्यवस्था पर बल दिया तथा उन्होंने उचित ढंग से सुनियोजित विकास के लिए सरकारी व्यवस्था को दोषी बताया। 
उद्योग जगत से जुडे श्री पंकज गुप्ता ने मेरठ मण्डल के विकास के लिए तथा औद्योगिक विकास के लिए भयमुक्त वातावरण तथा शहर की अच्छी छवि को मुख्य कारक बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र का विकास मुख्यतः औद्योगिक ढांचे पर निर्भर करता है। इन्फास्ट्रक्चर की कमी भी औद्योगिक विकास के आडे आती है। इसके साथ ही बिजली, सुरक्षा व्यवस्था, जल निकासी, आग नियंत्रण, वाटर सलाई आदि पर भी विशेष बल दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि मेरठ शहर में कृषि विश्वविद्यालय होने के बावजूद भी यहाँ फूड प्रोसेसिंग उद्योग नहीं है जिस क्षेत्र में अनंत संभावनाएं विद्यमान है। जिसके विकास से मेरठ के विकास को गति मिलेगी। 
अधिवक्ता सुश्री शाहीन परवेज ने मेरठ मण्डल के विकास में गरीब और मलिन बस्तियों के विकास की जरूरत बताई। उन्होंने मेरठ शहर की चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि हम धर्म, जाति-पाति, भेदभाव में बँटे हुए हैं। जब तक इन समस्याओं से निजात नहीं मिलेगी तब तक मेरठ के विकास की बात करना बेमानी है। उन्होंने कहा कि मेरठ भूमाफियाओं, स्वार्थी नेताओं और बहुसंख्यक अज्ञानी लोगों के हाथ में है। अतः में बुद्धि जीवियों से आहवान करती हूँ कि इस दिशा में सार्थक पहल की आवश्यकता है। उन्होंने मेरठ के विकास के लिए कमेले की निन्दा की तथा उन्होंने मेरठ के कैंची उद्योग तथा छोटी-छोटी गलियों में चल रहे कुटीर उद्योगों के क्रियान्वयन के लिए उचित बुनियादी जरूरतों पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि अमीर लोग तो पैसे के बल पर अपने लिए सभी सुविधाएं जुटा लेते हैं किन्तु गरीब एवं मलिन बस्तियों में जो अनाधिकृत कालोनियों में बुनियादी सुविधाएं नहीं पहँुचती। मेरठ के पूरे विकास के लिए गरीब एवं मलिन बस्तियों के विकास को भी समझने की आवश्यकता है। 
विश्वविद्यालय के गणित विभागाध्यक्ष प्रो0 मृदुल कुमार गुप्ता ने मेरठ मण्डल के विकास के लिए शिक्षा पर बल दिया साथ ही उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विकास को भी अपने एजेण्डे में सम्मिलित किया। अत्यधिक कार्यभार एवं वृहत् क्षेत्रफल की दृष्टि से उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की बात कही और विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालयों में रिक्त पदों पर नियुक्ति को प्राथमिकता दी। 
संगोष्ठी के अन्तिम चरण में सुझाव और प्रश्नोत्तरी के तहत संगोष्ठी में शामिल शहर के गणमान्य और वरिष्ठ विशेषज्ञों के प्रश्नों को भी स्थान दिया गया। शहर के वरिष्ठ नागरिक एवं इतिहासविद् धर्म दिवाकर ने मेरठ मण्डल के विकास के लिए हस्तिनापुर को रेलवे लाईन से जोड़ने की बात कही। 
गिरीश शुक्ला ने मेरठ के विकास में पर्यावरण सन्तुलन पर विशेष बल दिया तथा शहर के प्रसिद्ध गजलकार एवं बिजली विभाग के पूर्व अभियंता किशन स्वरूप ने मेरठ के विकास के लिए नजरिया बदलने की बात कही तथा अमित पाठक ने मेरठ मण्डल के विकास के लिए पर्यटन के विकास पर बल दिया वाणिज्यकर आयुक्त ओ0पी0 रतूडी ने कहा कि मेरठ असीम संभावनाओं से भरा शहर है। इन सभी प्रश्नों के मण्डलायुक्त ने उत्तर दिए तथा भविष्य में भी समस्याओं के समाधान करने की बात कही। 
संगोष्ठी का संचालन आकाशवाणी की कार्यक्रम अधिकारी एवं उद्घोषिका ऋतु राजपूत तथा हिन्दी विभाग के शोधार्थी रवीन्द्र राणा ने किया। जिसमंे उनका सहयोग आकाशवाणी के अधिशासी अधिकारी मनोहर सिंह रावत ने किया। इस अवसर पर शहर के कई क्षेत्रों से जुडे गणमान्य व्यक्ति तथा वरिष्ठ नागरिक भी उपस्थित रहे। इस अवसर पर प्रो0 वाई विमला, प्रो0 योगेन्द्र सिंह, वित्त नियंत्रक अतुल कुमार सिंह, डाॅ0 ए0 के0 चैबे,  साथ ही हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 सीमा शर्मा, डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, एवं छात्र-छात्राओं में नरेन्द्र मिश्र, आरती, अंजू, मोनू सिंह, ललित सारस्वत, अमित, राहुल, चरणसिंह, मिलिन्द, मोहनी, कपिल, शिवानी, कौशल, मनीषा, सन्ध्या, पूजा, प्रगति, दिलीप शर्मा, पवन भारतीय, पिण्टू, अरूण गौतम आदि उपस्थित रहे। 







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