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Thursday, January 13, 2011

हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर वेद प्रकाश वटुक

 


आज अमेरिका में भारत की तरह जातियाँ, धार्मिकताएँ पहचान बना रही है। प्रवासी भारतीयों में यह पहचान प्रतीक हाल के दिनों की उपज हैं क्योंकि अमेरिका में नई पुरानी तीन पीढ़ियों के अलग प्रतीक थे। आज की अधिकांश पीढ़ी का प्रतीक केवल पैसा रह गया है इसलिए भारत से दक्ष होकर अमेरिका की सेवा कर रहे हर व्यक्ति को अपनी आय का एक हिस्सा भारत पर खर्च करना चाहिए क्यांेकि यहां की जनता की आय उनकी शिक्षा एवमं व्यक्तित्व निर्माण में व्यय हुई है। यह विचार आज चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिंदी विभाभ में विश्व प्रसिद्व साहित्यकार एवमं समाजशास्त्री प्रो0 वेद प्रकाश बटुक ने व्यक्त किये            प्रो0 बटुक ने कहा कि प्रवास और अप्रवास दो शब्द है प्रवासी कोई शब्द नहीं है। हिन्दुस्तान की कभी ऐसी स्थिति नहीं रही कि एक, दो करोड़ लोग कही चले जायें तो देश पर कोई फर्क पडें। भारत में दुनियाँ भर के डाक्टर और इंजीनियर पैदा होते है और विदेश चले जाते हैं उन्हें अपनी आय का आधा हिस्सा देश को देना चाहिए। हमें आज भी विदेशों में कही गयी बात को सर्वोच्च समझने की आदत हैं अगर कोई भारतीय कहता है तो उसे तवज्जों नहीं देते हैं।
       दुनियाँ में सबसे ज्यादा प्रवासी इंग्लेंड के लोग है, उन्होंने ही एग्रीमेंट शब्द से गिरमिटिया शब्द बनाया। यह गिरमिटिया लोग कोनट्रैक्ट पर जाते थे किंतु वापस नहीं आ पाते थे। यह नये युग की नयी-दास प्रथा थी। 1916 में यह प्रथा खत्म की गयी, लेकिन वहाँ के निवासियों और उनके बीच तना-तनी हमेशा रही। आज विदेशों में गये लोग लोग वहाँ अपनी हिंदी को तो किसी तरह बचाये हुए हैं लेकिन स्थानीय भाषा को सीखना नहीं जाते हैं।
     काफी लम्बे समय से अमेरिका का वर्चस्व रहा है, वहाँ मुखोटे बदलते है पॉलिसी वही रहती है। चाहे वह ओबामा हो या कैनेडी हो या रूजवेल्ट हो अगर आप हीरो हो सही में माडल हो तो काम भी वैसे कीजिए। मेरा मानना है एक आदमी के बदलने से दुनियाँ नहीं बदलती है। दूसरा मलेशिया, श्रीलंका, अफ्रीका में भी लोग है अफ्रीका में परेशानी ब्लैक और ब्राउन की है, हमारे यहाँ से गये गुजराती भाई मेहनत और व्यापार करना जानते थे इसलिए काले लोग उनसे चिढते है, जैसे ही उनकी सरकार आती है वह उन्हें परेशान करते है। आज भी यह सोच है कि भारतीय अपनी लड़की की विदेशी लड़के से शादी करने से बचते हैं।
       वर्मा में भी यही हुआ सन् 1835 तक हम उसे अपना हिस्सा मानते थे। भारतीय जहाँ भी गए उन्होंने वहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया लेकिन वहाँ की संस्कृति को वह आत्मसात नहीं कर पाये। आज भी वहाँ भारतीयता के नाम पर भाषा, विवाह एवं संस्कृति की बाते होती है। अमेरिका की स्थिति हमसे अधिक शोचनीय  है। आजादी से पहले पंजाब के युवकों के पास दो ही रास्ते थे या तो वह विदेश चले जाये या सेना में शामिल हो जायें। कनाड़ा में जमीन ज्यादा आबादी कम है इसलिए पंजाब के सबसे ज्यादा निवासी कनाड़ा में थे। बाद में वहाँ के स्थानीय लोगों को एतराज होना शुरू हुआ, उन्ही दिनों अमेरिका के कई राज्यों में भी भारतीय बढ़े लेकिन उन्हें वहाँ का नागरिक बनने की सुविधा नहीं मिली इसलिए उन्हें कोई अधिकार भी नहीं मिला। यहाँ के लोग सस्ते दामों पर मजदूरी करते थे इसलिए वहाँ के मजदूरों और यहाँ के मजदूरों के बीच झगड़े शुरू हुए। बाद में धीरे-धीरे इन्ही भारतीय लोगों मंे से कुछ लोगों ने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। पढ़ने-लिखने गये लोगों में क्रांतिकारी भी थे, जिन्होंने भारतीय मजदूरो के साथ मिलकर आवाज उठाई इनमंे लाला हरदयाल, सावरकर आदि थे। उन्हें धीरे-धीरे अनुमान हुआ कि हमें बस उतनी ही छूट है कि हम काम करो लेकिन अधिकार न माँगे। उन्हे आभास हुआ कि अधिकार हमें तभी मिल सकते है जब हम अपने देश को स्वतन्त्र कराये।
      अमेरिका में गदर पार्टी बनी और उन्होने कहा कि गदर का ऐलान हम हिंदी भाषा में करेगे। गदर करेगे भारत में। आवश्यकता है आपकी गदन की इसलिए युगान्तर आश्रम बाद में गदर आश्रम और पार्टी गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुई। प्रथम विश्व युद्ध के समय साठ प्रतिशत भारतीय विदेशो से लौट कर आये। उन्होंने कहा की हमने विदेशो के लिए बहुत जानें दी है अब हम अपने देश के लिए जान देगें। विदेशो मे गयी पहली पीढ़ी पूरी की पूरी देश की स्वतन्त्रता के लिए समर्पित हो गयी।
       इसके बाद इनके जो वंशज वहाँ रह गये उन पर भी मुकदमे चले, बाद में इस पीढ़ी ने अपना तन-मन-धन वहाँ अधिकार पाने में लगाया। वहाँ स्त्रियों को एवं अन्य देशों के निवासियों को डेढ़ सौ साल अधिकार पाने में लगे। सन् 1946 में भारतीयांे को नागरिकता के अधिकार मिले अमेरिका मंे दूसरी पीढ़ी इसी संघर्ष में खप गयी।  1950 के आस-पास कोटा सिस्टम शुरू हुआ। जिसमें हर साल 100 भारतीय माइग्रेट होकर आ सकते थे। सन 1966 में जानसन ने उदारवादी नीति अपनाई उसने कोटा सिस्टम समाप्त किया।
       तीसरी पीढ़ी में जो लोग अमेरिका आये वह पढ़े लिखे थे। इस पीढ़ी मे आज भी ग्लानि है कि जो सोच कर आये थे वह भारत के लिए नहीं कर पाये। 1974 के बाद जो चौथी पीढ़ी आई उसका उद्देश्य केवल पैसा कमाना और वहाँ बसना है। वर्तमान पीढ़ी अपने बच्चों को पूरा अंग्रेज बना कर रखना चाहती है। कहा जाता है बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता अगर अमेरिका स्वर्ग है तो मेरा मानना है अपनी आत्मा को मारकर ही वह स्वर्ग मिल सकता है। वहाँ आपको बढ़िया बिहारी, गुजराती, पंजाबी, मिलेगें लेकिन हिन्दुस्तानी नहीं मिलेंगे हमे अपने शहीदो को भी बाटने की कोशिश की है यहा तक कि भगतसिंह को खाली स्थान से जोडकर उग्रवादि बताया गया। अमेरिका में ब्राहमण सभा, जाट सभा, पंजाबी सभा है लेकिन हिन्दुस्तानी सभा केवल भारतीय स्टारों की नाइट्स में देखने को मिलती है अगर बाहर से पैसा नहीं आता तो निश्चित ही भारत मंे धार्मिक उग्रवाद नहीं पनपता जब सम्पन्ता आती है तो अलगाव भी आता है। उन्होंने कहा की भारत विरोधी आन्दोलन इसलिए भी यहाँ पनप जाते हैं कि उन्हें विदेशो से धन मिलता है।
कला संकायध्यक्ष प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने इस अवसर पर कहा की भारतीय संस्कृति में निरन्तरता, उदारता है इसलिए हमने कभी भी किसी पर शासन करने की बात नहीं सोची, हम कभी कूपमण्ड्क, नही रहे सिन्धुघाटी के समय में भी विदेशों से हमारा सम्पर्क था और निरन्तर हमने अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता को बनाये रखा।
प्रो0 अर्चना शर्मा ने कहा हमने बटुक जी के माध्यम से एक हजार साल की विदेशों में भारत की विकास यात्रा का समझा। बटुक जी की पीडा आज के हर भारतीय की पीढ़ा है। इस अवसर पर प्रो0 एस के दत्ता,, अंजू, सीमा शर्मा, आरती, विवेक, राजेश कुमार, मोनू सिंह आदि भी उपस्थित थे।  
    

Tuesday, September 14, 2010

"जब हिन्दी बोले, गर्व से बोले........., हीन भावना से न बोलें "

‘‘देश को आजाद हुए वर्षो बीत गये, हिन्दी के भविष्य लेकर आज हम बहस करेें यह बेतुका लगता है। मुझे नहीं लगता कि हिन्दी का भविष्य खतरे मेें है’’ यह विचार हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी विभाग में आयोजित संगोष्ठी ‘‘हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी’’ में दिल्ली से आयी हिन्दी दुनियाँ की जानी मानी समीक्षक प्रो0 निर्मला जैन ने व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में 550 से भी अधिक केन्द्रों पर वर्तमान में हिन्दी पढाई जा रही है। इसका श्रेय बाजारवाद को है। विज्ञापन की भाषा, मीडिया की भाषा, फिल्मों की भाषा आज हिन्दी है। यह पंडितों की भाषा नहीं है, बल्कि गली-बाजार की भाषा है, समाचार पत्रों की भाषा है। आज हिन्दी के पत्रों में वृद्धि हुई है। वे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं। उन्होनंे कहा जब हिन्दी बोले, गर्व से बोले हीन भावना से न बोलें।


संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एन0 के0 तनेजा ने कहा कि भारत की प्राचीनतम भाषा हिन्दी की अभिवृद्धि में उसकी वैश्विक पहचान बनाने में योगदान करें। यह सौभाग्य का विषय होगा। वास्तव में पराधीनता के वर्षों में हिन्दी की जो वृद्धि होनी चाहिए थी वह अवरूद्ध हुई। परन्तु वैश्वीकण के युग में यह मानव पूंजी है और विश्व में मानव पूंजी का स्थान बढ़ रहा है। इससे हिन्दी के मान सम्मान और पहचान में वृद्धि होगी।


कला संकायाध्यक्ष प्रो0 अर्चना शर्मा ने हिन्दी विभाग के प्राध्यापकों एवं छात्र-छात्राओं का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि सतत् संघर्षशील रहें और हिन्दी को एक नई पहचान दिलाने का प्रयास करें। उन्होंने राष्ट्रमंण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग की पहल हिन्दी विभाग से होने के कारण विभाग कोे बधाई दी।


विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि राजभाषा अधिनियमों के तहत हम क्या-क्या उन्नति कर पाये इस बात पर आज विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग की बात की गई तो बुद्धिजीवी वर्ग ने इसका समर्थन किया है। हमारी इस शुरूआत से आज राष्ट्रमण्डल खेलों के सारे बैनर, होर्डिग आदि हिन्दी में लगाये गए हैं। ये हमारी उपलब्धि है। पाठ्यक्रम में भी इस वर्ष बदलाव किए गए और कौरवी साहित्य तथा प्रवासी साहित्य को पाठ्यक्रम में जोड़ा गया है। हिन्दी दुनियाँ में जो कुछ अच्छा होगा तो हमें खुशी होगी।


इससे पूर्व दिनांक 13 सितम्बर 2010 को हिन्दी विभाग में कविता प्रतियोगिता तथा आशु भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया तथा प्रतियोगिताओं में विजेता छात्र-छात्राओं को आज पुरूस्कार प्रदान किए गए। पुरूस्कार प्राप्त छात्र-छात्राओं की सूची संलग्न हैं।


संगोष्ठी का संचालन आरती राणा ने किया। इस अवसर पर डॉ0 अशोक मिश्र, कु0 नेहा पालनी, कु0 सीमा शर्मा, ईश्वर चन्द गंभीर, डॉ0 रवीन्द्र कुमार, विवेक सिंह, अंजू, ममता, अंचल, अमित, मोनू, कौशल, शिवानी, रजनी, ललित सारस्वत, आदि प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


हिन्दी दिवस 2010 के अवसर पर हिन्दी विभाग में आयोजित आषु भाशण एवं कविता प्रतियोगिता में पुरूस्कार प्राप्त छात्र-छात्राएं:-






कु0 कौशल  प्रथम स्थान कविता प्रतियोगिता


कु0 रजनी द्वितीय स्थान कविता प्रतियोगिता


कु0 ज्योति तृतीय स्थान कविता प्रतियोगिता


श्री नवीन सांत्वना पुरस्कार कविता प्रतियोगिता


कु0 शिवानी  सांत्वना पुरस्कार कविता प्रतियोगिता

 
श्री विवेक ंिसह प्रथम स्थान आशुभाषण प्रतियोगिता


श्री ललित सारस्वत द्वितीय स्थान आशुभाषणप्रतियोगिता


कु0 अंजू तृतीय स्थान आशुभाषण  प्रतियोगिता


श्री मोनू सिंह सांत्वना पुरस्कार आशुभाषण प्रतियोगिता


कु0 निवेदिता सांत्वना पुरस्कार आशुभाषण प्रतियोगिता






Monday, September 13, 2010

हिंदी दिवस पर हिंदी विभाग में आयोजित स्वरचित कविता और आशु भाषण प्रतियोगिता : कैमरे की नज़र से


 प्रतिभागी- कपिल
 प्रतिभागी- रजनी
 छात्र एवं  छात्राओं को संबोधित करते प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी
 प्रतिभागी- मोनू सिंह
 प्रतिभागी- अंजू

( निर्णायक मंडल)

Thursday, August 19, 2010

‘हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता’ के विजेता ‘रूस’, ‘ब्रिटेन’, ‘बुलगारिया’, ‘हंगरी’ आदि देशों के छात्र-छात्राएं : हिन्दी विभाग में

हिन्दी विभाग
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में
दिनांक 20 अगस्त 2010 को
‘अक्षरम्’
द्वारा प्रत्येक वर्ष यूरोप में आयोजित होने वाली ‘हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता’ के विजेता ‘रूस’, ‘ब्रिटेन’, ‘बुलगारिया’, ‘हंगरी’ आदि देशों के छात्र-छात्राएं ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्’ द्वारा आयोजित भारत भ्रमण सांस्कृतिक यात्रा में हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में आ रहे है।


कार्यक्रम

अध्यक्षता - माननीय प्रो0 एस0के0 काक, कुलपति जी
सान्निध्य - प्रो0 अर्चना शर्मा, संकायाध्यक्ष कला
   - श्री अनिल जोशी, अध्यक्ष, अक्षरम्
          - श्री नारायण कुमार, सलाहकार विश्व हिन्दी सम्मेलन
                - प्रो0 विमलेश कांति, पूर्व प्रोफेसर हिन्दी, बुल्गारिया, फिजी
     - प्रो0 हरजेन्द्र चौधरी, प्रोफेसर हिन्दी, जापान, पोलेंड


समय - १२:00 बजे ( दिनांक 20 अगस्त 2010)
स्थान - संगोष्ठी कक्ष, हिन्दी विभाग



आपकी गरिमामयी उपस्थिति प्रार्थनीय है।



निवेदक:
प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी,
अध्यक्ष हिन्दी विभाग,
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ फोन नं: 0121-2772455, 9412207200

Thursday, July 8, 2010

हिन्दी का इस देश में प्रभुत्व होगा

आज दिनांक 07 जुलाई, 2010 को चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ का बृहस्पति भवन राजभाषा समर्थन समिति के आयोजन की गर्मी से सराबोर रहा। वक्ताओं में पक्ष-विपक्ष में राष्ट्र मण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग को लेकर विचार रहे और अन्ततः प्रस्ताव पारित हुआ कि राष्ट्र मण्डल खेलों में अनिवार्यतः हिन्दी प्रयोग कराने के लिए सरकार और आयोजन संस्थाओं को कहा जाएगा। इसके लिए प्रधानमंत्री सहित राजभाषा विभाग तथा राष्ट्रपति से भी मिला जाएगा, संसद में सवाल उठेगे और दिल्ली में यहाँ के आन्दोलन की दमक पूरी शिद्दत के साथ पहुँचाई जाएगी।

मेरठ के सांसद तथा संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य राजेन्द्र अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि वे पहले से ही राजभाषा समिति के समक्ष इस प्रश्न को ला चुके हैं और सरकार को इस पर कार्यवाही के लिए निर्देश भी जारी हुए हैं किन्तु प्रश्न केवल राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी तक नहीं है अपितु इससे आगे है। हमें विश्वास है कि आगामी दशक में हिन्दी का इस देश में प्रभुत्व होगा और अंग्रेजी जो कि अपने आप में अनुशासित भाषा नहीं है स्वयं ही हमारे आम व्यवहार से बाहर हो जाएगी। उन्होंने कहा कि देश को दूसरे देश से जो भाषा जोड़ सकती है वह केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है। मेरठ हिन्दी का मायका है। हिन्दी की इस मुहिम को हम मेरठ के अभिमान के रूप में लें ना कि राजनीतिक अभिमान के रूप में। देश को यदि एक भाषा चाहिए तो वह केवल हिन्दी हो सकती है। देश को जोड़ने के लिए अन्य प्रान्तों की भाषा का भी सम्मान करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए कितने भी प्रयास करने पड़ें, मैं करूँगा एवं जहाँ तक जाना पड़े मैं जाऊँगा।

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो0 एस0 के0 काक, माननीय कुलपति ने कहा कि अगर आप अपनी भाषा का सम्मान करेंगे, गर्व करेंगे तो दूसरे भी करेंगे। हिन्दी को हमें इस प्रकार विकसित करना होगा कि हम इसे अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करें। हमें इसे अर्न्तराष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए, विस्तृत दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा। हिन्दी भाषा बोलने के लिए पहले अपनी भाषा में यकीन, अनुशासन, स्वयं का दृढ़निश्चय होना चाहिये। उन्होंने कहा कि मैं इस पूरे प्रस्ताव के साथ हूँ और इसके लिए जहाँ तक जाना होगा साथ दूँगा।

श्री एस0 पी0 त्यागी जी, सेवानिवृŸा न्यायाधीश ने कहा कि मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि हम अपने कार्यों के लिए दूसरी भाषा का सहारा क्यों लेते हैं? जो लोग हिन्दी के विरोधी हैं, वह जानबूझकर हिन्दी के क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग हिन्दी को बदनाम करने के लिए करते हैं। उन्होंने कहा कि मैं इस समिति के साथ जुड़कर इसलिए गर्व का अनुभव कर रहा हूँ क्योंकि यह अपने देश की भाषा को स्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्पित है और मैं इसके लिए पूरी तरह साथ हूँ।

रासना कॉलेज के प्राचार्य डॉ0 नन्द कुमार ने कहा कि पूर्व में सरकारों ने हिन्दी को आगे बढ़ाने में अपनी सही भूमिका नहीं निभाई है। हम हिन्दी की बात तो बहुत करते हैं लेकिन हिन्दी में कार्य नहीं करते हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और राजभाषा समर्थन समिति ने जो संकल्प लिया है उससे हमारी भाषा का विकास होगा और हम विश्व के समक्ष गर्व करने की स्थिति में होंगे।

डॉ0 आर0सी0 लाल ने कहा कि हम ऐसे लोगों को तैयार करें, जो अच्छी हिन्दी बोलना जानते हों। यह हिन्दी के ही हित होगा।

शिक्षाविद् डॉ0 शिवेन्द्र सोती ने कहा कि हिन्दी प्रयोग भारत को उसकी अस्मिता से जोड़ता है और हमें याद रखना होगा कि हिन्दी का प्रयोग अहिन्दी भाषी लोगों ने अधिक किया और हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है, हिन्दी में शिक्षा अनिवार्य हो। खड़ी बोली हिन्दी खड़ी है एवं खड़ी ही रहेगी। उन्होंने मेरठ को क्रान्ति का शहर बताया और कहा कि हिन्दी की क्रान्ति भी यहाँ से लागू होगी।

पत्रकार हरि शंकर जोशी ने हिन्दी प्रयोग को लेकर कई प्रश्न उठाये और कहा कि हिन्दी वालों को अपने भीतर झांकना चाहिए क्योंकि घर में जब हिन्दी प्रयोग होगी तभी वह आगे बढ़ेगी। उन्होंने प्रश्न किया कि हिन्दी में लिखने से परहेज किसे है? हिन्दी के साथ अन्य भाषाओं का भी प्रयोग हो, इस पर किसी को कोई आपŸिा नहीं है। उन्होंने राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को अनिवार्य ठहराया।

एडवोकेट मुनीष त्यागी ने कहा कि राजनीतिज्ञ नहीं चाहते कि हिन्दी लागू हो, क्योंकि हमारी मानसिकता गुलाम है। जब तक भाषाओं के लेन-देन की बात नहीं होगी तब तक हिन्दी आगे नहीं बढ़गी। हिन्दी के हिन्दीकरण-हिन्दुस्तानीकरण के लिए उसे सांस्कृतनिष्ठ नहीं बनाना चाहिए।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो0 आई0 आर0 एस0 सिंधु ने कहा कि हिन्दी को लाने से हम अपने विकास की प्रक्रिया को कई गुना आगे बढ़ा सकते हैं। भाषा के विषय में कभी भी कट्टरता नहीं अपनानी चाहिए। हिन्दी को दौड़ाने के प्रयास करें लेकिन अंग्रेजी को टंगड़ मारकर गिरायें नहीं। प्रभात राय ने कहा कि भाषा की कट्टरता से काम चलने वाला नहीं है। बात बनेगी सही भाषा नीति से। डॉ0 असलम जमशेदपुरी ने कहा कि हिन्दी भारत की राजभाषा है यह उतना ही सत्य है, जितना कि सूरज का निकलना और उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें दिल्ली में प्रदर्शन करना चाहिए।

कार्यक्रम की सहयोगी संस्थाओं के रूप में दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक अमर उजाला, फैज-ए-आम डिग्री कॉलेज, मेरठ, मानस सेवा संस्थान, सांस्कृतिक परिषद्, वरिष्ठ नागरिक मंच सहित कई संस्थाओं ने राजभाषा समर्थन समिति की इस पहल का समर्थन किया।

कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग के शोध छात्र रविन्द्र राणा एवं डॉ0 विपिन कुमार शर्मा ने किया। अतिथियों का आभार कार्यक्रम के संयोजक डॉ0 नवीन चन्द्र लोहनी ने किया। इस अवसर पर सुमनेश सुमन ने हिन्दी के समर्थन में कविता भी सुनाई। कार्यक्रम में डॉ0 रवीन्द्र कुमार, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, सीमा शर्मा, नेहा पालनी, डॉ0 आशुतोष मिश्र, अंजू, अमित कुमार, ललित सारस्वत, विवेक, सहित हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं तथा शहर के वरिष्ठ नागरिकों पत्रकारों, वकीलों, शिक्षकों तथा विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने भाग लिया।



डॉ0 गजेन्द्र सिंह/विवेक सिंह/अमित कुमार

राजभाषा समर्थन समिति



Saturday, July 3, 2010

राजभाषा समर्थन समिति

राजभाषा समर्थन समिति
(भारत में हिन्दी प्रयोग लागू कराने हेतु एकजुट लोगों की संस्था)

महोदय/महोदया,

हिन्दी विभाग द्वारा दिनांक 12-14 फरवरी 2010 को आयोजित अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ था कि ‘‘राष्ट्र मण्डल खेलों में हिन्दी प्रयोग को विज्ञापनों/होर्डिंग्स/सरकारी प्रपत्रों तथा आयोजक संस्थाओं द्वारा बढ़ावा दिया जाए।’’ यह प्रस्ताव संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य तथा सांसद श्री राजेन्द्र अग्रवाल के द्वारा प्रस्तुत किया गया था। प्रस्ताव मंचस्थ तथा सम्मुख उपस्थित सभी प्रतिभागियों द्वारा समर्थन कर पारित किया था।

हिन्दी भारत की राजभाषा है और राष्ट्र मण्डल खेल के आयोजन स्थल के आस-पास प्रमुखता से बोली जाने वाली भाषा है। ऐसे में उक्त प्रस्ताव के आलोक में आयोजकों एवं सरकारी विभागों तथा अन्य संस्थाओं के संज्ञान में यह प्रस्ताव लाया जाना है। इस हेतु दिनांक 07 जुलाई 2010 को एक बैठक सायं 05 बजे चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर स्थित बृहस्पति भवन में आहूत की जा रही है। इसमें राजभाषा को अन्तरराष्ट्रीय आयोजनों में प्रमुखता से महत्व देने संबंधी विचार-विमर्श कर संगोष्ठी के मन्तव्य को आमजन एवं सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया जाएगा। कोई भी देश हमारी भाषा का तब तक सम्मान नहीं कर सकता जब तक हम स्वयं नहीं करेंगे। आवश्यकता है कि ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के समय में हम देश के बहुसंख्यक वर्ग की भाषा हिन्दी के महत्व को आमजन तक पहुचाएँ  ।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी इसलिए देश की भाषा का प्रश्न प्रमुखता से उठाते थे, स्पष्ट है कि राष्ट्रभाषा का प्रश्न जनभावना से जुड़ा है, अतः राजभाषा के इस प्रश्न को प्रस्ताव को क्रियान्वित करने के लिए ‘राजभाषा समर्थन समिति’ का गठन किया गया है। हमारा विचार है कि:-

1. जब चीन में ओलंपिक खेलों के दौरान चीनी भाषा का प्रयोग हो सकता है तो भारत में आयोजित खेलों की नियमावली और होर्डिंग्स हिन्दी में क्यों नहीं हो सकते।

2. आयोजन में आने वाले गैर हिन्दी भाषी खिलाड़ियों और प्रतिनिधियों को अनुवादक उपलब्ध कराये जा सकते हैं। जैसा कि प्रायः हर अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में अन्य भाषा-भाषी लोग करते हैं।

3. राष्ट्रमण्डल खेलों में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम भारत की छवि को पूरी दुनिया के सामने मजबूती के साथ स्थापित कर सकते हैं।

4. यदि हम राष्ट्रमण्डल खेलों में हिंदी प्रयोग करते हैं तो अनुवादकों की आवश्यकता पड़ेगी। इससे अनुवादकों को रोजगार प्राप्ति हो सकेगी।

5. राष्ट्रमण्डल खेल हिन्दी भाषा के लिए बड़ी संभावनाओं को खोल सकते हैं, अगर हम हिंदी का इन खेलों के दौरान अधिक से अधिक प्रयोग करेंगे। विदेशी लोगों  का भी हिन्दी के प्रति आकर्षण बढेगा। इससे हिंदी के शिक्षण, पठन-पाठन की विदेशों में भी संभावनाएं बढेंगी।

6. अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति हिंदी भाषा की बेहतरी के लिए आयोग (भाषा आयोग) का गठन करेगें। जब राष्ट्रमंडल खेल भारत में हो रहे हैं, हिन्दी भाषा को संवर्धित करने के लिए संविधान में दी गई भाषा संबंधी व्यवस्था का पालन नहीं हो रहा है, ऐसे में जरुरी है जनजागृति द्वारा प्रबुद्ध नागरिक राष्ट्रमंडल खेलों में हिन्दी के प्रयोग को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करें।

7. राष्ट्रमंडल खेल में हिन्दी के प्रयोग द्वारा हम उस रुढ़ मानसिकता पर भी चोट कर सकते हैं जो अंग्रेजी के प्रयोग द्वारा निज विशिष्टता सिद्ध करती रही है, यह हिंदी के भूगोल और मानसिकता को परिवर्तित करने का अवसर भी है।

आशा है आप हमारी बातों से सहमत होंगे। कृपया अपनी सहमति को अपने अधिकतम संसाधनों के माध्यम से सरकार तक पहुँचाने के लिए प्रयास करें और हमारे प्रयास में सहयोग कर राजभाषा प्रयोग के इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सुलझाने में सहयोग करें। कृपया इस अभियान हेतु हमें अपना समर्थन पत्र भी प्रदान करें।

आपसे अनुरोध है कि इस विषय को और अधिक स्पष्ट करने तथा विचार विमर्श करने तथा देश की भाषा हिन्दी के प्रति अपना सम्मान एवं देश के प्रति अपनी सांस्कृतिक एक जुटता प्रकट करने हेतु दिनांक  07/07/2010 को सायं 05:00 बजे, बृहस्पति भवन में पधारने का कष्ट करें। आशा है इस आयोजन में आपकी सक्रिय भागीदारी एवं सहयोग प्राप्त होगा।

शुभकामनाओं सहित।



                                         (प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी)

                                              एवं समस्त साथी
                                        ‘राजभाषा समर्थन समिति’


द्वारा:- हिन्दी विभाग, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ सम्पर्क हेतु मो0 न0 : 9412207200 /9412885983 /9758917725 /9258040773 /9675899855
ई- मेल - rajbhashass.mrt@gmail.com

नोट: कृपया इस अवसर पर अपनी संस्था का बैनर भी लाएं जिसको आयोजन स्थल पर सहयोगी संस्थाओं के रूप में प्रदर्शित किया जा सके।

Friday, June 25, 2010

हिंदी विभाग में नया डिप्लोमा पाठयक्रम

आवश्यक सूचना

सभी छात्र-छात्राओं को सूचित किया जाता है कि इस वर्ष चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हिन्दी पत्रकारिता एवं जनसंचार में दो नए पाठ्यक्रम पी0 जी0 डिप्लोमा इन इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और पी0 जी0 डिप्लोमा इन प्रिन्ट मीडिया इसी वर्ष से शुरु हो रहे हैं। उपर्युक्त पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु शैक्षिक योग्यता स्नातक में 45 प्रतिशत है। प्रवेश हेतु 30 जून तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अपना पंजीकरण अवश्य करा दें।





मुख्य सूचनाएं-
प्रवेश अंतिम तिथि - 30 जून
शैक्षिक योग्यता - स्नातक 45 प्रतिशत


प्रवेश सम्बन्धी अन्य जानकारी के लिए सम्पर्क करें-
कार्यालय हिन्दी विभाग, फोन नं0-0121-2772455।
डॉ0  गजेन्द्र सिंह - 9258040773
विवेक सिंह - 9027561713

Tuesday, May 18, 2010

खड़ीबोली के मूल क्षेत्र और उसका साहित्य विषयक संगोष्ठी और मंथन पत्रिका के 'खड़ी बोली के स्थान नामों' पर केन्द्रित अंक का विमोचन

दुनियाँ में जितने बड़े-बड़े काम है वे समुदाय द्वारा नहीं बल्कि व्यक्ति द्वारा ही किए जाते हैं, जैसे युद्ध समुदाय द्वारा किया जाता है जबकि शान्ति व्यक्ति द्वारा की जाती है और शान्ति का सबसे बड़ा लक्ष्य सृजनात्मक कार्य है। ये विचार केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली के निदेशक एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर गंगा प्रसाद ‘विमल’ ने चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर ‘‘खड़ीबोली के मूल क्षेत्र और उसका साहित्य’’ विषयक विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। भाषा का सन्दर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि अन्तरिक्ष में शान्ति की कल्पना की गई है, वेदों में इस कल्पना को सबसे बड़ा रूप देने वाली भाषा है। कुरू प्रदेश ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और यहाँ बोली जाने वाली बोली ‘कौरवी’ नाम से जानी जाती है। इसे ही खड़ीबोली नाम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र से जो भाषा जन्मी वह खड़ी होकर चली, बैठकर नहीं। भारत में अगर आप कहीं भी संवाद करना चाहे, जिस शैली में करना चाहे उसी में आप इस बोली में बात कर सकते हैं। वस्तुतः इसका कारण कौरवी का विस्तार ही है, जिसे ‘लोक संपृक्ति’ के नाम से जाना जाता है अर्थात् कौरवी का लोक सम्पर्क बहुत घना है। यह भाषा कब जन्मी होगी यह शोध का विषय है क्योंकि भाषिक संरचनाओं के उदाहरण विन्यास के रूप में तथा संपृक्ति सूचक रूप में होते हैं। विमल जी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि सांस्कृतिक रूप से ‘बांगरू’ (कौरवी से मिलता हुआ रूप जो हरियाणा में बोला जाता है) की देन अद्भुत है। हिन्दी पट्टी ने सबको बांधने की चीज का अविष्कार किया है। जो साहित्य यहां का था वही उपेक्षित था। अब समय आ गया है कि तात्विक दृष्टि का परिष्कार किया जाए क्योंकि यह दृष्टि संकुचित है। कौरवी के साहित्य का पुनरावलोकन होना चाहिए। जो साहित्य इस क्षेत्र में दो शताब्दियों से लिखा गया है, उसे संरक्षित किया जाए। हिन्दी, उर्दू का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि उर्दू लिपि भी अवश्य संरक्षित की जानी चाहिए तथा साथ ही अपने क्षेत्र की ओर भी लिपियों को संरक्षित किया जाना जरूरी है। कुरू प्रदेश की दो शताब्दी पुरानी पाण्डुलिपियों की खोज होनी चाहिए जब वे प्रकाशित होंगी तो लोगों को आश्चर्यचकित कर देंगी। इन तमाम चीजों को देखने का लक्ष्य यही है कि हम अपनी दिशा निर्धारित कर सकते हैं।इस अवसर पर ‘मंथन’ पत्रिका के खड़ी बोली के स्थान नामों पर केन्द्रित अंक का विमोचन भी किया गया तथा माननीय कुलपति प्रो0 एस0के0 काक ने ‘मंथन’ पत्रिका के ब्लॉग के अन्तर्राष्ट्रीय संस्करण का उद्घाटन भी किया।कौरवी के विद्वान एवं के0डी0 कॉलेज, मवाना के पूर्व प्राध्यापक डॉ0 चन्द्रपाल सिंह ने कौरवी के उद्भव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कौरवी का विकास कब हुआ ऐसा प्रश्न है जैसे कोई पूछे कि भाषा का विकास कब हुआ। मानव का सबसे पहला आविष्कार भाषा का आविष्कार है। जहां तक कौरवी का प्रश्न है तो यह आर्य भाषाओं के अन्तर्गत आती है। इसका विकास प्राचीन रूप से ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में इस भाषा का मूल देखा जा सकता है। वैदिक काल में जो भाषा थी उसका विकास होते-होते धीरे-धीरे जो बोली सामने आई वह कौरवी थी। उन्होंने कहा कि भाषाओं का विकास नदी के जल की भांति होता रहता है। हिन्दी के उद्भव पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत, पालि, प्राकृत तथा द्वितीय प्राकृत जिसे अपभ्रंश भी कहा जाता है, से आज हमारी हिन्दी का विकास हुआ। कुछ लोग मानते हैं कि कौरवी का विकास ‘महाराष्ट्रीय’ अपभ्रंश से हुआ जबकि यह भ्रामक धारणा है। उन्होंने ‘कैकये’ अपभ्रंश से कौरवी का विकास माना। कौरवी के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि वैदिक काल से जो बोली थी वह निरन्तर बदलती जा रही है। उसे ही राहुल सांकृत्यायन ने ‘कौरवी’ कहा था। लल्लू लाल ने इसे ही ‘खरी’ बोली कहा था। जिसका इस क्षेत्र में ‘खड़ी’ बोली कर लिया गया। वस्तुतः यह कौरवी ही आज की खड़ी बोली है। इस खड़ीबोली के साहित्यिक रूप तथा लोकप्रचलित रूप दो रूप है। लोकप्रचलित रूप को सांकृत्यायन जी ने ‘कौरवी’ नाम दिया था। डॉ0 सिंह ने कहा कि भाषा और बोलियों की सीमा निर्धारित करना कठिन काम है। फिर भी सीमा निर्धारण की दृष्टि से उत्तर में देहरादून की सदर तहसील, पश्चिम में हरियाणनवी, पूर्व में बिजनौर व मुरादाबाद का पश्चिमी भाग तथा दक्षिण में स्याना से सिकंदराबाद को जो सड़क जाती है, तक के क्षेत्र तक कौरवी की सीमाएं निर्धारित की जा सकती है। मेरठ व मुजफ्फरनगर की बोली को उन्होंने मूल खड़ी बोली का क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के चारों ओर ऐसी बेल्ट है जिनमें अन्य बोलियों का भी प्रभाव है, जो ‘बफर स्टेट’ कहे जा सकते हैं। जब तक कौरवी के क्षेत्र का कोई सर्वे नहीं किया जाता तब तक ठीक ढंग से सीमा निर्धारण भी नहीं किया जा सकता।विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो0 ए0के0 श्रीवास्तव ने समारोह के अवसर पर कहा कि आज हिन्दी विभाग आठ साल का बच्चा नहीं बल्कि उसकी प्रगति से ऐसा लगता है कि अठारह साल का बच्चा है। उन्होंने हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी को हिन्दी विभाग की प्रगति उत्तम शैक्षणिक एवं शोध परिणामों के विषय में जानकर बधाई दी।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे माननीय कुलपति प्रो0 एस0के0 काक ने हिन्दी विभाग के स्थापना दिवस के अवसर पर सभी शिक्षकों, शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं को बधाई दी और कहा कि इस क्षेत्र के पहले ‘कौरवी शब्दकोष’ को इन्टरनेट से जोड़ा जाए। ताकि अन्य भाषा भाषियों को भी हिन्दी सिखाने के लिए पहल हो सके। यही भाषा का विकास होगा, क्योंकि भाषा व्यवहार से बदलती है, कई शब्द विलुप्त हो जाते है और कई नए आ जाते हैं। उन्होंने हिन्दी विभाग को बधाई देते हुए कहा कि हिन्दी विभाग सिर्फ भाषा का ज्ञान नहीं देता बल्कि हम कैसे भाषा को उपयोगी बनाए? इस बात का ज्ञान भी देता है। इस क्षेत्र की पाण्डुलिपियों, भाषा, साहित्य, बोली गत रूपों का अगर अध्ययन होगा तो हम यहां संग्रहालय भी स्थापित कर सकेंगे। जिसके लिए आर्थिक स्थिति कभी आड़े नहीं आएगी। माननीय कुलपति जी ने हिन्दी विभाग के शोधार्थी मोनू सिंह, छात्र पुष्पेन्द्र, नेत्रपाल एवं सुशील को नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया।कार्यक्रम के प्रारम्भ में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने हिन्दी विभाग की 8वीं वर्षगांठ पर सभी अतिथियों का स्वागत किया और कहा कि जो चीजें लगातार विभाग में होती रही है, उस प्रगति को जानने का यह अवसर है। अल्प समय में ही हिन्दी विभाग ने जो कार्य किए है उनका श्रेय विश्वविद्यालय प्रशासन को जाता है। विभाग के छात्र-छात्राओं ने जो शोध कार्य किए उन्हें मीडिया द्वारा भी प्रचारित किया गया, बाहर से भी अच्छे कार्यों के लिए प्रशस्ति मिली है। इसके लिए हम सभी के आभारी है।कार्यक्रम का संचालन विपिन कुमार शर्मा ने किया। इस अवसर पर प्रो0 जे0के0 पुण्डीर, डॉ0 नंद कुमार, डॉ0 जे0पी0 यादव, डॉ0 मीना शर्मा, गजलकार किशनस्वरूप, ईश्वर चन्द्र ‘गम्भीर’, ज्वाला प्रसाद कौशिक ‘साधक’, डॉ0 अशोक कुमार मिश्र, महेश पालीवाल, डॉ0 रवीन्द्र कुमार, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, नेहा पालनी, विवेक सिंह, अंजू, मोनू सिंह, राजेश चौहान, अमित, ललित, अजय, संजय कुमार, अंचल, मधु, रेखा, ममता, नीलू धामा, चरन सिंह, आदि विभाग के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

Saturday, April 17, 2010

भाषा विज्ञान और ध्वनि संरचना

भाषा वैज्ञानिक सैद्धान्तिक रूप में भाषा की लघुतम इकाई ‘ध्वनि’ है किन्तु प्रथम सहज ध्वनि ‘वाक्य’ है। ये विचार आज महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक के हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात भाषा विज्ञानी प्रो0 नरेश मिश्र ने आज का विषय- ‘‘भाषा विज्ञान और ध्वनि संरचना ’’ के अन्तर्गत व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ध्वनि संवहन प्रक्रिया में बच्चा प्रारम्भ में जब ध्वनि मुख से निसृत करता है तो उसके पीछे एक सम्पूर्ण सारगर्भित वाक्य छिपा होता है। आगे चलकर प्रत्येक ध्वनि बच्चा समाज में रहकर व्यवहार द्वारा सीखता है।प्रो0 मिश्र ने ध्वनि उत्पादन प्रक्रिया की प्रेरक शक्तियों में मनुष्य की चेतना अर्थात् भाषाई चेतना का होना आवश्यक बताते हुए कहा कि जिस समाज में हम रहते हैं, उस समाज की चेतना होना भी आवश्यक है साथ ही बौद्धिक क्षमता तथा मन भी प्रेरक शक्तियाँ हैं। इन तीनों का समन्वय होना आवश्यक हैं। जिस प्रकार अध्ययन की गति के लिए छात्र तथा अध्यापक में समन्वय होना जरूरी है उसी प्रकार चेतना, बुद्धि तथा मन में भी समन्वय होना जरूरी है।भाषा चूंकि संश्लिष्टावस्था से विश्लिष्टावस्था की ओर जाती है। इसलिए उसमें परिपक्वता आवश्यक है। ध्वनि उत्पादन प्रक्रिया में वाग्अवयव स्वर यंत्र आवरण, कंठ पिटक, मूर्द्धा, वर्त्स्य, अलिजिह्वा, ओष्ठ तथा नासिका का उन्होंने विस्तार से परिचय दिया।ध्वनि उत्पादन प्रक्रिया प्रयोगात्मक रूप से समझाते हुए प्रो0 मिश्र ने स्थान तथा प्रयत्न के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण प्रस्तुत करते हुए जिह्वा, हवा के नाक और मुंह के रास्ते निकलने के आधार, ओष्ठों की स्थिति, जिह्ना के उठने के आधार, प्रकृति के आधार, प्राणत्व महाप्राण तथा अल्पप्राण, संवृत्त-विवृत्त, घोषत्व-अघोषत्व, संघर्षी-स्पर्श संघर्षी, तालव्य, उत्क्षिप्त, लुंठित, दन्त्योष्ठय आदि भागों में विभक्त कर भाषा विज्ञान जैसे विषय को सरस, हृदयग्राही एवं मनोग्राही रूप में प्रस्तुत किया। प्रो0 मिश्र ने डायग्राम बनाकर वाग्अवयव के कार्यो पर प्रकाश डालते हुए स्थान तथा प्रयत्न के आधार पर ’क‘.वर्ग, ‘च‘ वर्ग, ‘ट’ वर्ग, ‘प‘ वर्ग की स्वर तथा व्यंजन ध्वनियों के विषय में बताते हुए कहा कि हिन्दी व्यंजनों के पहला और तीसरा अल्पप्राण तथा दूसरा और चौथा अक्षर महाप्राण होता है।उन्होंने छात्र-छात्राओं के भाषा विज्ञान सम्बन्धी प्रश्नों में ‘क्लिक‘ ध्वनि और ‘खंड्येतर‘ ध्वनि, क्या भाषा वैज्ञानिक स्थिति को जानने समझने के लिए ‘मन‘ जैसी प्रेरक शक्ति की आवश्यकता है अथवा नहीं ? आदि के संतोषपरक उत्तर दिए। साथ ही मुख के भीतर के अवयवों द्वारा उच्चारणगत स्थिति को भी स्वयं बोलकर समझाया। कार्यक्रम के अन्त में प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी, विभागाध्यक्ष हिन्दी, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने प्रो0 नरेश मिश्र का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ0 रवीन्द्र कुमार, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, कु0 सीमा शर्मा, नेहा पालनी, विवेक सिंह, कु0 अंजू, दीपा और एम0ए तथा एम0फिल््0 के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

Friday, April 16, 2010

हिन्दी वर्तनी का मानक प्रयोग

वर्तनी की समस्या प्रायः किसी न किसी रूप में प्रत्येक भाषा में होती है। हिन्दी वर्तनी की समस्या का पहला पक्ष अनेकरूपता है तथा किसी भी भाषा के मानक रूप की दृष्टि से यह जरूरी है कि उसके अधिकांश शब्दों और रूपों की सुनिश्चित वर्तनी हो और उसके ही मानक या शुद्ध माना जाए। हिन्दी में इस दृष्टि से अनेक तरह की अनेकरूपताएं है तथा जब तक इन में एकरूपता की कोशिश नहीं की जाएगी, वर्तनी के स्तर पर एकरूपता नहीं आ सकती। ये विचार लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक प्रशिक्षण एकेडमी; मसूरी में आचार्य प्रो0 गीता शर्मा ने हिन्दी विभाग, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में व्याख्यान श्रृंखला में दूसरे दिन आज का विषयः ‘हिन्दी वर्तनी का मानक प्रयोग’ में व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए।प्रो0 गीता शर्मा ने कहा कि अशुद्धियाँ जो हिन्दी लेखन में विभिन्न क्षेत्रों में सामान्यतः मिलती है। इनमें शुद्ध वर्तनी क्या है, इसका विवाद नहीं है। बल्कि समस्या यह है कि वर्तनी के निश्चित होने के बावजूद अनेक लोग अनेक कारणों में तरह-तरह की अशुद्धियाँ कर देते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी वर्तनी की एकरूपता स्थिर करने के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, आगरा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, नई दिल्ली, तकनीकी वैज्ञानिक शब्दावली आयोग तथा केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरों ने सराहनीय पहल की है। इनके द्वारा अहिन्दी भाषी राज्यों के शिक्षकों को हिन्दी सिखाना, मानक हिन्दी रूप का विकास तथा तकनीकी शब्दों के निर्माण एवं विकास का कार्य किया जा रहा है। राष्ट्रीय भाषा संस्थान, हैदराबाद तथा अनुवाद ब्यूरों अनुवाद के माध्यम से हिन्दी भाषा एवं साहित्य का अनुवाद अन्य भाषाओं तथा अन्य भाषाओं का हिन्दी में कर रहे हैं। जिससे भाषा विज्ञान भी समर्थ तथा सम्पन्न बना है।हिन्दी वर्णमाला की अल्पप्राण ध्वनियों एवं महाप्राण ध्वनियों के विषय में उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषा सार्थक ध्वनियों का समूह है और समाज में रहने वाले व्यक्तियों के विचार विनिमय का प्रमुख आधार है। हिन्दी अत्यंत सरल भाषा है क्योंकि इसमें जैसा बोला जाता है, वही लिखा जाता है और संसार की अन्य भाषाओं की अपेक्षा वह अत्यधिक सुव्यवस्थित है किन्तु असावधानी एवं अज्ञानतावश प्रायः बड़े-बड़े अनुभवी अध्यापक भी इसके लिखने में भूल कर देते हैं। शिक्षित होने पर भी कुछ लोग प्रायः अशुद्ध लिखते और बोलते हैं। अतः वर्तनी की अशुद्धियों को दूर करने के प्रयास किए जाने चाहिए।प्रो0 गीता शर्मा ने प्रयोगात्मक रूप से समझाते हुए स्वर तथा मात्रा सम्बन्धी, संयुक्त व्यंजन संबंधी, सन्धि संबंधी, हलन्त् सम्बन्धी, शिरोरेखा सम्बन्धी, समास संबंधी, व्यंजनद्वित्व संबंधी, तथा व्यंजन संबंधी अशुद्धियाँ तथा उनके शुद्ध करने के नियमों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि शिक्षित-अशिक्षित के बीच अन्तर यही है कि वह भाषा का ठीक उच्चारण करे तथा वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ न करें, तभी शिक्षा व ज्ञान की सार्थकता है।वर्तनी के सन्दर्भ में उन्होंने हिन्दी भाषा में कारक चिन्ह, योजक चिन्ह, परसर्ग, उपसर्ग, प्रत्यय तथा समास आदि की महत्ता तथा सार्थकता पर भी विचार रखें। प्रो0 शर्मा ने कहा कि सन्धि शब्द रचना के नियमों की जानकारी न होना, परंपरागत वर्तनी के ज्ञान का अभाव, शुद्ध उच्चारण के ज्ञान का अभाव, सर्व स्वीकृत रूप की कमी, अंग्रेजी वर्तनी का प्रभाव आदि कुछ समस्याएं हैं। जिनका निदान कर हिन्दी वर्तनी का मानक रूप स्थिर किया जा सकता है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने पंचम नासिक्य व्यंजन और अनुस्वार के प्रयोग को भी प्रयोगात्मक दृष्टि से विश्लेषित किया।कार्यक्रम के अन्त में डॉ. गजेन्द्र सिंह ने प्रो0 गीता का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी, डॉ0 रवीन्द्र कुमार, कु0 सीमा शर्मा, नेहा पालनी, विवेक सिंह, कु0 अंजू और एम0ए तथा एम0फिल््0 के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

‘हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ शिक्षण अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर

भाषा, समाज और संस्कृति एक-दूसरे की पूरक है। यह एक व्यवस्था है जो समाज और संस्कृति का समर्थन करती है। आज दिनांक १५-०४-२०१० को विषयः ‘हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ शिक्षण अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर’ बोलते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए यह बात आज प्रो0 गीता शर्मा, लालबहादुर शास्त्री प्रशासनिक प्रशिक्षण एकेडमी, मसूरी ने चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्यान देते हुए कही।प्रो0 शर्मा ने कहा कि एक समय था जब यूरोप में समाजवाद, साम्यवाद, शासन व्यवस्था थी और वहाँ बोलने की स्वतन्त्रता नहीं थी, लेकिन वहाँ पढ़ाई पर बल दिया जाता था और अनुवाद के माध्यम से विभिन्न देशों की संस्कृति के बारे में शिक्षार्थी जानकारी प्राप्त करते थे। उन्होंने बताया कि विदेशों में शिक्षा व्यवस्था वहाँ के पढ़ने वाले शिक्षार्थियों की मांग पर लागू होती है। प्रो0 गीता ने कहा कि विदेश में पढ़ने वाले बच्चे घुमक्कड़ प्रवृति के होने के कारण विभिन्न देशों की यात्रा करते है और वहाँ की भाषा और संस्कृति से सीधे जुड़ने का प्रयास करते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ है यह पृथ्वी एक परिवार है और संस्कृति का मूल मंत्र है इस पृथ्वी का हर आदमी हमारा परिवार है। आज भी भारत में आत्महत्या और मानसिक रोगी अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। इसका मुख्य कारण है हमारे यहां के साहित्य का आशावादी और सकारात्मक दृष्टिकोण।उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि बहुत कम लोग इस बात से परिचित होंगे कि ये हमारी संस्कृति कितने गहरे रूप से हमसे जुड़ी है। धर्म का आशय बताते हुए उन्होंने कहा कि धर्म वह नहीं है जिसकी हम पूजा करते है, धर्म वह होता है जो हमारे कर्म और कर्त्तव्य से जुड़ा होता है। धर्म के सन्दर्भ में रांगेय राघव की कविता ‘द्रौपदी’ के माध्यम से उन्होंने धर्म की स्थिति को स्पष्ट किया। प्रो0 गीता ने भाषा समाज और संस्कृति को एक दूसरे का पूरक बताते हुए कहा कि जो चीजें हमारे समाज और संस्कृति में है वह सभी भाषा में प्रयुक्त होती हैं। भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष और दृष्टिकोण हमें अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। हमारी संस्कृति सकारात्मक 101 वृद्धि तथा 99 ऋणात्मकता का प्रतीक है। हिन्दी विदेशी शब्दावली के प्रयोग के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि विदेश में ‘थैंक्यू’, ‘सॉरी’ और ‘एक्सक्यूज मी’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम बोलचाल में किया जाता है। भारतीय समाज में जितना मोह विदेशी भाषाओं के प्रति है उतना अन्य किसी देश में नहीं है। साम्यवादी देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इन देशों में बोलने से ज्यादा पढ़ने पर जोर दिया जाता है।इस अवसर पर उन्होंने बताया कि अंग्रेजी के प्रति जितनी मोहमाया भारत में है उतनी मोहमाया अन्य किसी देश में नहीं है। आज यदि विश्व के 150 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है तो यह उनकी अपनी शिक्षा व्यवस्था है। कई बार यह शिक्षा व्यवस्था मांग के आधार पर और राजनयिक स्तर पर विभिन्न भाषाओं को सीखने के उद्देश्य से लागू की जाती है। वक्तव्य के अन्त में प्रो0 गीता ने छात्र-छात्राओं के प्रश्नों के उत्तर में कहा कि हिन्दी भविष्य में उत्तरोत्तर बढ़ेगी। इसका कारण है कि भारत की संस्कृति, भाषा और समाज परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए हैं।कार्यक्रम के अन्त में डॉ रवीन्द्र कुमार ने प्रो0 गीता का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी, कु0 सीमा शर्मा, नेहा पालनी, विवेक सिंह, कु0 अंजू, कु0 अंचल, सुमन, दीपा और एम0ए तथा एम0फिल््0 के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

Monday, April 12, 2010

हिंदी विभाग की नई उपलब्धियां :मोनू सिंह, पुष्पेन्द्र और नेत्रपाल

हिन्दी विभाग हिंदी परिषद् चौ 0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठप्रेस विज्ञप्ति दिनांक 12।04।२०१०
चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय,मेरठ के हिन्दी विभाग में छात्रों ने अपने अभूतपूर्व उपलब्धियों को निरन्तर जारी रखा है। 27 दिसम्बर, 2009 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा ली गई नेट एवं जे0आर0एफ0 परीक्षा में विभाग के तीन विद्यार्थी सफल हुए है इनमें दो छात्रों को जे0आर0एफ0 एवं एक को नेट में उत्तीर्ण घोषित किया गया है।हिन्दी विभाग में आज इन उपलब्धियों के लिए छात्रों को प्रोत्साहन देने हेतु सम्मानित किया गया। हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुए कार्यक्रम में प्रो0 लोहनी ने जे0आर0एफ0 उत्तीर्ण एम0फिल0 के छात्र नेत्रपाल सिंह एवं पुष्पेन्द्र कुमार तथा नेट उत्तीर्ण पीएच0डी0 शोधार्थी मोनू सिंह को बधाई दी तथा विभाग के अन्य छात्र-छात्राओं से इसी प्रकार श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए कहा। प्रो0 लोहनी ने कहा कि आठ वर्षों में विभाग के छात्र-छात्राओ ने प्रतिवर्ष अपनी उपलब्धियाँ निरन्तर जारी रखी है उनमें शैक्षणिक और अकादमिक उपलब्धियों में आए सुधार के लिए विद्यार्थियों की मेहनत तथा शिक्षकों का योगदान है। प्रो0 लोहनी ने विभाग के छात्र-छात्राओं के वर्षभर विभाग द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रमों में सहयोग की भी सराहना की और कहा कि इस वर्ष के अच्छे शोध कार्यों पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन भी किया जाएगा। प्रो0 लोहनी ने यह भी घोषणा की कि इन छात्र-छात्राओं को स्थापना दिवस के अवसर पर 14 मई २०१० को माननीय कुलपति जी द्वारा भी सम्मानित कराया जाएगा। इस अवसर पर विभाग के शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं ने उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं को बधाई दी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में जून तथा दिसम्बर की परीक्षा में मिलाकर अब तक कुल छः छात्र-छात्राओं ने नेट की परीक्षा उत्तीर्ण की जिनमें दो जे0आर0एफ0 भी है।पूर्व के वर्षों में भी हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं ने निरन्तर नेट परीक्षाओं में बेहतर परिणाम प्रदर्शित किया है। इनमें सीमा शर्मा, राजेश कुमार, सुनील कुमार, रमेश कुमार, सुमन रानी, रूबी देवी, कमल लता, अलका, पुष्पेन्द्र तथा सुशील शामिल है। विश्वविद्यालय परिसर में हिन्दी विभाग वर्ष 2002 में प्रारम्भ हुआ और विभाग का पहला एम0फिल0 सत्र 2005 में सम्पन्न हुआ। तब से निरन्तर प्रतिवर्ष नेट उत्तीर्ण छात्र-छात्राओं की संख्या विभाग में बढ़ती गई है। इसी प्रकार हिन्दी शोध से जुड़े हुए अनेक विद्यार्थी कई शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन कार्य कर रहे है जबकि अनेक छात्र-छात्राएँ व्यवसायिक हिन्दी, पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम उत्तीर्ण होने के बाद कई टेलीविजन चैनलों समाचार-पत्रों में कार्यरत हैं।विभाग के हिन्दी परिषद द्वारा आयोजित आज के कार्यक्रम में परिषद ने अपनी ओर से सभी छात्र-छात्राओं को बधाई दी। हिन्दी परिषद के अध्यक्ष संजय कुमार, सचिव अजय कुमार सहित सभी पदाधिकारियों ने भी भविष्य में विशेष उपलब्धियों वाले छात्र-छात्राओं को सम्मानित करने की घोषणा की। कार्यक्रम का संचालन अजय कुमार ने किया। इस अवसर पर विभाग के रवीन्द्र कुमार, सीमा शर्मा, नेहा पालनी, विवेक सिंह, अंजु, ममता, रेखा, संजय, राजेश ढांडा, राहुल कुमार, राजेश चौहान, अमित कुमार, नीलू धामा सहित शिक्षक एवं अन्य छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

Thursday, April 8, 2010

हिंदी देश का हाईवे है।

हिन्दी इस देश का हाईवे है जो पूरे देश को एक दूसरे से जोड़ने का कार्य करता है।यह बात आज गुरू नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं ख्यात आलोचक प्रो0 हरमहेन्द्र सिंह बेदी ने चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्यान देते हुए कही।उन्होंने कहा कि हिन्दी केवल भाषा नहीं है, बल्कि हिन्दी का अर्थ है, भारत, भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन। प्रो0 हरमहेन्द्र सिंह बेदी ने हिन्दी के अन्तरराष्ट्रीय सरोकार के सन्दर्भ में बताते हुए कहा कि दुनियाँ का हर तीसरा व्यक्ति हिन्दी भाषी है। यूएनओ के महासचिव ने न्यूयॉर्क में विश्व हिन्दी सम्मेलन के सन्दर्भ में कहा था कि हिन्दी प्राचीनतम लिखित भाषाओं में से एक है। हिन्दी सरल और संवाद की भाषा बनने के योग्य है और हिन्दी भाषा में वह भी क्षमताएं है। जिससे कोई भी भाषा भविष्य की भाषा बन सकती है। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा का उदाहरण देखते हुए उन्होंने कहा कि ओबामा ने हाल में अपने वक्तव्य में कहा कि मैं हिन्दी सीखना चाहता हूँ। उन्होंने बताया कि अमेरिका में 114 संस्थाओं में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन का कार्य हो रहा है और दुनियाँ के प्रत्येक देश में ‘एशियन स्टडीज’ के अन्तर्गत हिन्दी के संस्थान है। प्रो0 बेदी ने कहा कि आने वाले कुछ वर्षों में सार्क देशों की बैठकों की कार्यवाही की भाषा भी हिन्दी ही होगी। विदेशों में 120 से अधिक समाचार पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी में प्रकाशित हो रही है। अब हिन्दी की वैश्विक पहुंच को देखते हुए न्छव् ने अकेले प्रेमचन्द के ‘गोदान’ का 300 भाषाओं में अनुवाद कराया है। प्रो0 बेदी ने हिन्दी के राष्ट्रीय सरोकारों के सन्दर्भ में कहा कि भारतीय साहित्य वह सब है जो 24 भारतीय भाषाओं में लिखा जाए और हिन्दी का विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक अन्य भारतीय भाषाओं का विकास नहीं होगा। उन्होंने बताया आज लगभग हजारों समाचार पत्र-पत्रिकाएं निकल रहे हैं।हिन्दी के अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी बहुत तेजी से बढ़ी है। अकेले कनाडा से ही 7 अखबार हिन्दी में निकलते हैं, जिनमें लगभग 80 पृष्ठ होते हैं। हिन्दी भारत ही नहीं वरन् विश्व की संपर्क भाषा है। हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीयता के सन्दर्भ में उन्होंने आगे कहा कि विश्व के 60 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी जानते, बोलते, पढ़ते और समझते हैं। हिन्दी का अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भ तुलनात्मक साहित्य को भी जन्म दे रहा है। इस प्रकार भारतीय भाषाओं को जोड़ने का काम हिन्दी कर रही है।इस अवसर पर उन्होंने पंजाब के लेखकों का हिन्दी साहित्य के विकास में योगदान भी रेखांकित किया। प्रो0 बेदी ने कहा कि हिन्दी के आदिकाल से लेकर अब तक के सैकड़ों लेखक हिन्दी में हुए है जिनमें चंदबरदाई, गुरू गोविन्द सिंह, अज्ञेय, भीष्म साहनी, मोहन राकेश सहित सैकड़ों रचनाकार है। जिनको हिन्दी दुनियाँ प्रमुख लेखकों के रूप में जानती है। उन्होंने बताया गुरू ग्रन्थ साहिब में हिन्दी कवियों का उल्लेख है। छात्र-छात्राओं के प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा कि हिन्दी भविष्य में उत्तरोत्तर बढ़ेगी। इसका कारण है कि आज हिन्दी मण्डी की भाषा बन चुकी है और जो भी भाषा बाजार में कब्जा कर लेती है उसका भविष्य उज्ज्वल होता है।हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने प्रो0 बेदी का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर कु0 सीमा शर्मा, डॉ0 गजेन्द्र सिंह, नेहा पालनी, डॉ0 रवीन्द्र कुमार, विवेक सिंह तथा एम0ए तथा एम0फिल0 के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

Monday, March 8, 2010

हिंदी मंथन विकास पथ पर

मित्रों,
आप सभी का हिंदी मंथन और संगोष्ठी में सहयोग के लिए धन्यवाद । आशा है आप सभी हमें इसी तरह अपने सुझावों और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सहयोग करते रहेंगे ! इसी तरह से हिंदी विभाग और मंथन पत्रिका से जुड़े रहें । अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार सम्बन्धी विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंकों का भी प्रयोग कर सकते हैं । ........... (साभार सहित )
http://hindi-khabar.hindyugm.com/2010/02/globlization-and-hindi-3-days-seminar.html
http://hindibharat.blogspot.com/2010/02/blog-post.html
http://yomatra.blogspot.com/

आप सभी का मंथन विचार पत्रिका के इन्टरनेट संस्करण में स्वागत है..

"कैमरे के फ़ोकस में - मंथन पत्रिका और विभागीय गतिविधियाँ " को ब्लॉग के बायीं ओर लिंक सूची में देखें .......