जरुरी सूचना

आप सभी का मंथन पत्रिका के इन्टरनेट संस्करण पर स्वागत है ।

Free Website Templates

Saturday, September 3, 2022

दिनांक: 01-02 सितम्बर 2022, राष्ट्रीय संगोष्ठी - विज्ञान, समाज विज्ञान और मीडिया में हिंदी


 हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ 

राष्ट्रीय संगोष्ठी - विज्ञान, समाज विज्ञान और मीडिया में हिंदी

दिनांक: 01सितम्बर 2022











हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ एवं उ॰प्र॰ भाषा सस्थान, लखनऊ द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘विज्ञान, समाज विज्ञान और मीडिया में हिंदी का आयोजन हिंदी विभाग में किया गया है। दिनांक 01/09/2022 को संगोष्ठी के प्रथम दिन उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो॰ वाई विमला, वरिष्ठ आचार्य, वनस्पति विज्ञान विभाग ने की। मुख्य अतिथि डॉ॰ राजनारायण शुक्ल, कार्यकारी अध्यक्ष, उ॰प्र॰ भाषा संस्थान, लखनऊ रहें। बीज वक्ता प्रो॰ जितेन्द्र श्रीवास्तव, आचार्य हिंदी विभाग, इग्नू तथा विशिष्ट अतिथि श्री अजय सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, प्रेस सचिव मा॰ राष्ट्रपति, भारत सरकार एवं श्री भूपेन्द्र कुमार, अध्यक्ष भारती भाषा संवर्द्धन संस्थान, संयुक्त अरब अमीरात रहें। विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने अतिथियों का परिचय एवं स्वागत किया। 

उद्घाटन सत्र की अध्यक्ष प्रो॰ वाई विमला ने कहा कि हिंदी भाषा को साहित्य में केवल या तक सीमित रखा है। हिंदी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए साहित्य महत्वपूर्ण माध्यम है। किसी भाषा को थोपा नहीं जा सकता बल्कि प्रचार-प्रसार के माध्यम से ही जन सामान्य तक पहुँचाया जा सकता है। किसी साहित्य एवं भाषा के मर्म को समझे तभी वह जनमानस की भाषा बनेगी। भाषा में उचित एवं मर्यादित शब्दों का प्रयोग हो तभी वह सशक्त एवं सफल होगी। जब हिंदी सामान्य जन की भाषा बनेगी वह वह नहीं पिछड़ेगी। हमने अनेक विदेशी शब्द अपनी भाषा में जोड़ लिये कोई भी शब्द क्लिष्ट नहीं है। भाषा के इस पखवाडे में अपनी भाषा के लिए एक अच्छा कार्य करेंगे तभी वास्तविक भाषा की वृद्धि होगी। 

मुख्य अतिथि प्रो॰ राजनारायण शुक्ल ने कहा कि हिंदी दिवस केवल हिंदी विभाग में ही क्यों मनाया जायेगा। न्याय की भाषा हिंदी व मातृभाषा में न होना विडम्बना है। हिंदी प्रारम्भ से ही दुष्चक्रों में फंसी रही है। 1857 से अंग्रेजी दमन चक्र के कारण हिंदी पत्रकारिता और साहित्य भी डरा रहा परन्तु बाद में स्वाधीनता आंदोलन हिंदी में ही चला। स्वास्थ्य के क्षेत्र की भाषा भी अंग्रेजी ही है, आधुनिक शल्य विज्ञान हिंदी में ऐलोपैथिक की पुस्तक है। जिसका अनुवाद पहली बार उ॰प्र॰ भाषा संस्थान लखनऊ के द्वारा किया गया है। यह कार्य अपने आप में अनूठा है। हिंदी के कवि को दक्षिण भारत के कवियों का भी उल्लेख करना चाहिए। जबकि केवल विदेशी कवियों का उल्लेख कर दिया गया जाता है। संस्कृत के बाद तमिल भी महान भाषा है। हिंदी पूरे देश की संपर्क भाष है। अतः वह राष्ट्र भाषा बन सकती है। हम तमिल, तेलुगु पढ़ना नहीं चाहते, यह गलत है। हमें अपने देश की अन्य भाषाओं को भी पढ़ना चाहिए। इससे राष्ट्रीय एकता बनेगी। मॉरीशस में हिंदी की स्थिति कमजोर होती जा रही है। मॉरीशस में नई भाषा क्रियोल बढ़ रही है। भारत में कुछ शब्दों को हिंदी रूप में प्रयोग नहीं किया जा रहा है। जैसे डिपो शब्द ‘आगार’ न प्रयोग कर के डिपो ही प्रयोग किया जा रहा है। 

बीज वक्ता प्रो॰ जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि जब तक हिंदी ज्ञान विज्ञान की भाषा नहीं बनेगी तब तक वह वैश्विक भाषा नहीं बन पायेगी। आजादी की लड़ाई की भाषा हिंदी को मानने वाले अहिंदी भाषी लोग थे। मीडिया में अंग्रेजी की आवश्यकता है। हम अंग्रेजी के अभिजात्य वर्ग के गुलाम नहीं है। इस गुलामी की मानसिकता से बाहर आये। हमारे पास मनोबल की कमी है। कबीर, तुलसी नेे अपनी रचनाएं लोक भाषाओं में रची हैं। ग्रामीण बच्चों में मेधा की कमी नहीं है परन्तु वे भाषाई दुष्चक्र में फंस जाते हैं। इस भाषाई दुष्चक्र को तोड़ना होगा। हिंदी स्वाधीन चेतना की भाषा है। किसी भाषा की सम्पन्नता साहित्य से नहीं होती यह विज्ञान, समाज विज्ञान के क्षेत्र में सम्पन्नता से तय होगी। स्वयंप्रभा चैनल द्वारा मातृभाषा को बढ़ावा दिया जा रहा है। 

विशिष्ट अतिथि श्री भूपेन्द्र कुमार ने कहा कि वह स्वयं को भाषा का स्वयंसेवी मानते हैं, कवि या लेखक नहीं। आज 75 वर्ष बाद भी हिंदी पर चर्चा करना दुःखद है। उच्च शिक्षा में अंग्रेजी में क्यों पढ़ना पढ़ रहा है। हम भारती भाषा संवर्द्धन के अन्तर्गत चर्तुभाषा व्यवस्था में वृद्धि करने का प्रयत्न कर रहे हैं। दक्षिण भारत में हिंदी हटाई जा रही है। जिससे बेरोजगारी फैल रही है। दुःखद है कि बी॰ए॰ एम॰एस॰ (आयुर्वेदाचार्य) में संस्कृत के ग्रंथ नहीं पढ़ाये जा रहे अपितु अंग्रेजी की मूल पुस्तकों से हिंदी में अनुवादित किये गये गं्रथ पढाएं जा रहे हैं। अनुवाद की समस्या महत्वपूर्ण है। हिंदी के क्लिष्ट शब्दों के माध्यम से हिंदी का मजाक बनाया जाता है। 

विशिष्ट अतिथि श्री अजय सिंह ने कहा कि अंग्रेजी का प्रभाव जनमानस पर देखने को मिलता है। किसी अन्य भाषा में सीखना अवास्तविक है। अभिजात्य के फेर में फंसकर हम भावों की गहराई नहीं समझ सकते हैं। अंग्रेजी में जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इण्डिया का उदाहरण देते हुए बताया कि अंग्रेजी में मूल भावों का लेखन नहीं होता। शरद जोशी के व्यंग्य जो हिंदी में हैं वे अद्भुत हैं। जापान और चीन में भी अपनी भाषा को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। जबकि भारत में एक समस्या है कि अपनी भाषा पर विचार कम हो रहा है। 

संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने उद्घाटन सत्र के प्रारम्भ में सभी अतिथियों का परिचय कराया एवं पुष्प भेंट कर स्वागत किया। उद्घाटन सत्र के अंत में सभी अतिथियों को प्रो॰ लोहनी ने स्मृति चिह्न भंेट किये।

संगोष्ठी सचिव डॉ॰ अंजू ने सत्र के समापन पर सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ॰ ललिता यादव, सह आचार्य, हिंदी विभाग, एन॰ए॰एस॰ कॉलिज, मेरठ ने किया।  

संगोष्ठी के प्रथम सत्र ‘विज्ञान में हिंदी’ की अध्यक्षता प्रो॰ मृदुल कुमार गुप्ता, संकायाध्यक्ष विज्ञान ने की। सत्र के विशिष्ट वक्ता श्री सुभाष चन्दर, हिंदी परामर्शदाता, टाईफैक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, श्री आशीष कंधवे, संपादक, गगनांचल, आई॰सी॰सी॰आर॰, नई दिल्ली, डॉ॰ मनीष  मोहन गौर, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सी॰एस॰आई॰आर॰, निस्पर, नई दिल्ली तथा श्री पंकज कुमार शुक्ला, वैज्ञानिक, सी॰डी॰आर॰आई॰, लखनऊ रहें।

सत्र अध्यक्ष प्रो॰ मृदुल कुमार गुप्ता ने कहा कि मातृ भाषा अपने चिंतन को दूसरों तक स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। हिंदी भी वैश्विक भाषा है। विज्ञान की शब्दावली लैटिन व ग्रीक से ली गई है। विज्ञान की शब्दावली हिंदी से अर्थ के स्तर पर भिन्न है। विज्ञान की पुस्तकों को हिंदी में लिखे जाने के लिए सरकार प्रोत्साहित कर रही है। 

विशिष्ट वक्ता डॉ॰ पंकज कुमार शुक्ल ने कहा कि हम विदेशी भाषा में काम करते हैं इसलिए विकसित नहीं विकासशील हैं। हमें जिस समय सिद्धांत को सीखना होता है तब वहाँ हम भाषा को सीखने में अपनी ऊर्जा लगाते हैं। मीडिया विज्ञान की दुनिया (जगत) को भी सनसनीखेज बनाता है। विज्ञान को लोक भाषा में भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। विज्ञान की शब्दावली कविता में आकर प्रभावी बन जाती है। विज्ञान के प्रतीकों को साहित्य में लाया जाना चाहिए। वे ‘भावनाएं हैं यूरेनियम की तरह विस्फोट हो जायेगा’ कविता की पंक्तियों के माध्यम से विज्ञान और साहित्य को जोड़ते हैं। 

विशिष्ट वक्ता मोहन गौर ने कहा कि विज्ञान पत्रिका पिछले 70 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है। 80 प्रमुख आलेखों को संकलन विज्ञान पत्रिका का विशेष संस्करण प्रकाशित होगा। इसमें विज्ञान से जुड़ी कविताएं, विज्ञान गल्प प्रकाशित होगा। 26 सितम्बर को इस संस्करण को विमोचित किया जाएगा। सी॰एस॰आई॰आर॰ की स्थापना 26 सितम्बर 1942 में हुई थी। पालनपुर प्रयोगशाला (हि॰प्र॰) में है। जहाँ ईरान से बीज लेकर वहाँ हींग की खेती की जाने लगी है। सी॰एस॰आई॰आर॰-एन॰आई॰एस॰सी॰पी॰आर॰ पत्रिकाएं हिंदी में तथा विज्ञान की दुनिया पत्रिका उर्दू में प्रकाशित होती है। सारांशतः यह कहा जा सकता है कि आज मानव समाज विज्ञान और तकनीकी का ऋणी है। 

विशिष्ट वक्ता आशीष कंधवे ने भृगु संहिता के श्लोक का उदाहरण देते हुए विज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक पक्ष को बताया। भाषा अभ्यास से ही सिद्ध होती है, विज्ञान से पहले ज्ञान, ज्ञान से पहले शिक्षा तथा शिक्षा से पहले शिक्षक को समझना होगा। ये सभी एक दूसरे के पूरक हैं। शिक्षक, शिक्षा, ज्ञान एवं विज्ञान की परिभाषा को उन्होंने समझाया। ज्ञान-विज्ञान का कोश सनातन है। दोनों के सामांजस्य से ही कल्याण होगा। आशा करते हैं कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति शैक्षिक जगत में बड़ा परिवर्तन लाने में सहायक सिद्ध होगी। 

विशिष्ट वक्ता श्री सुभाष चन्दर ने कहा कि वैज्ञानिक लेखों की भाषा सहज, सरल व संप्रेषणीय होनी चाहिए। वैज्ञानिक लेखन व वैज्ञानिक अनुवाद तभी सफल सिद्ध होंगे जब विज्ञान पर स्वकेन्द्रित होंगे। लेखों की भाषा में सुधार करें क्योंकि विज्ञान के लेखों की भाषा कठिन है, इसे सरल करना होगा। जब विज्ञान लेखन हिंदी में होगा तभी वह जनसामान्य तक पहुंचेगा, जिससे वैज्ञानिक क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं विकसित होंगी।

सत्र के प्रारम्म में अतिथियों का परिचय एवं स्वागत प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी, संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग ने किया। प्रो॰ मृदुल कुमार गुप्ता संकायाध्यक्ष विज्ञान ने अतिथियों को स्मृति चिह्न प्रदान किए। प्रो॰ लोहनी ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन भी किया।

प्रथम सत्र का संचालन डॉ॰ आरती राणा, हिंदी विभाग ने किया। 

प्रथम दिन द्वितीय सत्र ‘शोध पत्रों की प्रस्तुति’ की अध्यक्षता प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी, संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग ने की। प्रो॰ दिनेश कुमार, आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग एवं प्रो॰ विकास शर्मा, अध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग की उपस्थिति में शोध पत्रों की प्रस्तुति संपन्न हुई। 

सत्र में प्रीति देवी, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, एन॰के॰बी॰एम॰जी॰ कॉलेज, चंदौसी, संभल, उ॰प्र॰, डॉ॰ कल्पना माहेश्वरी, हिंदी विभाग, ए॰के॰पी॰ कॉलिज, खुरजा, अंकिता तिवारी, शोध छात्रा हिंदी विभाग, सुधीर कुमार ओझा, शोध छात्र, एम॰एम॰एच॰ कॉलेज, गाजियाबाद, अंजु ललित, शोधार्थी, कु॰ मायावती राजकीय महिला महाविद्यालय, बादलपुर, डॉ॰ शिखा रानी, असिस्टेंट प्रोफेसर, श्री द्रोणाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दनकौर, गौतमबुद्ध नगर, छवि, शोधार्थी, एम॰एम॰एच॰ कॉलेज, गाजियाबाद, अरशदा रिजवी, शोधार्थी, हिंदी विभाग आदि ने अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण किया। 

इस क्रम में कल दिनांक 02 सितम्बर 2022 को राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन तीन सत्रों का कार्यक्रम संचालित किया जाएगा।

कार्यक्रम में प्रो॰ विजय जायसवाल, प्रो॰ जयमाला, प्रो॰ वेदप्रकाश वटुक, प्रो॰ असलम जमशेदपुरी, प्रो॰ प्रशांत कुमार, डॉ॰ विवेक त्यागी, डॉ॰ संजय कुमार, डॉ॰ आसिफ अली, डॉ॰ शादाब अलीम, डॉ॰ सरिता वर्मा, डॉ॰ रामयज्ञ मौर्य, डॉ॰ जे॰ पी॰ यादव, डॉ॰ विजयबहादुर त्रिपाठी, रमेश यादव, राजेश कुमार, डॉ॰ विद्यासागर सिंह, डॉ॰ प्रवीण कटारिया, डॉ॰ यज्ञेश कुमार, डॉ॰ दीपा रानी, डॉ॰ ललित सारस्वत, डॉ॰ मोनू सिंह, डॉ॰ अंचल, डॉ॰ गौरव चौहान, डा॰ ईश्वर चन्द गंभीर, सुमनेश सुमन, अशोक कुमार सैक्सेना, मोहनी कुमार, विनय कुमार, पूजा कसाना, पूजा यादव, प्रियंका कुशवाह, अर्पूवा, आयुषी, अंजली पाल, शिवम, शौर्य, काजल, अजय कुमार, आकाश, अरूण, निकुंज आदि छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


































Wednesday, August 24, 2022

निमंत्रण पत्र: दिनांक ०१-०२ सितम्बर २०२२ को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'विज्ञान, समाज विज्ञान और मीडिया में हिंदी' विषय पर आयोजित संगोष्ठी के संदर्भ में

 हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में दिनांक ०१ -०२ सितम्बर २०२२ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'विज्ञान, समाज विज्ञान और मीडिया में हिंदी' विषय पर आयोजित कर रहा है, जिसमें आप सभी सुधीजन सादर आमंत्रित हैं.

रजिस्ट्रेशन हेतु लिंक : https://docs.google.com/forms/d/1DLqbbCqGjpuFihSOjVNMVqudlXsLQUPYAPC54msh3OA/edit

धन्यवाद  





दिनांक 23 अगस्त 2022 को राष्ट्रीय सगोष्ठी ‘कबीर का चिंतन और भारतीय समाज’ एवं सांस्कृतिक संध्या

 हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ

दिनांक: 23 अगस्त 2022

हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ तथा संत कबीर अकादमी, मगहर (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) द्वारा दिनांक 23 अगस्त 2022 को राष्ट्रीय सगोष्ठी ‘कबीर का चिंतन और भारतीय समाज’ एवं सांस्कृतिक संध्या के अवसर पर संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के प्रारम्भ में अंतर विश्वविद्यालय निबंध लेखन प्रतियोगिता एवं आशु भाषण प्रतियोगिता में स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र एवं नगद पुरस्कार का वितरण किया गया। 

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो॰ वाई विमला, वरिष्ठ आचार्य, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ, बीज वक्तव्य प्रो॰ गोपेश्वर सिंह, दिल्ली, मुख्य वक्ता प्रो॰ अनिल राय और प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी, संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग रहे। 

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो॰ वाई विमला ने कहा कि कबीर हाशिए के कवि नहीं बल्कि हाशिए वालों के कवि हैं। उन्होंने उस समाज को साहित्य से जोड़ा, जिनको सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। हमनें विकास का मुल्लमा ओढ़ लिया है लेकिन हृदय मनुष्यत्व का ही हैं। आयु अमरत्व नहीं देती, आयु वही है जो मृत्यु के बाद अमरत्व देती हैं। सामाजिक कर्मकाण्ड़ों की अपेक्षा उन्होंने मानसिक भक्ति का उपदेश दिया। कर्म कोई छोटा नहीं होता हैं। कर्म के लिए ही मनुष्य का जन्म हुआ। कबीर का काव्य हमें उस अमर ज्योति की ओर ले जाता है जहाँ मनुष्यत्व को अमरत्व प्राप्त होता है।  

बीज वक्ता प्रो0 गोपेश्वर सिंह ने कहा की जीवन की संपूर्णता में देखने पर ही कबीर को समझा सकता है। इकहरे पाठ से कबीर को समझा नहीं जा सकता। कबीर को बाँटने की बजाए एकरूपता में अध्ययन करने की जरूरत है। एकल दृष्टि से उनका अध्ययन नहीं किया जा सकता। कबीर की आध्यात्मिकता कर्मकाण्डी नहीं हैं। व्यक्ति को जीवन-मरण के रहस्य से वे हटने नहीं देते। देश का कोई प्रान्त ऐसा नहीं है जहाँ कबीर का अध्ययन न किया जाता हो। कबीर का काव्य उद्योग और आध्यात्म का मिलन है। स्वतन्त्रता आंदोलन के बीच खड़ा गाँधी के एक हाथ में समता तो दूसरे में चरखे की कताई है। जहाँ एक ओर सामाजिक समानता है तो दूसरी ओर सभी को रोजगार भी है। कबीर की त्रिवेणी है- श्रम, अध्यात्म (सन्यास) और ग्राहृर्स्थ। गाँधी जी भी श्रम अध्यात्म और ग्राहृर्स्थ को अपनाते हैं। कन्नड़ कवि बसम्मा अपने शरीर को ही मंदिर बना लेने की बात करते हैं। भक्ति आंदोलन एक ही भाव धारा से संचालित हैं। भक्ति कविता के केन्द्र में मानवीय पीड़ा है। कबीर अपने समय के सबसे अधिक सवाल उठाने वाले कवि हैं। कबीर को पढ़ने का अर्थ है हम सवाल उठाना सीखें। भक्ति कविता आचरण से फूटी कविता है। भक्त कवि जो कहते हैं वही आचरण भी करते हैं। भक्ति की कविता मनसाध्य है इसलिए सभी भक्त कवियों को ईश्वरत्व प्राप्त है। संतकवि हमारे ऐसे पूर्वज है, जिनका चरित्र उज्ज्वल और आचरण महान है। उनकी विरासत नवीन पीढ़ी के जीवन आदर्श हैं।

उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता प्रो0 अनिल राय ने कहा कि कबीर जीवन के कवि हैं। निम्न जाति में गौरव का भाव जगाकर उन्हें भक्ति की उच्च श्रेणी के सोपान तक पहुँचाया। व्यापक स्तर पर भक्ति आंदोलन के समान केवल भारत भूमि पर स्वतन्त्रता आंदोलन ही हुआ। कबीर नये बनते समाज को महत्व देते हैं जिसमें हिंदु मुसलमान दोनों विद्यमान हैं। वर्तमान आदर्श हीनता का दौर है। प्राचीन और मध्यकालीन आदर्श वर्तमान समय में अप्रासंगिक हो गए हैं। कबीर काव्य और चिन्तन इन्हीं प्रश्नों को उठाता है। कबीर ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां समता है। कबीर काव्य चौहद्दी का काव्य नहीं है। कबीर की कविता समभाव की कविता है। चरखा स्वावलम्बन का प्रतीक है और गाँधी ने चरखा कबीर से ग्रहण किया है।

संकायाध्यक्ष कला एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो॰ नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि भारतीय समाज की विशेषता है, विविधता में एकता। कबीर का चिंतन भी इसी आदर्श को लेकर आगे बढ़ता है। आज के समाज में जहाँ मानवीय आदर्श गर्त में जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता, पाखंड, अंधविश्वास, हिंसा, घृणा, मानव समाज में घर कर रही है, वहाँ कबीर जैसे विचारकों की अत्यधिक आवश्यकता है। कबीर के काव्य को वर्तमान युग विड़म्बनाओं के परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है और युवा वर्ग को कबीर के चिंतन के प्रति आकर्षित करने की आवश्यकता है।   

उद्घाटन सत्र में स्व॰डॉ॰ सच्चिदानन्द सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘संतवाणी’ का लोकार्पण भी किया गया। इस अवसर पर उनके दोनों पुत्र श्री मनोज, श्री सनोज ने हिंदी विभाग को दीपक भेंट किया। 

उद्घाटन सत्र में आशुभाषाण प्रतियोगिता तथा निबंध लेखन प्रतियोगिता में स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र एवं पुरस्कार वितरण भी किया गया।

आशुभाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान निकुंज कुमार, द्वितीय स्थान शबनम, तृतीय स्थान पूर्णीमा, सांत्वना पुरस्कार मुस्कान सिंह एवं कनिष्का पटेल ने प्राप्त किया।

निबंध लेखन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अवंतिका गौतम, द्वितीय स्थान सोनिया सैनी, तृतीय स्थान अंजली पाल, सांत्वना पुरस्कार रूज़ा एवं स्तुति शर्मा ने प्राप्त किए। 

उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ0 मोनू सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, चौ0 चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय, छपरौली ने किया।

 राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र ‘कबीर की समाज दृष्टि’ की अध्यता प्रो॰ सदानंद साही, वाराणसी मुख्य वक्ता प्रो॰ शंभुनाथ तिवारी, अलीगढ़ एवं डॉ0 राजेश पासवान, जे॰एन॰यू॰, नई दिल्ली रहे।

प्रो॰ सदानंद साही, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि भारतीय समाज में श्रम को जिस हीन दृष्टि से देखा जा रहा था, कबीर ने उस मानसिकता को उलट दिया। पाखंड भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया था। कबीर की मौलिक देन इसी पाखंड पर प्रहार है। कथनी और करनी की एकरूपता को उन्होंने महत्व दिया। हिंदी आलोचना में कबीर को लेकर जो विसंगतियाँ दिखाई देती हैं। उनके मूल में वह बुनियादी हिंसा है। जिसमंे कबीर सुविधा संपन्न लोगों को प्रश्नांनकित करते हैं। धर्मोंपदेश परलोक की बात करते हैं, कबीर इसी लोक की बात करते हैं। कबीर केवल घर जलाने की बात नहीं करते, घर बनाने की भी बात करते हैं। सत्य का मुँह हमेशा विज्ञापन से ढ़का हुआ होता है। पीड़ित करने वाले धर्म का वह विरोध करते हैं। कबीर ऐसे घर को जलाते हैं जो मनुष्य को छोटा करता है और कबीर की कविता आदमी को आदमकद बनाती है। 

डॉ॰ राजेश पासवान, जे॰एन॰यू॰, दिल्ली ने कहा कि गुरु वही श्रेष्ठ है जो अपने शिष्य को श्रेष्ठ सोपानों तक पहुँचा दे। गुरु सुनने की शक्ति का विकास करता है। कबीर जातिवाद का विरोध करते हैं। श्रेष्ठता में कृत्रिम मानकों को कबीर समाप्त करते हैं। कामगार को हेय दृष्टि से देखने के कारण डिग्री धारकों को रोजगार प्राप्त नहीं होता क्योंकि श्रम के प्रति सम्मान का भाव नहीं है। काम और काम करने वालों के प्रति सम्मान की दृष्टि से ही बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो सकता हैं। संत कवि कर्म और कर्मशील को महत्व देते हैं।

प्रो0 शंभुनाथ तिवारी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ ने कहा कि कबीर ज्ञान मार्गी हैं और ज्ञान की बात करते हैं। कबीर ज्ञानमार्गी एवं प्रेममार्गी दोनों हैं। ज्ञानमार्गी कहाना कबीर को सीमित करना हैं। जब कबीर ‘ढाई आखर प्रेम का’ कहते हैं तो वे प्रेम की बात कर रहे होते हैं। कबीर की साधना में सभी मतों को स्थान प्राप्त है। कबीर एक खांचे में फिट होने वाले कवि नहीं हैं। कबीर की भाषा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। कबीर अपने कलाहीन रूप में सबसे कलात्मक दिखाई देते हैं। मध्यकाल की कविता उपदेश के रूप में भाषण की प्रक्रिया है। कबीर ने कविता को जनता से जोड़ा। कबीर का काव्य प्रहारात्मक है। कबीर को पढ़ते समय हमें उस परंपरा को केन्द्र में रखना है जिसमें भक्तिकालीन साहित्य गति पकड़ता है।

प्रथम सत्र का संचालन डॉ॰ विद्यासागर सिंह, शिक्षण सहायक हिंदी विभाग ने किया। 

कार्यक्रम का द्वितीय सत्र ‘कबीर कवि के रूप में’ की अध्यक्षता प्रो॰ के॰ श्रीलता, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, एर्नाकुलम, केरल ने की, मुख्य वक्ता प्रो॰ असलम जमशेदपुरी, अध्यक्ष उर्दू विभाग रहे।

प्रो॰ के॰ श्रीलता, श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, एर्नाकुलम, केरल ने कहा कि कबीर अपनी परिस्थितियों से जन्में थे, वे कई मतों से प्रभावित थे। इतना अधिक समय गुजरने के बाद भी कबीर की ध्वनी हमारे कानों में गुंजती है तो वह उनकी प्रासंगिकता की बानगी है। द्वंद्व मानसिक जगत में होना चाहिए जैसा कबीर ने किया। 

मुख्य वक्ता प्रो॰ असलम जमशेदपुरी ने कहा कि कबीर गुरु महिमा का ज्ञान करते हैं। उसे श्रेष्ठ मानते हैं। कबीर ज़मीन से जु़डे़ शायर हैं। उर्दू साहित्यकारोें ने कबीर को वह मकाम नहीं दिया जिसके वे हकदार हैं। कबीर उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं के बड़े कवि हैं। 

इस सत्र में मौ॰ वसीम खान, चित्रा गर्ग और डॉ॰ पूनम सिंह ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। द्वितीय सत्र का संचालन डॉ॰ प्रवीण कटारिया, शिक्षण सहायक, हिंदी विभाग ने किया। 

राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र ‘सांस्कृतिक संध्या’ की अध्यक्षता प्रो॰ वाई॰ विमला ने की। डॉ॰ गजेन्द्र पाण्डेय, श्री दीप प्रभाकर, श्री भानुप्रताप सिंह, श्री छोटू एवं श्री प्रिंस सोलंकी द्वारा कबीर भजनों का गायन प्रस्तुत किया गया। समापन सत्र का संचालन डॉ॰ यज्ञेश कुमार, शिक्षण सहायक, हिंदी विभाग ने किया।

इस अवसर पर रेशम विभाग, मेरठ द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई गई। 

इस अवसर पर प्रो॰एस॰एस॰ गौरव, प्रो0 विघ्नेश त्यागी, डॉ0 सीमा जैन, डॉ॰ सरिता वर्मा, डॉ॰ कविता त्यागी, डॉ॰ रामयज्ञ मौर्य, श्री रमेश यादव, डॉ॰ राजेश कुमार, डॉ॰ जे॰पी॰ यादव, डॉ॰ डॉ॰ दीपा त्यागी, श्री दिनेश कुमार, डॉ॰ असलम खान, डॉ0 याशमीन मूमल, डॉ॰ आरती राणा, डॉ॰ अंजू, ईश्वर चन्द गंभीर, किशन स्वरूप, सुमनेश सुमन, डॉ॰ योगेन्द्र सिंह, मोहनी कुमार, विनय कुमार, कु॰ पूजा कसाना, पूजा यादव, अंकिता तिवारी, अरशदा रिजवी, प्रियंका कुशवाह, उपेन्द्र कुमार, सचिन कुमार, अमित कुमार, प्रज्ञा, जया, स्वाति, अंजली पाल, राधा, निकुंज, आयुषी, प्रियंका, रीना, राजेश चौहान आदि उपस्थित रहे।



















आप सभी का मंथन विचार पत्रिका के इन्टरनेट संस्करण में स्वागत है..

"कैमरे के फ़ोकस में - मंथन पत्रिका और विभागीय गतिविधियाँ " को ब्लॉग के बायीं ओर लिंक सूची में देखें .......