Thursday, July 26, 2012
Thursday, July 5, 2012
अपने कार्य के प्रति निष्ठा तथा पूर्ण ईमानदारी का पालन करने वाला व्यक्ति सदैव आगे जाता है : प्रो0 आर0 एस0 अग्रवाल
इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष कला प्रो0 आर0 एस0
अग्रवाल के सेवानिवृति के मौके पर हिन्दी विभाग में विदाई समारोह का आयोजन
किया गया।
विदाई समारोह में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने
पुष्प गुच्छ भेंट कर प्रो0 आर0 एस0 अग्रवाल का स्वागत किया और कहा कि
प्रो0 अग्रवाल द्वारा विष्वविद्यालय को दिए गए शैक्षिक अवदान को सदैव स्मरण
किया जाएगा। प्रो0 लोहनी ने बताया कि फरवरी 2012 से 20 जून 2012 तक
स्विटजरलैंड के लुसान विवविद्यालय में प्रतिनियुक्ति के दौरान प्रो0
अग्रवाल ने कला संकायाध्यक्ष के नाते हिन्दी विभाग के अध्यक्ष का कार्यभार
भी बड़ी कुशलता से संभाला। मैं विभाग के सभी शिक्षक साथियों, कर्मचारियों
तथा छात्र-छात्राओं की ओर से पुनः हार्दिक धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। प्रो0
लोहनी ने कहा कि एक शिक्षक की भूमिका में प्रो0 अग्रवाल अपने विषय के पूर्ण
ज्ञाता, कुशल, कर्मठ तथा अपने कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति हैं।
इस अवसर पर विष्वविद्यालय
के वित्त नियंत्रक अतुल कुमार सिंह ने कहा कि प्रो0 आर0 एस0 अग्रवाल की
ख्याति देश ही नहीं विदेषों में भी वरिष्ठ इतिहास विद् की है। प्रो0
अग्रवाल के रचनात्मक व्यक्तित्व के कारण ही विष्वविद्यालय परिसर में अषोक
स्तम्भ तथा इतिहास विभाग में राष्ट्रीय महत्व का संग्रहालय स्थापित हो सका।
श्री सिंह ने कहा कि मैं अपेक्षा करता हूँ कि विष्वविद्यालय को प्रो0 आर0
एस0 अग्रवाल के ऐतिहासिक ज्ञान तथा अनुभव का लाभ भविष्य में भी मिलता
रहेगा।
हिन्दी विभाग की षिक्षण
सहायक डाॅ0 सीमा शर्मा ने प्रो0 आर0 एस0 अग्रवाल के विषय में अपने विचार
व्यक्त करते हुए कहा कि प्रो0 अग्रवाल एक कुशल संकायाध्यक्ष तथा अपने विषय
के विषद ज्ञानी के रूप में सदैव छात्र-छात्राओं के बीच में जाने जाते
रहेगें।
हिन्दी विभाग के शोध
छात्र मोनू सिंह ने कहा कि मैं आर0 एस0 अग्रवाल जैसे व्यक्तित्व के लिए
सेवानिवृत तथा विदाई जैसे शब्द का प्रयोग करने से संकोच करूंगा क्योंकि ऐसे
व्यक्तित्व एक स्थान से अलग होने के बाद भी समाज की मुख्य धारा से जुड़कर
अपना सामाजिक अवदान इस समष्टि को देते रहेंगे। इस अवसर पर प्रो0 आर0 एस0
अग्रवाल ने कहा कि 41 वर्ष की सेवा अवधि में इतना स्नेह और सम्मान मुझे
कहीं नहीं मिला, जितना की आज हिन्दी विभाग में मिला है। उन्होंने विभाग के
छात्र-छात्राओं को जीवन में सफलता पाने के लिए मूलमंत्र देते हुए कहा कि
अपने जीवन में सदैव एक बात का ध्यान रखना कि अपने कार्य के प्रति निष्ठा
तथा पूर्ण ईमानदारी का पालन करने वाला व्यक्ति सदैव आगे जाता है। कार्यक्रम का संचालन उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग के परियोजना अध्येता ललित कुमार सारस्वत ने किया।
इस
अवसर पर पुनीत कुमार, रामप्रसाद, तपेन्द्र कुमार, अंजू, आरती राणा, अलूपी,
आलोक प्रखर, चरण सिंह, राहुल, प्रगति, अनुराधा, प्रियंका, कौशल, मनीषा,
कपिल, संध्या, आयुषी, ज्योति, पूजा, विनय, सोनू, ब्रह्म सिंह सागर, लता,
दलिप कुमार, पिन्टु, पवन भारती आदि छात्र-छात्राएं उपस्थिति रहे।Thursday, June 28, 2012
लुसान विश्वविद्यालय से लौटे प्रो० नवीन चन्द्र लोहनी : हिन्दी विभाग
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vkeaf=r fd;k A वहाँ प्रो नवीन चन्द्र लोहनी ने हिन्दी की स्नातक और
स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन कार्य किया तथा विद्यार्थियों एवं
शोधर्थियों को हिन्दी साहित्य के विभिन्न पक्षों से परिचित कराया A साथ ही
भारतीय संस्कृति तथा दर्शन की व्यापक जानकारियां भी लुसान fo”ofo|ky; के छात्र&छात्राओं को प्रदान की A प्रो० लोहनी हाल ही में २० जून २०१२ को स्विटजरलैंड से वापस लौटे हैं तथा २० जून को ही अपराहन में चौधरी चरण सिंह fo”ofo|ky; के हिन्दी विभाग में foHkkxk/;{k का कार्यभार ग्रहण कर लिया A इस अवसर पर विभाग के सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों ने प्रो० नवीन चन्द्र लोहनी का स्वागत किया और उन्हें बधाई दी A
लेबल: फोटो
विश्व पटल पर हिंदी,
स्वागत है,
हिंदी विभाग में नया ?
Saturday, June 16, 2012
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा का परिणाम
हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिहं विश्वविद्यालय , मेरठ ऐसा विभाग जिसने अपने विकसित हाने के अल्प समय में शैक्षणिक एवं अकादमिक गतिविधियों से विश्वविद्यालय स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तरपर अपनी पहचान बनायी है और यह पहचान वैश्विक पटल पर नित नेई उपलब्धियों से विषिष्ट होती रही है। हिन्दी विभाग 14 मर्इ 2002 को विश्वविद्यालय में आरम्भ हुआ और दसवे वर्ष में 12 विद्यार्थियों ने जेआरएफ और नेट परीक्षा उत्तीर्ण की है। यह एक बडी़ उपलब्धि है। गौरतलब है कि विभाग के अध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी , स्विटज् रलैंड के लूसान विश्वविद्यालय में स्थापित कवि गुरू रवीन्दनाथ टैगोर चेयर पर प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा का परिणाम 15-06-2012 को घोषित हुआ। परिणाम में हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों का शानदार प्रदर्शन रहा। विभाग के ०७ जेआरएफ तथा 05 विद्यार्थिया ने नेट किया। जेआरएफ विद्यार्थियों में मोनू सिहं , प्रगति, पिंटू, कुसुम कुमारी, निवेदिता, कौशल, शिवानी तथा नेट विद्यार्थियों में डाॅ0 विपिन कुमार शर्मा, राहुल, पवन भारती, ज्योति सिहं एव मनीषा हैं ! प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी ने उत्तीर्ण विद्यार्थियों को बधाई सन्देश भेजा तथा उनकी उपलब्धि की सराहना की। विभाग के अन्य सभी शिक्षकों ने भी उत्तीर्ण विद्यार्थियों को बधाई दी।
अब तक हिन्दी विभाग से 19 विद्यार्थी नेट तथा 13 विद्यार्थी जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं ।
अब तक हिन्दी विभाग से 19 विद्यार्थी नेट तथा 13 विद्यार्थी जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं ।
लेबल: फोटो
उपलब्धियां,
हिंदी की पाठशाला,
हिंदी विभाग में नया ?
Sunday, April 1, 2012
श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा, स्विटज़रलैंड स्थित लुसान विश्वविद्यालय में : कुछ फोटो और बातें
दिनांक 19 मार्च को श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा 12 बजे स्विटज़रलैंड स्थित लुसान विश्वविद्यालय आए . दक्षिण एशियाई अध्ययन विभाग में आकर श्री राय ने विद्यार्थियों के साथ विभागाध्यक्ष प्रोफ. माया बुर्गेर, हिंदी विभाग में प्राध्यापक श्री निकोला पोज्ज़ा एवं विश्वविद्यालय में कविगुरू रवीन्द्रनाथ टेगोर चेयर पर आई. सी. सी. आर. द्वारा नियुक्त प्रोफ. नवीन चन्द्र लोहनी की उपस्थिति में बातचीत की, उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा हिंदी पाठ्यक्रमों के विकास में विश्व भर के विश्वविद्यालयों को सहयोग कर रहा है. इसके अंतर्गत उस देश की आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम निर्माण, उसके लिए पाठ्यसामग्री एवं दृश्य-श्रव्य सामग्री का निर्माण शामिल है. उन्होंने इस संदर्भ में बुडापेस्ट विश्वविद्यालय के लिए तैयार किए जा रहे पाठ्यक्रम की जानकारी भी दी.
श्री राय ने बताया कि विश्व भर में हिंदी शिक्षण को समृद्ध करने के उद्देश्य से उनका विश्वविद्यालय हिंदी प्राध्यापकों के लिए ओरिएंटेसन कार्यक्रम भी चला रहा है, इस कड़ी में तीसरा ओरिएंटेसन कार्यक्रम माह नवम्बर २०१२ में संभावित हैं , इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय द्वारा दी जा रही सुविधाओं पर भी उन्होंने विस्तार में अवगत कराया .उन्होंने विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों के लिए हिंदी अध्ययन एवं हिंदी बोलने के लिए विविध प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की भी जानकारी दी और कहा कि विश्वविद्यालय इस कार्यक्रम में कई अन्य संस्थाओं से सामान्य शुल्क पर शिक्षण-प्रशिक्षण दे रहा है . उन्होंने इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की भी चर्चा की.
श्री राय ने हिंदी के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को इन कार्यक्रमों हेतु महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के लिए आमंत्रित किया .विभाग की अध्यक्ष प्रोफ. माया बुर्गेर ने इन जानकारियों एवं कार्यक्रमों की सूचना के लिए श्री राय का लुसान विश्वविद्यालय आने पर स्वागत किया और आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि हिंदी के विकास के लिए वह अपने विभाग के शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं को इससे जोड़ना चाहेंगी. उन्होंने लुसान विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय स्वरुप एवं शिक्षण की जानकारी दी. इसके उपरांत उन्होंने लुसान के प्रसिद्ध लुसान झील एवं चर्च देखे. इससे पूर्व लुसान विश्वविद्यालय आने पर श्री एवं श्रीमती राय का कफितेरिया में प्रोफ. माया बुर्गेर, एवं निकोला पोज्ज़ा ने स्वागत किया. उन्होंने लुसान विश्वविद्यालय का पुस्तकालय देखा इस अवसर पर हिंदी विभाग में प्राध्यापक श्री निकोला पोज्ज़ा एवं विश्वविद्यालय में कविगुरू रवीन्द्रनाथ टेगोर चेयर पर आई. सी. सी. आर. द्वारा नियुक्त प्रोफ. नवीन चन्द्र लोहनी एवं पुस्तकालय में कार्यरत श्री मार्क थीफनौअर ने उन्हें पुस्तकालय के सम्बन्ध में जानकारी दी .इस यात्रा में उनके साथ उनकी पत्नी श्रीमती पद्मा राय भी शामिल रहीं ... (http://hindi-vishwa.blogspot.in/)
श्री राय ने बताया कि विश्व भर में हिंदी शिक्षण को समृद्ध करने के उद्देश्य से उनका विश्वविद्यालय हिंदी प्राध्यापकों के लिए ओरिएंटेसन कार्यक्रम भी चला रहा है, इस कड़ी में तीसरा ओरिएंटेसन कार्यक्रम माह नवम्बर २०१२ में संभावित हैं , इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय द्वारा दी जा रही सुविधाओं पर भी उन्होंने विस्तार में अवगत कराया .उन्होंने विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों के लिए हिंदी अध्ययन एवं हिंदी बोलने के लिए विविध प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की भी जानकारी दी और कहा कि विश्वविद्यालय इस कार्यक्रम में कई अन्य संस्थाओं से सामान्य शुल्क पर शिक्षण-प्रशिक्षण दे रहा है . उन्होंने इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की भी चर्चा की.
श्री राय ने हिंदी के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को इन कार्यक्रमों हेतु महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के लिए आमंत्रित किया .विभाग की अध्यक्ष प्रोफ. माया बुर्गेर ने इन जानकारियों एवं कार्यक्रमों की सूचना के लिए श्री राय का लुसान विश्वविद्यालय आने पर स्वागत किया और आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि हिंदी के विकास के लिए वह अपने विभाग के शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं को इससे जोड़ना चाहेंगी. उन्होंने लुसान विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय स्वरुप एवं शिक्षण की जानकारी दी. इसके उपरांत उन्होंने लुसान के प्रसिद्ध लुसान झील एवं चर्च देखे. इससे पूर्व लुसान विश्वविद्यालय आने पर श्री एवं श्रीमती राय का कफितेरिया में प्रोफ. माया बुर्गेर, एवं निकोला पोज्ज़ा ने स्वागत किया. उन्होंने लुसान विश्वविद्यालय का पुस्तकालय देखा इस अवसर पर हिंदी विभाग में प्राध्यापक श्री निकोला पोज्ज़ा एवं विश्वविद्यालय में कविगुरू रवीन्द्रनाथ टेगोर चेयर पर आई. सी. सी. आर. द्वारा नियुक्त प्रोफ. नवीन चन्द्र लोहनी एवं पुस्तकालय में कार्यरत श्री मार्क थीफनौअर ने उन्हें पुस्तकालय के सम्बन्ध में जानकारी दी .इस यात्रा में उनके साथ उनकी पत्नी श्रीमती पद्मा राय भी शामिल रहीं ... (http://hindi-vishwa.blogspot.in/)
Wednesday, March 28, 2012
क्या वास्तव में भारत की भाषाएँ कोई विकल्प नहीं हैं अपने देश के लिए : प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी
भारत में कितने प्रतिशत लोग अंगरेजी जानते हैं कोई 2 या तीन प्रतिशत, मैं भी भारत के एन.सी. आर. क्षेत्र में 21 वर्षों से रह रहा हूँ, और देखता हूं कि पास के ही गाँव देहात में पला और उन्हीं इलाकों में जीवन बसर कर रहा आदमी में हिंदी नहीं जानता, या मेरी हिंदी अच्छी नहीं है कहकर शर्म अनुभव नहीं करता बल्कि सोचता है कि वह कुछ बड़ी बात कह गया है , और जब वह गंवारू सी अंगरेजी बोल रहा होता है और उच्चारण भी भ्रष्ट होता है, तो भी यह सोचकर खुश हो लेता है कि ख़राब ही सही अंगरेजी तो बोल रहा हूं , सब्जी वाले , रिक्से वाले या गाँव से आए हुए नए विद्यार्थी या युवक पर तो असर पड़ रहा है .
उच्च शिक्षा में तो इस प्रकार की तोता रटंत वाले बहुत हैं, जो किसी की भी ख़राब कुंजी को क्लास में उगल आते हैं और सोचते हैं कि भारी तीर मार दिया है .वह ज्ञान ही क्या जो अपनी भाषा तक में नहीं दोहराया जा सके, पर समझे बगैर उगलना हो तो रटा हुआ उगलना आसन है . अपनी रटंत और नकल को दूसरों के सामने सुना देने के अलावा इंग्लीश कितने लोगों के लिए सामान्य बोलचाल की भाषा है? यह बहुत बड़ा सवाल है.
सवाल अँग्रेज़ी के विरोध का नहीं है, आप दुनिया की तमाम भाषाएँ सीखें किसे विरोध है . पर अपने देश के बाहर यह सीन नहीं है, लोग अपनी भाषा से भी लगाव रखते है, और उसे हर हाल में अपने देश में शिक्षा और रोज़गार की भाषा बनाए रखना चाहते हैं, और मामलों में हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं, पर इस मामले में नहीं . हम इस मामले में अच्छे नकलची भी नहीं हैं . व्यावसायिक जगहों और जरूरतों की जगह पर तो यह स्थिति हो सकती है अंगरेजी का प्रतिशत बढ़ा होगा यह वास्तव में कितना होगा यह अलग सवाल है , मैं इस मजबूरी में या कार्यालय के घंटों को भाषा ज्ञान के संदर्भ में नहीं देख रहा हूं . परन्तु यह सब लोग घर में, दोस्तों में एवं अपने कार्यालय के बाहर अंग्रेज़ी नहीं प्रयोग करते बल्कि अपने घर की भाषा बंगला, मराठी, पंजाबी, उर्दू , तमिल , तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, हिंदी, गुजराती या फिर अपनी स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं, वास्तव में व्यावसायिक भाषा नहीं घर की आम प्रयोग की भाषा क्या बोलचाल की भाषा अंगरेजी है,शायद ऐसा नहीं. इस प्रकार देखें तो शायद आपको मेरी बात कुछ अलग और शायद ठीक भी लगे.
भाषाओँ का विकास उस समाज पर निर्भर करता है जो उसके प्रयोगकर्ताओं का समाज है , आखिर भारत की भाषा हिंदी को आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है तो उसके लिए भाषा की इस ताकत को समझना पड़ेगा की दूर देशों में हिंदी को लेकर क्यों रुझान है ? लेकिन इसके विपरीत भारत के भाषा भाषी समाजों में अग्रणी होने के बाद भी देश के अंदर ही हिंदी को रोजगार से बाहर कर रहे लोगों के खेल से सजग होना होगा . विदेशों में हिंदी के प्रयोग एवं भविष्य में इस भाषा के जब संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रयोग को लेकर बात होती है तो तब अपने देश के उन लोगों की तरफ नजर जाती है जो इसके लिए जिम्मेदार हैं , क्योंकि देश के बाहर अपनी मातृभाषा को छोड़कर हिंदी पड़ा रहे लोग इस सवाल को पूछें तो उनको क्या जवाब दिया जाय यह समझ में नहीं आता .
स्पेन के व्य्यादोलिद विश्वविद्यालय में १४-१७ मार्च की तीन दिन की अंतरराष्ट्रीयसंगोष्ठी सम्पन्न हुई , यूरोपीय देशों में हिंदी पढ़ा रहे शिक्षकों ने जब यह सवाल पूछा भारत कब अपने देश में शिक्षा और रोजगार की भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता देगा तो में भी निरुत्तर था,विषय पर गंभीर चिंतन मनन वाली गोष्ठी में शामिल कई मित्र इस पर क्या कहते , लेकिन आप क्या कहंगे उन विदेशी शिक्षकों ओ जो हिंदी पठन पाठन से जुड़े हैं. मेरी समझ में सबसे अच्छी ज्ञान की भाषा तो वह है जिसे हम ठीक से बोल,समझ,लिख सकते हैं, कंप्यूटर ने इस मामले में सब भाषाओँ को बराबरी पर ला दिया है. इसलिए फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश, रसियन, जापानी, चीनी भाषा भाषियों को ज्ञान एवं सूचना में अपनी भाषा कहीं भी कमजोर नहीं दीखती, उन्होंने अपने भाषा संस्थानों को मजबूत किया है, और बता दिया है कि वे इस सन्दर्भ में अगर अंगरेजी के मोहताज नहीं हैं और उनकी भाषा में ज्ञान और सूचना की सभी संभावनाओं का दोहन करने और समझने-समझाने की सारी संभावनाएं मौजूद हैं. इसलिए दुनिया भर की भाषाएँ सीखने और समझने के बावजूद वे अपनी भाषा के प्रति कोई समझौता नहीं करते.
लेकिन क्या भारत सरकार के तमाम मंत्रालयों में इस विषय पर विचार होना जरूरी नहीं है कि तमाम विशेषज्ञों की राय को देखते हुए शिक्षा की भाषा और रोजगार की भाषा में वह अपने देश की भाषाओँ को विकल्प के रूप में लाएं.... सारे मामलों में पश्चिम की नक़ल हो रही है क्या उनकी भाषा नीतियों से भी कुछ सबक लिया जाएगा कि नहीं ?
लेबल: फोटो
मेरी बात,
विश्व पटल पर हिंदी,
हिंदी की पाठशाला,
हिंदी विभाग में नया ?
Tuesday, March 20, 2012
भाषाओँ का विकास उस समाज पर निर्भर करता है जो उसके प्रयोगकर्ताओं का समाज है -प्रोफ.नवीन चन्द्र लोहनी
स्पेन के व्य्यादोलिद विश्वविद्यालय में १४-१७ मार्च की तीन दिन की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई , इंतनी सुचिंतित, व्यवस्थित और विषय पर गंभीर चिंतन मनन वाली गोष्ठी में शामिल होने का अवसर मिला तो लगा कि इस प्रकार के आयोजन हिंदी के विकास के लिए आवश्यक हैं , इस संगोष्ठी मैं वहां के दूतावास, कासा दे ला दे इंडिया का सहयोग एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी अत्यंत सराहनीय रहा , आयोजक प्रोफ. श्रीश जैसवाल एवं उनकी टीम बधाई की पात्र है. मैं इस आयोजन में शरीक रहे सभी मित्रों को बधाई देता हूं !
लेबल: फोटो
भाषा और साहित्य,
विश्व पटल पर हिंदी,
हिंदी की पाठशाला
Saturday, March 3, 2012
प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी लूसान विष्वविद्यालय में भी हिन्दी के उत्थान एवं उन्नय के लिए कार्य करेंगे
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लेबल: फोटो
हिंदी की पाठशाला,
हिंदी विभाग में नया ?
Thursday, March 1, 2012
स्विट्जरलैंड में हिंदी की पाठशाला
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लेबल: फोटो
विश्व पटल पर हिंदी,
हिंदी की पाठशाला,
हिंदी विभाग में नया ?
Tuesday, January 3, 2012
शमशेर को पूरा नहीं बल्कि चयन करके पढ़ना चाहिए, उनके पोजेटिव को ही ग्रहण करना चाहिए- प्रो0 निर्मला जैन
शमशेर की कविता फिलहालियत की कविता नहीं। शमशेर की कविता को जरा गौर से पढ़ना होगा। उनकी कविता अन्तःकरण में सीधे नहीं उतरेगी उससे सम्वाद करने के लिए विशेष तरह की तैयारी की जरूरत है। यह विचार आज हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ’शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता’ में उदघाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जानी-मानी आलोचक प्रो0 निर्मला जैन ने कहा कि यह गौरव की बात है कि इतना बड़ा कवि स्थानीय स्तर पर हुआ। शमशेर की स्थिति दो मेडों पर खड़े हुए कवि की स्थिति है। उन्होंने वामपन्थी और प्रेम दोनों ही तरह की कविताएं लिखी। उन्हें रूप का कवि, एन्द्रियता का कवि तथा बिम्बों का कवि कहा गया। शमशेर उनमें से एक हैं जिन्होंने ऊँचाई ग्रहण की। उन्होंने कहा कि हम सभाओं, संगोष्ठियों में वहीं कह रहें है जो अब से पहले शमशेर के संदर्भ में कहा गया है। आज जरूरत इस बात की है कि शमशेर की कुछ ऐसी कविताएं खोजी जाए जो सीधे-सीधे पर्यावरण नष्ट होने की समस्या से, बाजारवाद से, भूमण्डलीकरण से संबंध रखती हों। जिन्होंने उसे आज का कवि बना दिया है। कुछ शोधार्थी उनके अनदेखे पक्षो पर शोध करें।
माननीय कुलपति डाॅ0 विपिन गर्ग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विभाग में लगातार आयोजित हो ऐसी मेरी अपेक्षा है। आज हम जिस व्यक्तित्व के विशलेषण के लिए इकट्ठा हुए है जहां तक मेरी सोच है तो - ’’जब कोई रचना करता है तो बस वो करता है, उसके बारे मे विष्लेषण करना, हमारी समझ है तथा परिवेष है, ऐसी मेरी समझ है।’’ कहकर उनके व्यक्तित्व एवं रचनाधर्मिता की सराहना की। 
दिल्ली से आए डाॅ0 रामेश्वर राय ने व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता विशेष तैयारी की मांग करती है। शमशेर की कविता के कथ्य ज्यादा परिचित नहीं। कथ्य का अपरिचयपन ही जटिलता है। विजय देव नारायण साही ने कहा है कि शमशेर बुनियादी रूप से दुरूहता के कवि हैं। प्रो0 राय ने मलयज की पंक्तियां व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता की कुछ निजी मांगे हैं। शमशेर की कविता का संसार आपा-धापी वाले संसार से बिलकुल अलग है। सामान्यतः शमशेर की चर्चा प्रगतिवादी कवि के रूप में होती है। वे अज्ञेय मुक्तिबोध शमशेर-नागार्जन मुक्तिबोध शमशेर- दोनों तरफ की त्रयी में आते हैं। शमशेर सौंदर्य के कवि है तथा साथ ही माक्र्सवादी रचनाकार भी। उन्होंने कहा कि हमें यह देखना है कि शमशेर माक्र्स के बारे मे क्या कहते है ? माक्र्स के साथ उनकी कविता का क्या संबंध है ? इन प्रश्नों के संकेत देते हुए शमशेर ने कहा है - ’’मैं उस अर्थ में कभी माक्र्सवादी नहीं रहा जिस अर्थ में मेरे प्रगतिशील कवि रहे हैं। माक्र्सवाद मेरी जरूरत थी, माक्र्स ने मुझे उबारा।’’ माक्र्सवाद उनकी पूरी अन्तश्चेतना पर छाया हुआ था और वह कहते थे कि मुझे हर वह चीज आकर्षित करती है जो मेरी प्रकृति से भिन्न है। माक्र्स के प्रति उनका रूझान प्रकृति की भिन्नता के कारण है। उन्होंने दर्जनों कविता माक्र्सवाद पर लिखी इसलिए माक्र्सवादी सिद्ध हो सकते हैं उनकी ऐसी ही कविताओं को नामवर सिंह ने प्रमाणवाद की कविता कहा है। कविताओं के आधार पर यह कहना कठिन नहीं कि उन्होंने मजदूरों पर, आन्दोलनों पर, प्रभातफेरियो पर कविताएं लिखी। शमशेर की कविता वैयक्तिकता की कविता है या निजता की कविता है। यह देख कर ही 1956 ई0 मंे नामवर सिंह ने उनकी कविताओं को एकालाप की कविता कहा है। प्रो0 राय ने कहा कि शमशेर ने जिन विषयों पर कविता लिखी व कविता प्रतिरोध का निर्माण करती है। यह देखकर ही उदय प्रकाश ने कहा था कि शमशेर प्रेम के अद्वितीय रचनाकार है। उनकी सामाजिक राजनैतिक कविता में अपने साथियों पर लिखा, राजनीति पर लिखा। यह सोचने का विषय है कि प्रेम का इतना बड़ा कवि प्रेम या प्रकृति पर लिखते हुए कोई प्रतिरोध पैदा करता है या नहीं। प्रेम के वो बहुत वाचाल कवि है। उनकी पंक्तियां है - ’’तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मछलियाँ पानी से करती हैं। तुम मुझसे प्रेम करो, जैसे मैं तुमसे करता हँू।’’ यह साफगोई शमशेर में बच्चन से भी कई अधिक दिखाई देती है। एक खास तरह की सघन एन्द्रियता उनके काव्य में दिखाई देती है। शमशेर ने कई जगह अपने अकेलेपन की चर्चा की है - ’’कोई पास नहीं, वजूज एक सुराही के, वजूज एक चटाई के, वजूज एक आकाश के।’’ प्रो0 राय ने कहा कि शमशेर सिर्फ एक सुराही, सिर्फ एक चटाई, सिर्फ खुले आकाश के साथ अकेले रह सकते हैं। खुश रहने की जो यह स्वीकृति है, साहस है, वह बाजार की पूरी संग्रहकारी बाजारवादी संस्कृति के विरोध में है। शमशेर की कविता अकादमिक विचारधारा की कविता नहीं बल्कि ऐसी कविता है जो मनुष्य की विडम्बनाओं को देखती है। 
डीन कलासंकाय प्रो0 आर0एस0 अग्रवाल ने कहा कि शमशेर हमारे विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के अंग रहे है, ऐलम और देहरादून दूर नहीं। हमारे विश्वविद्यालय क्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के विविध आयामों की चर्चा हिंदी विभाग ने की, ये गौरव का विषय है। शमशेर ने अनुभव व विचार को आख्यान में बदल दिया, इस तथ्यात्मक प्रस्तुति को हम आख्यान कहते हैं, यह कहानी नहीं। शमशेर अपने आप में एक संस्था थे, संस्था वहीं होता है जिसके इर्द-गिर्द बहुत सी प्रतिभाएं घुमती है। हम उन्हें संस्था के रूप में देखकर विचार करें।
उनके व्यक्तित्व, रचनाशीलता का मूल्यांकन यदि निष्पक्ष रूप से किया जाएं तो शमशेर एक संस्था के रूप में दिखाई देंगे। आज की संगोष्ठी निश्चित रूप से फलदायी होगी, विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव का विषय है। उद्घाटन सत्र का संचालन ललित कुमार सारस्वत, परियोजना अध्येता, उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग ने किया।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र ’’शमशेर की कविता के विविध आयाम’’ में इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि पद्मश्री लीलाधर जगूडी ने कहा कि शमशेर को समझने के लिए खास तैयारी की जरूरत है। शमशेर से टक्कर लेनी चाहिए वे शब्दों को गायब कर देते है, जैसे - ’एक नीला आइना बेठोस।’ - इससे वह केवल आकाश कहना चाहते है और आकाश जिस दिन ठोस हो जाएगा तो मैं हाथ पैर भी नहीं हिला पाऊगां। ऐसा बिम्ब पूरे साहित्य में नहीं मिलता। उन्हें समझने के लिए उनकी भाषा को, बिम्बों को जानना होगा। शमशेर ने निराला के बाद एक नई काव्य भाषा का निर्माण किया।
निराला की भाषा को ढकेलते हुए शमशेर ने उस भाषा में सुन्दर और शानदार कविता रची। वे प्रतिरोध के कवि हैं उन्होंने माक्र्सवाद को भी कविता से अलग किया। शमशेर ने कहीं न कहीं प्रगतिशीलता को माक्र्सवादी दृष्टिकोण से अलग किया। ’’अब गिरा, अब गिरा वह अटका हुआ, सान्ध्यतारक सा।’’ इन पंक्तियों में जीवन की, प्रेम की, बहुत बड़ी व्यंजना मिलती है।
प्रो0 दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि शमशेर की पूरी कविता पर पश्चिमी आंदोलनों का प्रभाव है। उस पर प्रतीकवाद, प्रभाववाद, रूपवाद, दादावाद, व्यंजनावाद का प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी आंदोलनों के संदर्भ में शमशेर की कविताओं को देखा जाए। औपनिवेशिक दौर में दौ सौ वर्षों में हिंदी में जो मध्य वर्ग तैयार हुआ था, उससे भी शमशेर की कविता जुड़ती है। प्रो0 गुप्त ने कहा कि शमशेर को मैं इस रूप में देखता हूँ कि वो बोलियों के मर्मज्ञ विद्वान थे साथ ही उनका उर्दू व अंग्रेजी पर पूरा अधिकार था। उर्दू शायरी की परम्परा का प्रभाव शमशेर पर है तथा अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव भी उनकी कविता पर देखा जाना चाहिए। इनकी कविताओं पर यथार्थवाद व बिम्बवाद का प्रभाव भी है जो खुद शमशेर ने स्वीकार किया है। वे अतियथार्थवाद के निकट है। पश्चिम के आंदोलन आधुनिकतावादी आंदोलन है, उनकी कुछ कविताओं पर, उनके शिल्प पर, भाषा पर पश्चिम का प्रभाव है। उनकी कविता पूरा रंगों का महोत्सव है। उनकी कविता में संगीत है, संगीत का साथ है जो इससे पहले हिन्दी कविता में नहीं मिलेगा। शमशेर की कविताओं में रूमानी तत्व उर्दू से आते है और वे उसे एक नया रूप देते हैं। शमशेर इस नाते भी बड़े है कि जो कविता में है, वहीं उनके जीवन में है। साहित्य की पूरी नैतिकता, पवित्रता को शमशेर जैसा कवि बहुत सहेज कर आगे बढ़ाता है। आज शमशेर की कविता आदर्श हो सकती है। उनके साहित्य के नैतिक स्वरों को अगर देखे तो उनके जैसा उनका समकालीन कोई नहीं। पूरी पाश्चात्य परम्परा को सजोते हुए शमशेर कहाँ स्थापित होते हैं, यह सोचने का विषय है।
द्वितीय सत्र का संचालन एस0 डी0 काॅलिज, मुजफरनगर के प्रवक्त डाॅ0 विश्वम्भर पाण्डेय ने किया।
तृतीय सत्र ‘शमशेर का गद्य और अन्य पक्ष’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र में मुख्य अतिथि प्रो0 प्रेमचन्द पातंजलि, दिल्ली ने कहा कि जब व्यक्ति जीवित रहता है तो उसे कोई याद नहीं करता, यही विडम्बना शमशेर के साथ भी रही। ईष्र्या जन्य पीढ़ी ने शमशेर को पनपने नहीं दिया। साहित्य के मठाधीशों ने उन्हें दूर रखा। वे किसी मठ से बंधने वाले कवि नहीं थे शमशेर निराला का कौरवी एडीसन है। मेरी इच्छा है कि उनके नाम पर पुस्तकालय अथवा स्मारक बनना चाहिए। 

डाॅ0 गजेन्द्र सिंह ने कहा कि शमशेर आधुनिक सन्र्दभों में ऐसे साहित्यकार है जिन्हें पढ़ा जाना जरूरी है। शमशेर को साहित्यिक गुटबदियों के कारण उस तरह से नहीं पढ़ा गया जैसे पढ़ा जाना चाहिए। परिवेश से व्यक्ति अपने गद्य का निर्माण करता है। हर व्यक्ति संघर्ष से आगे बढ़ता है। जिस तरह निराला संघर्ष कर आगे बढ़े उसी प्रकार शमशेर भी। चाहे अज्ञेय हो, मुक्तिबोध हो या कीर्ती चैधरी, उनके बीच शमशेर ने अपना स्थान बनाया। शमशेर ने अपने गद्य में गाँव की समस्या, बेरोजगारी की समस्या को उठाया। अन्तरराष्ट्रीय संबंधों पर जैसा शमशेर ने लिखा, वैसा कोई नहीं लिख सका। प्रो0 मीरा गौतम ने शमशेर के गद्य से जुड़े कुछ ज्वलन्त मुद्दों की ओर संकेत किया। तृतीय सत्र का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया।
संगोष्ठी में हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर शहर के प्रतिष्ठित कवि, लेखक और शिक्षक डाॅ0 वेदप्रकाश ‘वटुक’, ईश्वर चन्द गंभीर, ज्वाला प्रसाद कौशिक, ज्ञानेश दत्त हरित, डाॅ0 कृष्णा शर्मा, डाॅ0 वन्दना शर्मा,
डाॅ0 पूनम शर्मा, डाॅ0 रीना ठाकुर, डाॅ0 दीपा त्यागी, डाॅ0 विजय बहादुर त्रिपाठी, डाॅ0 शशि बाला अग्रवाल, डाॅ0 अनिल शर्मा, डाॅ0 वीना वत्स, डाॅ0 नेहा शर्मा, डाॅ0 निशा जैन, डाॅ0 ज्वाला प्रसाद कौशिक, डाॅ0 सरिता वर्मा, डाॅ0 प्रियंका, डाॅ0 ऊषा माहेश्वरी, डाॅ0 गीता शर्मा, डाॅ० स्नेह लता, डाॅ0 राम यज्ञ मौर्य, डाॅ0 मिन्तु, डाॅ0 अर्चना सिंह, डाॅ0 सुनीता, डाॅ0 
विक्रम सिंह, डाॅ0 शीला शर्मा, डाॅ0 ललिता यादव, डाॅ0 कुसुम नन्दा, डाॅ0 वीणाशंकर शर्मा, डाॅ0 कन्चन पुरी, डाॅ0 निशा गोयल, डाॅ0 कविता त्यागी, डाॅ0 निर्मला देवी, डाॅ0 साधना तोमर, डाॅ0 गीता रानी, डाॅ0 नीलम राणा, डाॅ0 प्रतिभा चौहान, डाॅ0 निकिता, डाॅ0 वीना शर्मा, डाॅ0 विश्वम्भर पाण्डेय आदि तथा विश्वविद्यालय के प्रो0 आर0 के0 सोनी, प्रो0 एम0 के0 गुप्ता, हिन्दी विभाग के शिक्षक आलोक प्रखर, डाॅ0 सीमा शर्मा डाॅ0 रवीन्द्र कुमार, अंजू, आरती, विवेक सिंह तथा छात्र-छात्राओं में मतेंद्र कुमार, निर्देश चौधरी, रीना देवी, कमला, पारस धामा, निशान्त जैन, यसमीन अहमद, सोनू, रीता, पारुल कुमारी, नरेन्द्र कुमार, प्रदीप कुमार , बबीता चौधरी, प्रेम सिंह, पवन कुमार, राजीव कुमार, मनीष वर्मा, मीनू, शिवानी, कौशल संध्या, मोहनी, पूजा, मिलिन्द गौतम, आयूषी आदि उपस्थित रहे।
Thursday, December 22, 2011
शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता
हिन्दी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा साल २०१२ का प्रथम संगोष्ठी कार्यक्रम ०३ जनवरी २०१२ को आयोजित किया जा रहा है, विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सभी महाविद्यालयो के शिक्षक साथियों को उक्त आयोजन में आमंत्रित किया जाता है ! कृपया इस संगोष्ठी की सूचना अपने शिक्षक साथियों तथा छात्र -छात्राओं को भी अवगत कराएँ और अपने आने संबन्धी सूचना ई -मैल, फोन अथवा मोबाइल से हमे अवगत कर दें जिसके अनुसार व्यवस्था सम्पन्न कराई जा सके ! संगोष्ठी में प्रपत्र प्रस्तुत करने हेतु कृपया दिनांक ३१ दिसम्बर २०११ तक क्रुतिदेव १० अथवा युनिकोड से मेल nclhindiduniya@gmail.com अथवा डाक से हिन्दी विभाग विभाग में उपलब्ध कराने का कष्ट करें ! अधिक जानकारी के लिए पढ़ते रहें http://www.manthanvicharpatrika.blogspot.com और फोन करें 0121-2772455 !
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शमशेर बहादुर सिंह,
हिंदी विभाग में नया ?
Thursday, December 8, 2011
साहित्य को ’एन्ज्वाय’ करना होगा तब जाकर कहीं लगेगा कि हम साहित्य को जी रहे हैं- तेजेन्द्र शर्मा
दिनांक 8 दिसम्बर 2011। ’लेखक प्रवासी हो सकता है, साहित्य प्रवासी नहीं हो सकता।’ साहित्य किसी विचारधारा के दबाव में नहीं लिखा जाए। साहित्य के लिए विचार जरुरी है विचारधारा जरुरी नहीं क्यांेकि आम आदमी का दर्द किसी विचारधारा का मोहताज नहीं। आपको लेखक होने के लिए संवेदनशील होना जरूरी है। जहाँ आप रहते हैं वहाँ के विचार आपकी कहानियों में परिलक्षित होते हैं। ये विचार आज चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के हिन्दी विभाग में आयोजित संगोष्ठी ’’प्रवासी हिन्दी साहित्य एवं कहानी पाठ’’ में ब्रिटेन में रह रहे हिन्दी के कहानीकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब हिन्दी में प्रवासी साहित्य नाम की संज्ञा बनाई गई तो मैंने जिज्ञासावश पूरी दुनियां की भाषाओं को खंगाला तो पाया कि दुनियां की किसी भाषा में प्रवासी साहित्य जैसी कोई बात है ही नहीं। हिन्दी वालों को कंपार्टमेंट बनाने का शौक है हम साहित्य को साहित्य नहीं रहने देना चाहते। उसे दलित साहित्य, महिला लेखन आदि खानों में बांटते हैं। साहित्य अमरीका, कनाडा, खाड़ी देशों में भी लिखा जा रहा है यह सारा प्रवासी साहित्य है। क्या प्रवासी साहित्य जो इन देशों में लिखा जा रहा है यदि एक है तो पूरा है क्योंकि जिस देश-परिवेश में हम रहते हैं तो यदि वह हमारे साहित्य में लक्षित नहीं होता तो वह साहित्य नहीं। श्री तेजेन्द्र ने कहा कि अगर मैंने लन्दन, ब्रिटेन को जाना तो मेरी कोशिश होगी कि ब्रिटेन व लन्दन मेरे पन्नों पर बिखर जाए। मेरी कहानी का औचित्य तभी है जब पाठक को लगे कि मैंने कोई नई चीज सीखी। उन्होंने बम्बई का जिक्र करते हुए कहा कि बम्बई के साहित्य में बंबई जिन्दा क्यों नहीं है वह इसलिए कि बम्बई मंे एक भी हिन्दी लेखक नहीं जो बम्बई में जन्मा हो। जो कवि हैं उन्हें आजमगढ़-नैनीताल याद आता है, जो कहानीकार हैं वे उसे ही अभिव्यक्त करते हैं जहाँ से उठकर आए। अपने शब्दों को वाणी देते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने पंक्तियाँ पढी -
’’बहुत दिन से मुझे अपने से ये शिकायत है
वो बिछडा गांव मेरे सपनों में नहीं आता
वो बैलों की घंटी, नदी का किनारा याद नहीं आता।’’
’’जो तुम ना मानों मुझे अपना हक तुम्हारा है
यहाँ जो आ गया एक बार बस तुम्हारा है
तरह-तरह के परिंदे बसे है आकर यहाँ
सभी का दर्द यहाँ आकर संवारा है।
नदी की धार बहे आगे मुड़कर ना देखे
न समझो इसको भंवर यही किनारा है।’’
उन्हांेने कहा कि कोई भी लेखक कितना ही गंभीर क्यों न हों वह बिना सोचे नहीं लिख सकता। भारत में हिन्दी के छोटी कथाओं में पढाने पर तंज करते हुए कहा कि जब भारत में युवा पीढी को हिन्दी पढ़ाने में दिक्कत है तो इग्लैण्ड में कैसा होगा ? ’हिन्दी साहित्य इज ए पार्टटाइम एक्टीविटी’ टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हर हिन्दी लेखक खाकर लिखता है, लिखकर कोई नहीं खाता। हिन्दी के लेखक को बताना पड़ता है कि मेरी किताब छपी है। ऐसे में हम यह लड़ाई इग्लैण्ड में लड़ रहे हैं। वहाँ कोई राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, संजीव को नहीं जानता। हमे अभी बहुत कुछ करना है और युवा पीढी से बहुत सी आशा है।
श्री शर्मा ने कहा कि साहित्य हमारा ’इनबिल्ट’ हिस्सा बनना चाहिए। साहित्य को ’एन्ज्वाय’ करना होगा तब जाकर कहीं लगेगा कि आप साहित्य को जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस लेखक की पाठ्यक्रम में रचना लगी है उसकी कम से कम दो किताब पढ़नी चाहिए तब उस लेखक को समझा जा सकता है। मेरी पंजाबियत की चासनी मेरी कहानियों को जीवंत बनाती है। हमें उधार की भाषा की जरुरत नहीं। हर लेखक को अपनी एक अलग भाषा बनानी चाहिए। आज का पाठक कहानी को ’लॉजिकली’ समझना चाहता है। कहानी बहुत कठिन विधा हो गई है क्योंकि बहुत सारे आन्दोलनों ने कहानी को कठिन कर दिया। कहीं रोचकता गायब है कही कुछ कहानी में से कहानीपन कहीं खो गया है। आज हमें नामवर सिंह की तरफ नहीं देखना। हमें अपने आलोचक खुद बनाने होंगे। पुराने आलोचकों के पास नया सीखने की इच्छा नहीं, वे आदरणीय हैं। आदरणीय की वजह से काम न रूके। हमें नई पीढी के आलोचक चाहिए। अजय नावरिया, सुशील सिद्धार्थ जैसे नवयुवा हमारी आलोचना का हिस्सा बनेंगे। ये खुले दिमाग के है। आज तक नामवर सिंह कविता के मानदण्डों से कहानी को नापते रहे। नई पीढ़ी आगे आकर नये सिद्धान्त बनाए। उन्होंने कहा कि कुछ करोड़ लोग तो हिन्दी पढ़ते होंगे। हजार-पन्द्रह सौ ’हंस’, ’कथादेश’ भी पढ़ते होंगे, हिन्दी की सबसे बड़ी पत्रिका कितने हिन्दीभाषियों तक पहुँचती होगी। हमें मुख्यधारा के द्वार खोलने होंगे। जो युवा लेखक आए हैं वे ’वाद’ के दबाव में लेखन नहीं करते, वे कहते हैं कि हम दलित लेखक नहीं है। लेखन को लेखन माना जाए। अगर मन्नू भण्डारी का लेखन अच्छा है तो इसलिए अच्छा है या खराब, इस कारण नहीं है कि वह महिला है।
श्री तेजेन्द्र ने बताया की महुवामाजी के मैं ’बोरीसाइल्ला’ व प्रमोद तिवारी के ’डर हमारी जेबों में’ उपन्यासों को इग्लैंण्ड में इसलिए सम्मानित किया गया कि इन उपन्यासों में बंग्लादेश बनने, उस समय का बिहार कैसा था , आदि मुद्दों पर व्यापक शोध किया गया है। हिन्दी साहित्य को शोध करने की प्रवृŸिा विकसित करनी होगी। नई पीढ़ी को नए मुहावरे गढ़ने हैं जब आप ये काम करेंगे तो हिन्दी साहित्य की ’सीरियस’ सेवा करेंगे।
इस अवरसर पर श्री तेजेन्द्र ने अपनी कहानी ’कब्र का मुनाफा’ का कहानी पाठ भी किया। अंग्रेजी विभाग के प्रो0 अरुण कुमार ने इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लग रहा था जैसे हम मंच पर कोई नाटक देख रहे हो। प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि कहानी का प्लाट प्रशंसनीय है और तेजेन्द्र जी स्वंय ही पात्रों की बखूबी भूमिका निभा रहे थे। कहानी में कही भी क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ।
हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। संचालन मोनू सिंह ने किया इस अवसर पर मेरठ के साहित्यकारों में किशन स्वरूप, ज्वाला प्रसाद ’साधक’, ईश्वर चन्द्र गंभीर तथा डॉ0 सीमा शर्मा, आलोक ’प्रखर’, रवीन्द्र कुमार, अंजू, आरती राणा, ललित कुमार सारस्वत, विवेक आदि तथा हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं में प्रगति, अनुराधा, प्रियंका, पिण्टू, दलीप, चरन सिंह, राहुल, कौशल, मनीषा, ज्योति सिंह, शिवानी आयुषी, पूजा, लता, विनय आदि उपस्थित रहे।
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