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Monday, April 18, 2016

चौo चरण सिंह विश्वविद्यालय में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘साहित्येतर हिंदी लेखन एवं सूचना प्रौद्योगिकी’ की रिपोर्ट




चौ० चरण सिंह विश्वविद्यालय में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘साहित्येतर हिंदी लेखन एवं सूचना प्रौद्योगिकी’ का आयोजन दिनांक 12/03/2016 से 14/03/2016 तक हुआ। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रो0 नवीन चंद्र लोहनी अध्यक्ष, हिंदी विभाग ने सभी वक्ताओं, अतिथियों एवं महाविद्यालयों से आए शिक्षकों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा, पीठिका और तीन दिन में विभिन्न सत्रों मे होने वाले विमर्शांे की आधारशिला रखते हुए उन्होंने कहा कि आज हिंदी अपनी चैहद्दी को लांघकर उन्मुक्त आकाश में विचरण कर रही है। तकनीक ने हिंदी को नई ताकत दी है। सोशल मीडिया के नूतन माध्यमों से हिंदी के परिसर में वृद्धि हो रही है। साहित्येतर हिंदी का भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है, किंतु उसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति, विश्वविद्यालियों में साहित्येतर लेखन के लिए चहुँमुखी ढाँचागत विकास की आवश्यकता है। मसलन तकनीकी विषयों, विज्ञान वर्ग का ज्ञानात्मक साहित्य, चिकित्सा जगत का ज्ञान, हिंदी में रुपांतरण या मौलिक लेखन के लिए रचनात्मक सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संगोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ आदि हिंदी के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन व्यावहारिक प्रयास भी होने चाहिए जिससे हिंदी का विकास आँकडों तक सीमित न रहकर वास्तव में विश्व जगत हिंदी की ताकत को स्वीकारें।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और जाने माने साहित्यकार डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक‘ ने कहा कि हिंदी को दुनिया की भाषा बनाने के लिए भारत की राष्ट्रभाषा बनाना होगा, यद्यपि अब विज्ञान व तकनीक ने उसे दुनिया की प्रमुख भाषा बना दिया है। हिंदी का फलक बहुत विस्तृत है, उन्होंने आजादी से पूर्व और आजादी के बाद की हिंदी के फर्क को रेखांकित करते हुए कहा कि भले ही अतीत में हिंदी कुछ भी रही हो किंतु आज सूचना प्रौद्योगिकी के रथ पर सवार होकर हिंदी स्वतःस्फूर्त तरीके से अंतराष्ट्रीय मंच पर नई ताकत व उर्जा के साथ उभरकर सामने आई है। विगत में दक्षिण में हिंदी के प्रति विरोध का भाव रहा हो किंतु आज हिंदी के प्रति नजरिया बदल रहा है। आज तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ आदि में हिंदी की सैंकडों पुस्तकों के अनुवाद हो रहे हैं। हिंदी के प्रति सकारात्मक माहौल बना है। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत भाषा को भी बचाने की आवश्यकता पर बल दिया क्योंकि संस्कृत हमारी सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तथा हमारे प्राचीन वेद, उपनिषद्, पुराण, स्मृति ग्रंथ तथा अकूत ज्ञान राशि इसी भाषा में सृजित है। उन्होंने हिंदी को लेकर बहुत ही मौजू और गंभीर सवाल उठाए कि कैसे अभिताभ बच्चन हिंदी के बल पर महानायक तो बन जाता है किंतु अपने साक्षात्कार अंग्रेजी मे देता है। उन्होंने अंग्रेजियत की इस गुलाम मानसिकता पर करारा तंज किया। जब चीन, रूस, जर्मनी फ्रांस आदि देश अपने सभी कार्य अपनी मातृभाषा में करते हंै तो भारत क्यों नही कर सकता? उन्होंने फेसबुक और ट्विटर का हवाला देते हुए कहा कि यदि आप इन माध्यमों पर प्रयुक्त भाषा का सर्वे करंेगे तो पाएंगे कि हिंदी दुनिया की नंबर एक भाषा है। हिंदी एक माध्यम ही नहीं अपितु एक संस्कृति है, सभ्यता है, हमारी पहचान है, जीने की एक पद्धति है। हिंदी के प्रति लोगों में आकर्षण है। हिंदी बाजार की भाषा है। आज आवश्यकता इस बात कि है कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व, फिल्म मेकसर्, संपादक और अकादमिक जगत से जुडे़ लोग दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हिंदी के बेहतर भविष्य के लिए कदम उठाए। सूचना प्रौद्योगिकी हिंदी के लिए एक संजीवनी की तरह है। जिसके बल पर हिंदी द्रुतगति से आगे बढ़ रही है। 
सत्र के विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ टैक्नोलाॅजिस्ट प्रो0 ओम विकास ने कहा कि साहित्येतर हिंदी का विकास मात्र संगोष्ठी या कार्यशालाओं के आयोजन करने से नहीं होगा अपितु हमें अकादमिक जगत से बाहर आकर व्यावहारिक धरातल पर सोचने की आवश्यकता है। राजनैतिक एवं प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण हिंदी दूसरे क्षेत्रों मे विकास नहीं कर सकी। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया आदि कार्यक्रमों में हिंदी की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी, औद्योगिक क्षेत्र, इंटरनेट, अनुवाद आदि से जुड़ी कठिनाइयों की ओर संकेत किया। उन्होंने कहा कि आज जब भाषाएं लुप्त हो रही हैं, तब हमें हिंदी को सरल और बोधगम्य बनाना होगा जिससे कि हिंदी की पहुँच सर्वजन तक हो सके। उन्होंने हिंदी के मानकीकरण सुझावों और प्रयोग पर भी बल दिया। 
इग्नू के प्रो0 सत्यकाम ने कहा कि हिंदी के शब्द प्रयोग को लेकर सचेत रहने की आवश्यकता है। आज हिंदी के साहित्येतर विकास के लिए भाषा के शुद्धिकरण की नहीं अपितु सभी भाषाओं के समन्वय और सामंजस्य की दरकार है क्योंकि हिंदी शुद्धता के नाम पर क्लिष्ट होती जा रही है और गैर हिंदी भाषी लोगों के लिए उसे समझना दुसाध्य हो जाता है। आज हिंदी के साहित्येतर लेखन के विकास के लिए भाषा के लौकिकीकरण की आवश्यकता है ताकि भाषा प्रत्येक व्यक्ति के लिए संप्रेषणीय बन सके। हिंदी जिन भी अनुशासनों में जाएगी वहाँ के शब्द आना आवश्यक हैं। हिंदी दुनिया वालों को उन शब्दों से परहेज नहीें करना चाहिए अपितु उन्हें उन शब्दों का बेहिचक स्वागत करना चाहिए।
प्रो0 एच0एस0 सिंह, प्रति कुलपति, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हिंदी हमारी पहचान है, हिंदी हमारी अस्मिता है किंतु आज जिस तेजी से भाषाएँ मर रही है, हमें हिंदी में मूल्यपरक साहित्य का सर्जन करना होगा साथ ही हिंदी को विज्ञान चिकित्सा और टैक्नोलाॅजी के विकास के लिए तैयार करना होगा। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी की एक उक्ति का हवाला देते हुए हिंदी के भविष्य के प्रति कहा कि ’हिंदी एक दिन एशिया ही नहीं विश्व पंचायत की भाषा होगी’। सत्र के अंत में गणित विभाग के प्रो0 मुदृल गुप्ता ने सभी वक्ताओं और अतिथियों का आभार व्यक्त किया। सत्र का संचालन डा0 प्रज्ञा पाठक, प्रवक्ता एन0ए0एस0 काॅलिज, मेरठ ने किया। 
राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय सत्र ‘समाज विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी’ में चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग से प्रो0 आलोक कुमार ने कहा कि हिंदी के माध्यम से समाज विज्ञान की अवधारणाओं को सरलता से समझा जा सकता है। हिंदी से मेरा तात्पर्य केवल भाषा से नहीं अपितु नाटक, कहानी एवं धारावाहिक आदि से है। जिसके माध्यम से समाज विज्ञान की गूढ़ शोध सारणियों को समझने में बहुत मदद मिलती है। कविता के माध्यम से भी समाज विज्ञान की कई शाखाओं को समझने में मदद मिलती है। 
डाॅ0 शिवा कनौजिया शुक्ला ने कहा कि विदेश नीति अर्थतंत्र से ही तय नहीं होती उसमें सूचना क्रांति की भी भूमिका होती है। जन सामान्य के बीच भारतीय भाषाओं में सूचना प्रौद्योगिकी को प्रसारित करने की आवश्यकता है। भारतीय टास्क फोर्स, मोबाइल स्थानीकरण कोड, सूचना तकनीकी विशेषज्ञों से विभिन्न भाषाओं के साथ तालमेल बिठाने पर जोर दिया। 
डाॅ0 आलोक पुराणिक ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी ने ज्ञान का लोकतांत्रिकरण कर दिया है अब सूचना एकत्र करना आसान हो गया है। हिंदी में अर्थ जगत के विद्वानों की उम्दा पुस्तकों का अभाव है।यूट्यूब अब नया विश्वविद्यालय है। ज्ञान लेने के लिए भाषाओं की सीमा लांघनी होगी। ज्ञान बाँटने के लिए भाषा चुनी जा सकती है। सूचना प्रौद्योगिकी की कक्षा प्रोफेसरों एवं विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है।
प्रो0 सत्यकाम ने कहा कि टैक्नाॅलोजी उपयोगी होगी तो स्वतः प्रसिद्ध होकर उसका प्रयोग होगा। अनुवाद में प्रौद्योगिकी का प्रयोग सीमित है। अनुवाद रचनात्मक होना चाहिए। ज्ञान को हिंदी में लिखना हो तो क्लिष्टता को छोड़ना होगा। माक्र्स को समझने के लिए वर्ग संघर्ष को जाति-संघर्ष से रूपांतरित किया जाना चाहिए। भारतीय संदर्भ के साथ जुड़कर ही आयतित ज्ञान को आत्मसात किया जा सकता है। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो0 रामशरण जोशी ने कहा कि सृजनात्मक अनुवाद पर जोर दिया जाना चाहिए। साहित्येतर पुस्तकों का बाजार फल-फूल रहा है। मौलिक लेखन के महत्व को भी समझना होगा। टैक्नोलाॅजी और ज्ञान दोनों साथ-साथ चलते हैं। तकनीकी ने ज्ञान को सर्वसुलभ बना दिया है। टैकनोलाॅजी और ज्ञान का संबंध अटूट है। साहित्येतर हिंदी का विकास समाजशास्त्र, भूगोल, अर्थशास्त्र, इतिहास और ज्ञान के सभी क्षेत्रों में मौलिक चिंतन और लेखन से संभव होगा। उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी को उद्धृत करते हुए कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सौ वर्ष पूर्व अर्थशास्त्र विषयक पुस्तक ‘संपत्तिशास्त्र‘ लिखकर साहित्येतर हिंदी लेखन को विकसित किया। हमें औपनिवेशिक मानसिकता की गुलामी से आजाद होकर ज्ञान की नई धाराओं में मौलिक रूप से लिखना और सोचना होगा। हिंदी में साहित्येतर लेखन का भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है। हिंदी के प्रकाशकों को भी यह बीड़ा उठाना होगा कि वे साहित्येतर हिंदी की अच्छी पुस्तकें उपलब्ध कराएं जिससे कि साहित्येतर हिंदी लेखन अपनी पूरी ऊर्जा और ताकत के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें। सत्र का संचालन डाॅ0 राकेश बी0 दूबे ने किया। 
12 मार्च 2016 की संध्या पर पुरातन छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कु0 तरूणा कंडपाल ने शास्त्रीय नृत्य तथा विभाग के छात्र-छात्राओं कु0 आयुषी, कु0 ज्योति, कु0 कीर्ति, कु0 प्रिया, कु0 रश्मि, कु0 पारुल गुलाठी, कु0 अंजलि त्यागी, कु0 अंजलि, कु0 स्वाति आदि के नृत्य एवं विभिन्न रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ सराहनीय रही। कार्यक्रम में विभाग के पुरातन विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की। इसमें डाॅ0 गजेंद्र सिंह, डाॅ0 मोनू सिंह, डाॅ0 ममता, डाॅ0 अंजू, डाॅ0 राजेश चैहान, डाॅ0 अमित कुमार, डाॅ0 राकेश बी0 दूबे, डाॅ0 यासमीन, अंचल कुमारी, डाॅ0 रवींद्र प्रताप राणा, कु0 अलूपी राणा, कु0 संगीता सोलंकी, डाॅ0 प्रतिभा, इंद्रा, कु0 पारुल, भावना कुमरा, बेबी शर्मा, कु0 सुमन, कु0 शिखा, कु0 निधिराज भड़ाना, श्री जहीन, श्री फिरोज, श्री मनोज, श्री योगेंद्र सिंह, श्री कुलदीप शर्मा, श्री सुनील कुमार आदि उपस्थित रहें। 
त्रिदिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन तृतीय सत्र ‘विज्ञान, हिंदी एवं सूचना प्रौद्योगिकी‘ में प्रो0 लोहनी ने सभी विद्वानों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया। सत्र में डाॅ0 देवेंद्र मेवाड़ी ने विज्ञान में लेखन के लिए भाषा को रूखी एवं क्लिष्ट करने पर एतराज जताया और कहा कि विज्ञान के हिंदी लेखन में रोचकता, जिज्ञासा और लालित्य होना चाहिए। उन्होंने हिंदी के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालते हुए महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दर दास, हरिवंश राय बच्चन, राहुल सांकृत्यायन, सत्यदेव परिव्राजक, बनारसी दास चतुर्वेदी, निराला, डाॅ0 धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी आदि के साहित्येतर लेखन को संज्ञान में लिया और परंपरा से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने कि आवश्यकता पर बल दिया। हिंदी एक सेतु है जो विज्ञान और साहित्य के बीच बहुत बड़ी जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकती है। आज आवश्यकता इस बात है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार कर सके। विज्ञान लेखन तथ्यों या आँकड़ों की जादूगरी से संभव नहीं अपितु हमें उसमें संवेदना, रोचकता एवं हृदय को स्पर्श करने वाली भाषा का सन्निवेश करना होगा।
प्रो0 ए0के0 अरूण ने कहा कि विज्ञान में हिंदी को संप्रेषित करने वाले अच्छे अनुवादकों की कमी है जो विज्ञान की पुस्तकों का हिंदी में रोचक अनुवाद कर सकें। उन्होंने कहा कि हमें विज्ञान में हिंदी लेखन के लिए कुशल अनुवादकों की सबसे अधिक आवश्यकता है। संपे्रषण के लिए प्रो0 अरूण ने क्षेत्रीय बोलियों, मुहावरों एवं शब्दों की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि आज हिंदी बाजार की जरूरत है, जिसके कारण तमाम बड़ी कंपनियाँ अपने साॅफ्टवेयर, कन्वर्टर हिंदी में विकसित कर रहे हंै। तकनीकी शब्दावली में ऐसे शब्दों की आवश्यकता है जिससें कि भाषा को सरल एवं सुगम बना सके। उन्होंने हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए तटस्थता, स्पष्टता और सरलता पर बल दिया। 
डा0 दिनेश चमोला ने विज्ञान लेखन का जिक्र करते हुए कहा कि आज जो हमारे पास अनुवाद आ रहा है वह अनुवाद का भी अनुवाद है। जब तक यह अनुवाद की श्रृंख्ला चलती रहेगी तब तक हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए विसंगतियाँ बनी रहेगी। उन्होंने विज्ञान लेखन के लिए उचित शब्दावली के चयन पर जोर दिया साथ ही यह भी कहा कि यदि डाॅक्टर, वैज्ञानिक आदि स्वयं अपना अनुवाद अथवा लेखन हिंदी में करें तो वह अनुवाद से दस गुना बेहतर होगा। विज्ञान लेखकों और लेखन को केंद्रित कर संगोष्ठियों का आयोजन होना चाहिए, साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान पर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं को प्रोत्साहन देने पर बल दिया। विज्ञान में हिंदी लेखन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है। 
श्री मानवर्धन कंठ ने कामायनी को संदर्भित करते हुए विज्ञान लेखन में वैज्ञानिकता तथ्यात्मकता एवं मानवता पर बल दिया। हिंदी एक विवेकशील एवं संवेदनशील भाषा है इसलिए विज्ञान लेखन भी इस विवेकशीलता और संवेदनशीलता को बेहतर ढंग से निर्वाह करे। 
व्यंग्य लेखक श्री सुभाष चंदर ने कहा कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए अनंत संभावनाएँ हंै बर्शतें आप की हिंदी की बुनियाद मजबूत होे जिससे कि बरोजगारी का संकट दूर हो सके और हिंदी के छात्र-छात्राओं को रोजगार मिल सके। हिंदी में विज्ञान लेखकों के लिए बाजार आपके लिए बाँहंे पसार कर स्वागत के लिए खड़ा है।
अध्यक्षीय भाषण में प्रो0 हेमंत जोशी ने विज्ञान पत्रकारिता में होने वाले परिवर्तन की ओर ज्रिक किया उन्होंने कहा कि हमें अनुवाद के लिए बार-बार संस्कृत भाषा की ओर लौटने की आवश्यकता नहीं अपितु अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों एवं अद्यतन संपे्रक्ष्य शब्दांे का प्रयोग करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल नेटवर्किग ने आज लेखन के लिए एक बड़ा मंच उपलब्ध कराया है किंतु इस मंच पर लोग रोमन में लिख रहे हंै। इसका प्रयोग गालियाँ देने के लिए कर रहे हंै, जबकि यह बहुत ही चिंता की बात है। 
प्रो0 वाई0 विमला ने कहा कि हिंदी अपने आप में बहुत ही सक्षम भाषा है। उसकी संप्रेषण शक्ति बहुत ही सक्षम है। आज आवश्यकता इस बात कि है कि जब हिंदी में विज्ञान लेखन को मसाला बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है तब हम विज्ञान लेखन में तथ्यात्मकता, संवेदनात्मकता, रोचकता और भाषा की सुग्राहृता को ध्यान में रखकर ऐसे लेखन का सृजन करें जो जन-जन तक पहुँचंे। सत्र का संचालन आई0आई0टी0 मेरठ पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डाॅ0 नरेश मिश्र ने किया।
चतुर्थ सत्र ‘विधि, हिंदी और सूचना प्रौद्योगिकी‘ के अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री एस0पी0 त्यागी ने कहा कि हिंदी संसार की सर्वश्रेष्ठ भाषाओं में से एक है क्योंकि उसके उच्चारण और लेखन में समरूपता है जो उसकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक हिंदी के साथ गैर साहित्यिक हिंदी का भी विकास हो रहा है उसके लिए हमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। भारत की अधिकतर जनता का संबंध हिंदी से है। इसीलिए उनके ऊपर अंग्रेजी नहीं थोपी जा सकती। उन्होंने श्रोताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि न्यायालयों में हिंदी का अच्छे स्तर पर प्रयोग हो रहा है। न्यायाधीश अपने फैसले हिंदी में लिख रहे है। अंग्रेजी की तुलना में हिंदी की पुस्तकें ज्यादा बिक रही हंै इसलिए हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। 
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नरेंद्र पाल सिंह ने कहा कि अंग्रेजी सीखना हमारी मजबूरी है किंतु हिंदी का कारवाँ आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ रहा है और हिंदी को लेकर लोगों की मानसिकता में बदलाव आ रहा है जो हिंदी के विकास के लिए शुभ संकेत है। 
हिंदुस्तान के लीगल एडिटर श्री सत्यप्रकाश ने कहा कि भारत से अंग्रेजों का आधिपत्य खत्म हो गया किंतु अंग्रेजी का आधिपत्य अब भी बना हुआ है। हमें इस मानसिकता से उबरना होगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जो लोग अपनी मातृ भाषा में बुनियादी शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे अंग्रेजी की तुलना में अधिक कुशाग्र होते हैं। उन्होंने विधि आयोगों की सिफारिशों पर विस्तार से प्रकाश डाला और कहा कि हमंें विधि में हिंदी लेखन के लिए हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के विकास करने की भी आवश्यकता है। 
विधि भारती की संपादक श्रीमती संतोष खन्ना ने बहुत ही विस्तार से संविधान में उल्लिखित अनुच्छेदों का वर्णन करते हुए हिंदी में विधि लेखन की स्थिति एवं संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिंदी में विधि लेखन के लिए इच्छाशक्ति पर बल दिया और कहा कि हिंदी में विधि लेखन के लिए कानून की भाषा का मुहावरा गढ़ना होगा। 
सत्र का संचालन डाॅ0 मोनू सिंह, हिंदी प्रवक्ता, चैधरी चरण सिंह राजकीय महाविद्यालय, छपरौली, बागपत ने किया। 
पंचम सत्र ‘अनुवाद मीडिया हिंदी एवं सूचना प्रौद्योगिकी‘ में श्री बृजेश चैधरी ने कहा कि विगत दस वर्षों में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं और इस बदलाव में हिंदी को जो सम्मान मिला है वह किसी अन्य दूसरी भाषा को नहीं मिला। हिंदी को अनुवाद मीडिया आदि में सशक्त रूप से आगे बढ़ाने के लिए हिंदी प्रेमियों को हिंदी के प्रति ईमानदार होना अत्यंत आवश्यक है।
डाॅ0 आलोक पौराणिक ने कहा कि मीडिया ने हमारी हिंदी और बातों को जन-जन तक पहँुचाने में अभूतपूर्व कार्य किया है। नवीन मीडिया तकनीक और माध्यम आने के कारण मठाधीशों और खलीफाओं का हिंदी से वर्चस्व खत्म हो गया। मीडिया ने हमें एक बेहतर मंच प्रदान किया है किंतु सनद रहे कि हमें इसका प्रयोग औचित्यपूर्ण और जिम्मेदारी के साथ करना होगा। सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को एक बेहतर मंच उपलब्ध कराया है। 
डाॅ0 सूर्यकांत द्विवेदी ने कहा कि हमने पिछले एक दशक में जो सीखा है वह पहले कभी नहीं सीख पाए। यह सब संभव हो पाया है सूचना प्रौद्योगिकी के बल पर। आज हिंदी ने सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से एक गति पकड़ी है, एक लय हासिल की है, किंतु इस लय का संधान करना भी अत्यंत आवश्यक है जिससे कि हम हिंदी में आ रहे कूड़े-करकट को साफ कर सकंे। अनुवाद के क्षेत्र में भी हिंदी ने अभूतपूर्व तरक्की की है। आज सूचना प्रौद्योगिकी और बाजार ने हिंदी को घर-घर तक पहँुचा दिया है।
प्रो0 गोविंद सिंह ने कहा कि अनुवाद, मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के बीच हिंदी एक पुल का काम करती है। उन्होंने कहा आज भारत में निकलने वाले दस समाचार पत्रों में पाँच हिंदी के होते हंै। पाँच सौ से ज्यादा हिंदी चैनलों का विकास हुआ है। रोमन लिपि ने देवनागरी लिपि के सामने एक बहुत बड़ी समस्या यह पैदा कर दी कि कुछ लोग सोशल मीडिया के माध्यमों पर रोमन लिपि में तो पढ़ने को तैयार है किंतु देवनागरी लिपि में नहीं, यह हिंदी के समक्ष एक बड़ा संकट है। यदि आजादी के बाद हमारा अपना अध्ययन क्षेत्र हिंदी माध्यम न हुआ होता तो आज हिंदी के समक्ष यह चुनौती नहीं आती। 
सुश्री मंजरी जोशी ने अपनी बात मीडिया माध्यमों पर केंद्रित करते हुए कहा कि आज टी0वी0 चैनल टी0आर0पी0 बढ़ाने के लिए सास, बहू के किस्से और फूहड काॅमेडी परोस रहे हंै। विज्ञापन की भाषा बड़ी जटिल होती जा रही है। उसमें स्पष्टीकरण का भाव कम जबकि ऊहापोह की स्थिति ज्यादा पैदा हो रही है। टी0वी0 एंकर अनावश्यक रूप से चिल्लाना, विशेषज्ञों को उकसाना, अराजकता की स्थिति पैदा करना आदि हिंसात्मक प्रवृतियों में संलग्न दिखाई दे रहे हंै। सब भ्रष्ट खेल चल रहा है। उच्चारण को लेकर कहीं कोई सजगता दिखाई नहीं देती जबकि विगत दिनों उच्चारण को लेकर बड़ी सजगता थी। 
प्रो0 हेमंत जोशी ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि राजभाषा के रूप में ही हिंदी को सशक्त करने की आवश्यकता है। हिंदी के शोर में कही हमारी बहुभाषिकता का सौंदर्य समाप्त न हो जाए यह बड़ी चिंता की बात है। उन्होंने हिंदी भाषा में शुद्धता पर भी जोर दिया और कहा कि जब गंगा और जमुना को शुद्ध करने की बात की जाती है, गंदगी को साफ करने की बात की जाती है तो भाषा को शुद्ध क्यों नहीं किया जाना चाहिए? भाषा की अपनी मर्यादा है, संस्कार है एवं सीमाएं है उन सीमाआंे का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। कोई भी भाषा तब मरती है जब उसकी क्रियाओं पर हमला होता है। हिंदी वालों को इस संबंध में सचेत होने की आवश्यकता है। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए आकाशवाणी के निदेशक डाॅ0 लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि आकाशवाणी जनसंचार का एक बड़ा माध्यम है, सूचना प्रौद्योगिकी ने इसके विस्तार में नए आयाम स्थापित किए है। सूचना प्रौद्योगिकी ने रेडियों को द्वितरफा संवाद बना दिया। फोन इन तकनीक ने रेडियों में अभूतपूर्व क्रांति कर दी। इंटरनेट के आने से रेडियों और एफ0एम0 के दूसरे चैनल भी पूरी दुनिया में फैल गए किंतु उन्होंने आज के मीडिया को बौद्धिक रूप से दरिद्र होने पर अपनी चिंता प्रकट की। आज कितने चैनल शास्त्रीय संगीत, लोककला एवं साहित्य चर्चा को कितना कवरेज दे रहे हैं? यह चिंता की बात है। मीडिया ने हमारी रूचि को फूहड़ बना दिया है। यदि मीडिया गंभीर मुद्दांे को लेकर चले तो एक ऐसा लोकतंत्र विकसित होगा जहाँ साहित्य, कला और शास्त्रीय संगीत सब सह अस्तित्व की भावना से फल-फूल सकंेगे।
 सत्र का संचालन हिंदुस्तान दैनिक के वरिष्ठ पत्रकार डाॅ0 रवींद्र राणा ने किया। 
कार्यक्रम में दूसरे दिन का समापन विभाग द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन के साथ हुआ। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता डाॅ॰ लक्ष्मीशंकर वायपेयी ने की। इनके अतिरिक्त श्रीमती ऋचा जोशी, श्रीमती जय वर्मा, डाॅ॰ असलम खान, श्री राजेश ढांडा, श्री दीपक तिवारी, श्रीमती सारिका त्यागी ने काव्य पाठ किया। श्रोताओं में कवियों के काव्य पाठ की भूरी-भूरी प्रशंसा की। 
त्रिदिवसीय संगोष्ठी के षष्ठ सत्र में ‘रेलवे, बैंक, सरकारी कार्यालयों में हिंदी प्रयोग एवं सूचना प्रौद्योगिकी‘ में विषय प्रवर्तन करते हुए बीमा क्षेत्र से आए श्री अशोक गौड़ ने कहा कि बीमा अन्तरराष्ट्रीय व्यवसाय है, जिसका आम जन से सीधा संबंध है और हिंदी इस क्षेत्र में बहुत ही सशक्त तरीके से इस काम को अंजाम दे रही है। बीमा कराने वाली जनता अंग्रेजी नहीं अपितु वह हिंदी जानती है। इसलिए इस क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी के साथ कदम ताल करते हुए अपने फाॅन्ट, की बोर्ड और साॅफ्टवेयर अधिकाधिक सरल और सहज भाषा में उपलब्ध कराने होंगे। 
इलाहाबाद बैंक, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के शाखा प्रबंधक श्री मुकेश कपूर ने कहा कि 30 वर्ष पहले और आज की हिंदी प्रयोग को लेकर बैंकों में जमीन आसमान का अंतर आया है। उन्होंने कहा कि बैंक को यदि व्यवसाय करना है तो वह हिंदी उपभोक्ता के पास हिंदी भाषा में ही पहुँच सकते हैं। हिंदी भाषा से ज्यादा हिंदुस्तान में कोई दूसरा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम नहीं है बशर्तें हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। बैंक के तमाम कार्य फार्म, पासबुक, ए॰टी॰एम॰ आदि हिंदी में बखूबी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बैंको में हिंदी का प्रयोग जबरिया नहीं अपितु स्वतःस्फूर्त रूप में होना चाहिए। सरकार ने हिंदी को लेकर तमाम योजनाएं बनाई हैं। अब उन्हें क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। रेलवे अपने तमाम लक्ष्यों को पूरा कर सकता है। उन्होंने बहुत ही विस्तार से यूनिकोड़, स्पेलिंग चैकर, आॅटो करेक्ट, थिसारस और लीला साॅफ्टवेयर के बारे में व्यावहारिक बातें बताई। अनुवाद केवल प्रचार का तंत्र नहीं है अपितु अनुवाद एक कला है जो बहुत ही संजीदगी की माँग करती है। उन्होंने अपने वक्तव्य में सुझाव देते हुए यह भी कहा कि रेलवे को अपनी वेबसाइट, प्रशिक्षण सामग्री एवं तमाम कार्य दोनों भाषाओं में करने चाहिए। एयर इंडिया से संबंधित अधिकारी श्रीमती अलका सिन्हा ने नागर विमान सेवा से जुड़े अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि आज एयर इण्डिया के सभी पत्रों में कार्यालयों म,ें एयर पोर्ट पर उद्घोषणाओं में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग भी सशक्त रूप में हो रहा है। उनका यह भी मानना था कि सरकारी दस्तावेजों के अच्छे अनुवाद नहीं हो रहे। सैद्धांतिक चीजें केवल पुस्तकों में कैद हैं। उन्हें व्यवहारिक पटल पर लाने की आवश्यकता है। उन्होंने अनुवाद की समस्या को भी रंखांकित करते हुए कहा कि टैक्सी वे (ज्ंगप ूंल), रन-वे (त्नद ूंल), एरों ब्रिज (।मतव इतपकहम), एयर होस्टिस (ंपत ीवेजमे), आदि के लिए अच्छे हिंदी शब्दों के प्रयोग की आज भी आवश्यकता बनी हुई है। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए डाॅ॰ कुसुमवीर ने कहा कि हिंदी जमीन की भाषा है। वह ‘वसुधैव कुटुंबकम‘ की भाषा है। इसकी शब्द संपदा बड़ी विशाल है, वैज्ञानिक है तथा इसका व्याकरण बड़ा ही समृद्ध है। हिंदी ही केवल एकमात्र भाषा है जिसमें क्रियाओं के तीन रूप अलग-अलग संदर्भ व्यक्त करते हैं। जैसे बच्चों के लिए ‘आ’, बड़ों के लिए ‘आओं’ और बुर्जुगों के लिए ‘आइए’। आज आवश्यकता केवल दृष्टिकोण बदलनें की है। 
सत्र का संचालन श्री राजेश ढ़ांडा, रक्षा लेखा विभाग, देहरादून ने किया।
सप्तम् सत्र में ‘साहित्येतर हिंदी लेखन में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका’ में डाॅ॰ वी॰के॰ मल्होत्रा ने सूचना तकनीकी के द्वारा हिंदी में हुए नूतन आविष्कारों जैसे मंदरा फाॅन्ट, बिंग, प्रूफ इन टू ग्रामर चैकर, एड टू डिक्सनरी आदि कई साफ्टवेयर और कई टॅूल्स का विस्तार से वर्णन किया।
वर्धा विश्वविद्यालय से आए डाॅ॰ धनजी प्रसाद ने कहा कि आज सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से साहित्येतर लेखन टेक्स्ट की भूमिका से आगे आ गया है। आज की पीढ़ी आॅन स्क्रीन लेखन कर रही है। ई॰ कन्टेन्ट आने से छपने और प्रचार-प्रसार की समस्या खत्म हो गई। सोशल मीडिया ने एक बड़ा मंच उपलब्ध कराया है साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी प्रयोग को लेकर रोजगार की अनंत संभावनाएं विद्यमान हैं। 
माइक्रोसाॅफ्ट में प्रबंधक बालेंदु दाधीच ने हिंदी में हुए सूचना प्रौद्योगिकी के अनेक प्रयोगों को श्रोताओं के समक्ष रखा। माइक्रोसाॅफ्ट आॅफिस 2016-365 कोर्टाना साॅफ्टवेयर, माइक्रोसाॅफ्ट ट्रान्सलेटर ऐप, वन नोट साॅफ्टवेयर, माइक्रोसाफ्ट सरफेस, प्रो फोन, स्वे (ैॅ।) आदि का सेल्युलाईड माध्यम से बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से श्रोताओं को इन साॅफ्टवेयर की विशेषताओं से परिचित कराया। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे ये सभी साॅफ्टवेयर हमारी लेखन शक्ति और प्रस्तुति में चार चाँद लगा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी माध्यमों से हिंदी नूतन समृद्ध हो रही है। इनके माध्यम से न केवल लेखन अपितु प्रकाशन प्रचार-प्रसार पुस्तकों के ले आउट एवं सूचनाओं को पलक झपकते ही अन्तरराष्ट्रीय मंच पर साझा किया जा सकता है। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए जाने माने साहित्यकार, संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी ने आज हमारे जीवन में क्रांति कर दी है। तकनीकी ने हमारी सभी कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया है। साथ ही इस तकनीक ने लेखकों, पत्रकारों को अनंत सम्भावनाएं दी हैं। यूनिकोड ने तो क्रांति कर दी है किंतु सनद रहे कि तकनीक को हम अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढालें और उसे अपनी रचनात्कमता पर हावी न होने दें, कहीं यह तकनीक हमसे हमारी मौलिकता और लालित्य को न छीन ले। 
सत्र का संचालन डाॅ॰ अशोक मिश्र, संकायाध्यक्ष, रैमटैक, शामली ने किया।
समापन सत्र में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से आए प्रो॰ प्रमोद कुमार शर्मा ने कहा कि अंग्रेजी के कुछ सामान्य शब्दों को हिंदी में सम्मिलित कर लेना चाहिए। गैजेट्स में हिंदी विकल्प होने चाहिए। हमें हिंदी को टैक्नोलाॅजी के अनूकूल बनाना होगा। श्रीमती जय वर्मा ने कहा कि आज हिंदी का प्रयोग सभी क्षेत्रों में बढ़ा है। आज हवाई यात्रा के दौरान एयर हाॅस्टिस हिंदी में उद्घोषणाएँ कर रही हैं, हिंदी में बात कर रही हैं। इसके लिए भारतीय सरकार और समस्त हिंदी प्रेमी प्रंशसा के पात्र हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को स्थान दिलवाने के लिए भारतीय राजनैतिक नेतृत्व की दृढ़ इच्छा शक्ति की महती आवश्यकता है। भारत के सभी विश्वविद्यालय हिंदी भाषा में अपने पठन-पाठन का विकल्प प्रस्तुत करें तभी हिंदी आगे बढ़ेगी। 
डाॅ॰ सविता मोहन ने यह प्रश्न उठाया कि गणित, चिकित्सा या विज्ञान वर्ग के अन्य विषयों को लेकर हिंदी में कितना लेखन हुआ है? आज तक इस प्रश्न पर विचार ही नहीं किया गया। धार्मिक आंदोलन हिंदी को अलग तरह से विकसित कर रहे हैं भले ही उनकी मंशा कुछ भी हो किंतु इस बहाने हिंदी नए आयामों की ओर अग्रसर हो रही है। साहित्य के अतिरिक्त अन्य विधाओं में आज कितना और कैसा लेखन हो रहा है? इसे रेखांकित करने की आवश्यकता है। बालेंदु दाधीच ने कहा कि हम हिंदी को लेकर जो व्यर्थ की चिंता करते हैं, यह उचित नहीं। आज तकनीक हिंदी के साथ मजबूती से खड़ी है। तकनीक ने भूगोल, समय और भाषाई दीवारें तोड़ दी हैं। माइक्रोसाॅफ्ट जैसी कंपनियाँ सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग हैं, वे चुपचाप भाषाओं के संरक्षरण का कार्य कर रही हैं। यूनीकोड में 250 से अधिक भाषाओं को अपना  माध्यम बनाने का अभियान चलाया हुआ है। तकनीक दो भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करती है। 
हिंदी के जाने माने साहित्यकार प्रो॰ गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि हमें सूचना तकनीक ने नई दुनिया का परिदर्शन कराया है किंतु हिंदी ज्ञानात्मक विकल्पों और उपागमों को संप्रेषित करने में विफल रही है। तकनीक का परिज्ञान कराने वाले शास्त्र और पुस्तकें हिंदी में हमें उपलब्ध नहीं है। कोई भी साहित्य तब तक परिपूर्ण नहीं हो सकता जब तक उसके पास ज्ञानात्मक साहित्य नहीं होगा। नवीन सूचना तकनीक ने बहुत से विषयों के सम्मुख लगे बेरियरों को हटा दिया है। तकनीक हमारी प्राच्य विद्या और ज्ञान को भी संरक्षित और संवर्धित कर सकें। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो॰ एन0 के0 तनेजा ने कहा कि संगोष्ठी का विषय बहुत ही समसामयिक और महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विश्व में वे ही देश शोध, शिक्षा, तकनीक और आर्थिक क्षेत्र में तेजी से विकास कर सकेंगे जिनकी शिक्षा का माध्यम मातृभाषा है। तुलनात्मक रूप से मातृभाषा में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी दूसरी भाषा की तुलना में जल्दी सीखते हैं। उन्होनें उम्मीद की कि इस संवाद और परिसंवाद के द्वारा हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं का विकास संभव होगा। 
समापन सत्र में आयोजन सचिव डाॅ॰ अंजू ने सभी का आभार और धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और विभिन्न संस्थाओं से आए विभिन्न शिक्षक, शोधार्थियों और विद्याािर्थयों ने भाग लिया। 

  

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